अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
(28) अगस्त्य-संहिता
ध्यानमप्यर्चनाद् भद्रैर्भद्रार्थफलदं यतः।
आत्मनस्तत्त्वचिन्ता तु तस्याप्यात्म¹चिन्तनम् ।।47।।
उभयोरैक्यचिन्ता तु पुनरावर्तयेन्न तु।
सुन्दर साधनों से अर्चना करने से आत्मा के तत्त्व का चिन्तन और तत्त्वों
की आत्मा का चिन्तन स्वरूप ध्यान श्रेष्ठ है, क्योंकि यह सुन्दर फल प्रदान करता
है। साथ ही, आत्मा का तत्त्व और तत्त्व की आत्मा इन दोनों की एकता का
चिन्तन करने से पुनर्जन्म नहीं होता है।
आत्मानं सततं रामं संभाव्य विहरन्ति ये।
न तेषां दुष्करं किंचिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।।48।।
जो हमेशा अपने को श्रीराम समझकर विहार करते हैं उनके लिए कोई
दुष्कर कार्य नहीं है और उस दुष्कर कार्य के कारण उत्पन्न होनेवाली विपत्ति नहीं
होती है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये सगुणोपासनम् नाम
पंचमोऽध्यायः ।।
अथ षष्ठोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
किमेतद् भगवन् ब्रूहि तव² मध्याङ्गुलिं रहः।
तत्किं पिबसि माहात्म्यं श्रीतुलस्याः क्वचित् सृतम्³ ।।1।।
सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे भगवान् अगस्त्य मुनि! आपकी अंगुलियों के बीच में
क्या छुपा हुआ है, यह तो बतलाइये! क्या आप श्रीतुलसी से निःसृत माहात्म्य का
पान कर रहे हैं?
अगस्तिरुवाच
शृणु वक्ष्यामि माहात्म्यं श्रीतुलस्याः प्रयत्नतः।
पूर्वमुग्रतपः कृत्वा वरं वव्रे मनस्विनी।।2।।
- घ. तस्यात्मनि विचिन्तयेत्। 2. ख. घ. हित्वा। 3. ख. स्थितम्।
षष्ठोऽध्यायः (29)
अगस्त्य बोले- सुनो, मैं श्रीतुलसी का माहात्म्य भली-भाँति कहता हूँ।
प्राचीन काल में मनस्विनी तुलसी ने उग्र तपस्या कर भगवान् से वर माँगा।
तुलसी सर्वपुष्पेभ्यो पत्रेभ्यो वल्लभा यतः।१।
विष्णोस्त्रैलोक्यनाथस्य रामस्य जनकात्मजा।।३।।
प्रिया तथैव तुलसी सर्वलोकैकपावनी।
जैसे श्रीराम के लिए जनकनन्दिनी श्रीसीता प्रिय हैं उसी प्रकार सभी
फूलों और पत्तियों में तुलसी भगवान् विष्णु को सबसे प्रिय हो और वह सभी
लोकों को पवित्र करती रहे।
तुलसीपत्रमात्रेण योऽर्चयेद्राममन्वहम्२ ।।४।।
स याति शाश्वतं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्लभम्।
अतः केवल तुलसी के पत्र से जो प्रतिदिन श्रीराम की पूजा करते हैं वे ऐसे
शाश्वत ब्रह्मलोक को प्राप्त करके हैं, जहाँ से फिर इस संसार में आना सम्भव
नहीं है।
नीलोत्पलसहस्रेण त्रिसन्ध्यं योऽर्चयेद्धरिम् ।।५।।
फलं वर्षसहस्रेण३ तदीयं नैव लभ्यते।
नीलकमल के हजार फूलों से तीनों सन्ध्या जो श्रीहरि की पूजा करते हैं, वे
एक हजार वर्ष में भी वैसा फल प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
विद्वन् सर्वेषु पुष्पेषु पङ्कजं श्रेष्ठमुच्यते।।६।।
तत्पुष्पेष्वपि तन्माल्यं लक्षकोटिगुणं भवेत्।
हे विद्वान् सुतीक्ष्ण! सभी फूलों में कमल श्रेष्ठ है और कमल के फूलों में भी
उसकी माला लाखों करोड़ों गुना फलदायिनी होती है।
विष्णोः शिरसि विन्यस्तमेकं श्रीतुलसीदलम् ।।७।।
अनन्तफलदं विद्वन् मन्त्रोच्चारणपूर्वकम्।
किन्तु भगवान् विष्णु के शिर पर मन्त्रोच्चारण के साथ चढ़ाया गया एक
तुलसी का पत्र अनन्त फल देता है।
१. घ. तत। २. घ. ०विष्णुमन्वहम्। ३. घ. वर्षशतेनापि।
(30) अगस्त्य-संहिता
पुष्पान्तरैरन्तरितं निर्म्मितं तुलसीदलैः ।।8।।
माल्यं मलयजालिप्तं दद्यात् श्रीराममूर्द्धनि।
दूसरे फूलों के बीच में तुलसीदल डालकर बनायी गयी तथा मलय चन्दन
से पोती गयी माला श्रीराम के मस्तक पर चढ़ानी चाहिए।
किं तस्य बहुभिर्यज्ञैः सम्पूर्णवरदक्षिणैः ।।9।।
किं तीर्थसेवया दानैरुग्रेण तपसापि वा।
उनके लिए अनेक श्रेष्ठ दक्षिणा वाला यज्ञ, तीर्थ में निवास, दान तथा उग्र
तपस्या व्यर्थ है।
वाचं नियम्य चात्मानं मनो विष्णौ निधाय च ।।10।।
योऽर्चयेत् तुलसीमालैर्यज्ञकोटिफलं भवेत्।
भवाघकूपमग्नानामेतदुद्धारकाङ्कुशम्¹ ।।11।।
अपनी वाणी को संयमित कर तथा मन में भगवान् विष्णु को धारण कर
जो तुलसी की माला से पूजा करते हैं उन्हें करोड़ों यज्ञ करने का फल मिलता है।
यह संसार के पाप रूपी कूप में गिरे लोगों को निकालने के लिए झग्गर है।
पत्रं पुष्पं फलं चैव श्रीतुलस्याः समर्पितम्।
रामाय मुक्तिमार्गस्य द्योतकं सर्वसिद्धिदम् ।।12।।
श्रीराम को समर्पित श्रीतुलसी का पत्र, फूल तथा फल सभी सिद्धियाँ
प्रदान करते हैं और मुक्ति का मार्ग प्रकाशित करते हैं।
माल्यानि तनुते लक्ष्मीः कुसुमान्तरितानि ह।
तुलस्याः स्वयमानीय निर्मितानि तपोधन ।।13।।
हे तपोधन सुतीक्ष्ण! अपने से तोड़कर लाये गये तुलसी के पत्र को फूलों से
ढँककर बनायी गयी माला अर्पित से लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
²त्रयो वेदास्त्रयो देवास्तिस्रः सन्ध्यास्त्रयोऽग्नयः।
सदा कुर्वन्ति माङ्गल्यं तुलसी यस्य मस्तके ।।14।।
जो मस्तक पर तुलसी धारण करते हैं उनका कल्याण तीनों वेद, तीनों
देव, तीनों सन्ध्याएँ और तीनों अग्नियाँ करती हैं।
- घ. "मेतदुद्धारकारणं। 2. घ. दो पंक्तियाँ अनुपलब्ध।
षष्ठोऽध्यायः (31)
तुलसीवाटिका यत्र पुष्पान्तरशतैर्युता।
शोभते राघवस्तत्र सीतया सहितः स्वयम्।।15।।
जहाँ सैकड़ों प्रकार के फूलों से युक्त तुलसी का बाग है, वहाँ स्वयं श्रीराम
सीता के साथ विराजमान रहते हैं।
कौतुकं शृणु देवेशि विनिर्माल्ये च वह्निना।
तापिते नाशमायाति ब्रह्महत्यादिपातकम्।।16।।
हे देवेशि! यह आश्चर्य की बात सुनो कि निर्माल्य से तुलसीदल चुनकर जो
अग्नि में जलाते हैं, इससे ब्रह्महत्या आदि के पापों का नाश होता है।
आरोपयन्ति ये नित्यं स्वयमेव मनीषिणः।
वनत्वेन समावृत्य कण्टकैस्तुलसीतरून्।।17।।
अर्चनाय तदेवालं तन्नामाभ्यर्हितं ततः।
जो विद्वान् व्यक्ति नियमित रूप से स्वयं (रक्षा के लिए) काँटों की बाड़ से
घेरकर तुलसी-वन लगाते हैं, वही पूजा-अर्चना के लिए पर्याप्त है; उससे भी श्रेष्ठ
उनके नाम से युक्त तुलसी की प्रशंसा की गयी है।
शालग्रामशिलातीर्थं¹ तुलसीदलवासितम्।।18।।
ये पिबन्ति पुनस्तेषां स्तन्यपानं न विद्यते।
शालग्राम शिला का जल जो तुलसीदल से सुवासित है, उसका पान
करनेवालों को पुनः स्तनपान नहीं करना पड़ता अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं
होता।
गाङ्गेयमिव तोयेषु पूज्येष्विव रघूत्तमः।।19।।
सरोजमिव पुष्पेषु शस्यते तुलसीदलम्।
जलों में गंगाजल, पूजनीय देवों में श्रीराम और फूलों में कमल के समान
पत्रों में तुलसीदल प्रशस्त है।
सम्पूज्य भक्त्या विधिवद्रामं श्रीतुलसीदलैः।।20।।
भवान्तरसहस्रेषु दुःखग्राहाद् विमुच्यते।
तुलसीदल से श्रीराम की भक्ति और विधान से पूजा कर मनुष्य हजार
जन्मों तक दुःखरूपी ग्राह से मुक्त हो जाता है।
- घ. शालग्रामशिलातोयं।
(32) ----------------- अगस्त्य-संहिता -----------------
वर्णाश्रमेतराणां च पूजा यस्यैव साधनम्।।२१।।
अपेक्षितार्थदं नान्यज्जगतस्वपि तपोधन।
वर्णाश्रम धर्म से बहिर्भूत और केवल पूजा को ही मोक्ष का साधन
बनानेवाले अर्थात् (दान आदि के अनधिकारी) यतियों के लिए संसार में तुलसीदल
को छोड़कर कोई दूसरी वस्तु नहीं है, जिससे उन्हें इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो सके।
पूजायोग्यैर्दलैः पत्रैः पुष्पैर्योऽर्चयेद्धरिम्।।२२।।
यान्ति¹ न्यूनातिरिक्तानि कर्माणि सफलान्यहो।
न तस्य नरकक्लेशो योऽर्चयेत् तुलसीदलैः।।२३।।
पापिष्ठो वाप्यपापिष्ठो सत्यं सत्यं न संशयः।
पूजा के योग्य दल, पत्र और पुष्प से जो श्रीहरि की पूजा करते हैं उनके
द्वारा पूजा-सामग्री में कमी या फालतू सामग्री के रहने पर भी कर्म सफल होते हैं।
जो तुलसीदल से पूजा करते हैं, उन्हें नरक का क्लेश नहीं होता, चाहे वे पापी हो
या निष्पाप हो; यह सत्य है, सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।
गङ्गातोयेन तुलसीदलयुक्तेन योऽर्चयेत्।
रामं निक्षिप्य शिरसि राममन्त्रेण सेचयेत्।।२४।।
निमील्य चक्षुषी धीरो हृदि रामं निधाय च।
असकृद् वा सकृद् वापि य एवमनुतिष्ठति।
ध्येयो भवति सर्वेषामयमेव विमुक्तये।।२५।।
तुलसीदल से युक्त गंगाजल से श्रीराम की पूजा करते हैं, उसे अपने शिर
पर धारण कर श्रीराम के मन्त्र से अभिषेक करते हैं, आँखों को धैर्यपूर्वक बंद कर
हृदय में श्रीराम को धारण करते हैं; ऐसा अनेक बार या एक बार भी अनुष्ठान
करते हैं, तो उनके ध्येय श्रीराम इसी से मोक्ष प्रदान करते हैं।
न सन्ति गुरवो यस्य नैव दीक्षाविधिः क्रमः।
रामरक्षां वदन्तो यः तुलसीदलमर्पयेत्।।२६।।
दीक्षान्तरशतेनापि नैतत्फलमवाप्यते।
- घ. तानि।
षष्ठोऽध्यायः (33)
जिनके कोई गुरु नहीं हैं, अथवा जिन्होंने दीक्षा भी नहीं ली है, न ही पूजा
की विधि एवं क्रम जानते हैं, वे भी यदि रामरक्षा-स्तोत्र का पाठ करते हुए
तुलसीदल अर्पित करते हैं, तो अन्य प्रकार की हजारों दीक्षा से भी ऐसा फल उन्हें
नहीं मिलेगा।
दीक्षितेष्वपि सर्वेषु रामदीक्षा तु उत्तमः।।27।।
न गुरुर्नैव कालश्च न देवान्तरपूजनम्¹।
तुलसीदलयुक्तं च रामार्चनमपेक्षते।।28।।
सभी प्रकार के दीक्षितों में श्रीराम की दीक्षा उत्तम है। इसके लिए न गुरु
न समय और न अन्य देवताओं की पूजा की अपेक्षा है केवल तुलसीदल से श्रीराम
की पूजा करनी चाहिए।
निर्माल्यतुलसीमालायुक्तो यद्यर्चयेद्धरिम्।
यद्यत्करोति तत्सर्वमनन्तफलदं भवेत्।।29।।
यदि कोई भगवान् को समर्पित निर्माल्य तुलसीदल को धारण कर श्रीहरि
की अर्चना करता है, तो वह जो जो कार्य करेगा उसे अनन्त फल मिलेगा।
यदि न्यूनं भवत्येव रामाराधनसाधनम्।
तुलसीपत्रमात्रेण युक्तं तत्परिपूर्यते।।30।।
यदि श्रीराम की पूजा-सामग्री में किसी वस्तु की कमी रहे, तो केवल
तुलसीदल डाल देने से पूर्ण हो जाता है।
शालग्रामशिलायाश्च गङ्गायाश्च तपोधन।
तुलस्याश्चैव माहात्म्यं नेष्टो वक्तुं हि विश्वसृक्।।31।।
हे तपोधन सुतीक्ष्ण! शालग्राम की शिला, गंगा और तुलसी का माहात्म्य
कहने में विश्व के निर्माता ब्रह्मा भी असमर्थ हैं।
भवभञ्जनमेतत्ते सर्वाभीष्टं प्रयच्छति।
नातः परतरं किञ्चित् पावनं विद्यते भुवि।।32।।
तुलसीदल पुनर्जन्म का नाश करनेवाला है तथा सभी कामनाओं की पूर्ति
करता है। संसार में इससे बढ़कर पवित्र दूसरा कुछ भी नहीं है।
यः कुर्यात् तुलसीकाष्ठैरक्षमालास्वरूपिणीम्।
कर्णमालां प्रयत्नेन कृतं तस्याक्षयं भवेत्।।33।।
- घ. देवान्तरसेवनम्।
Rarest Archiver
(34) अगस्त्य-संहिता
जो तुलसी लकड़ी से रुद्राक्ष की तरह माला बनाकर कानों में धारण करते
हैं, उनके द्वारा किये गये कार्य कभी नष्ट नहीं होते।
संघृष्य तुलसीकाष्ठं यो दद्याद्राममूर्द्धनि।
कर्पूरागुरुकस्तूरीचन्दनं च न तत्समम्।।34।।
तुलसी की लकड़ी को घिसकर श्रीराम के मस्तक पर लगावें। यह कर्पूर,
अगुरु, कस्तूरी और चन्दन भी इसके समान नही है।
तुलसीविपिनस्यापि समन्तात्पावनं स्थलम्।
क्रोशमात्रं भवत्येव गाङ्गेयस्येव पावनम्।।35।।
तुलसी-वन के चारों ओर की भूमि भी पवित्र होती है, जैसे गंगा के तट
पर एक कोस तक की भूमि पवित्र होती है।
तुलस्या रोपिता सिक्ता दृष्टा स्पृष्टा तु पावयेत्।
आराधिता प्रयत्नेन सर्वकामफलप्रदा।।36।।
तुलसी का वृक्ष रोपने से, सींचने से, दर्शन करने से स्पर्श करने से पवित्र
कर देता है और यत्नपूर्वक उसकी आराधना करने से सभी कामनाओं की पूर्ति
होती है।
चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमाणां विशेषतः।
स्त्रीणां च पुरुषाणां च पूजितेष्टं ददाति हि।।37।।
चारो वर्णों एवं आश्रमों के स्त्रियों एवं पुरुषों के द्वारा पूजित तुलसी
इच्छाओं की पूर्ति करती है।
प्रदक्षिणं भ्रमित्वा तु नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।
न तेषां दुरितं किञ्चित् प्रक्षीणमवशिष्यते।।38।।
जो तुलसी वृक्ष के दाहिने से घूमकर प्रतिदिन प्रणाम करते हैं उनके द्वारा
किये गये पाप कम होकर भी नहीं रहता अर्थात् समूल समाप्त हो जाता है।
अनन्यदर्शनाः प्रातर्ये पश्यन्ति तपोधन।
अहोरात्रकृतं पापं तत्क्षणात् प्रदहन्ति ते।।39।।
प्रातःकाल किसी दूसरी वस्तु को देखे बिना जो तुलसी का दर्शन करते हैं,
उनके द्वारा उस दिन और रात में किये गये पाप भस्मीभूत हो जाते हैं।
सप्तमोऽध्यायः (35)
तुलसी सन्निधौ प्राणान् ये त्यजन्ति मुनीश्वर।
न तेषां नरकक्लेशः प्रयान्ति परमां गतिम्¹ ।।40।।
हे मुनिश्रेष्ठ! तुलसी के समीप जो प्राण छोड़ते हैं, उन्हें नरक का क्लेश
नहीं होता और वे परम गति को प्राप्त करते हैं।
विधेयमविधेयं वा न्यूनमप्यथवाधिकम्।
तुलसीदलमादाय रामं ध्यात्वा समर्पयेत् ।।41।।
पूजन में जहाँ विधान हो या न हो, अन्य सामग्रियों में न्यूनता या
अतिरिक्तता हो, श्रीराम का ध्यान कर तुलसीदल समर्पित करें।
'रामाय नम' इत्येतदच्युताय नमस्ततः।
अनन्ताय नमस्तस्मात् प्रणवादि वदेदिदम् ।।42।।
कृतं सफलतामेति तुलसीसन्निधौ मुने।
पहले 'रामाय नमः' ऐसा कहें; फिर 'अच्युताय नमः' ऐसा कहें, फिर
'अनन्ताय नमः' कहें। इसके बाद प्रणव ॐकार आदि का उच्चारण करें। तुलसी
वृक्ष के निकट पूजा आदि कर्म करने से सफलता मिलती है।
तदेव पुण्यकालेषु सहस्रगुणितं भवेत् ।।43।।
शालग्रामशिलायाश्च तुलसीसन्निधौ मुने।
तेषां पुण्यवतां मृत्युस्ते मुक्ता नात्र संशयः ।।44।।
यही कर्म शुभ समय में किया जाये, तो हजार गुणा फल मिलता है।
तुलसी तथा शालग्राम की शिला के निकट जिस पुण्यवान् व्यक्ति की मृत्यु होती है,
वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
इत्यगस्त्यसंहितायाम् परमरहस्ये श्रीतुलसीमाहात्म्यकथनं नाम
षष्ठोऽध्यायः ।।6।।
अथ सप्तमोऽध्यायः
अगस्त्य वद त्वं श्रेष्ठ रामस्य मुनिसत्तम।
मन्त्रराजस्य माहात्म्यं यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा ।।1।।
सुतीक्ष्ण बोले- हे श्रेष्ठ महामुनि अगस्त्य! श्रीराम के मन्त्रराज का माहात्म्य
जो प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने कहा था, वह सुनाइए।
- घ. परमं पदम्।
(36) अगस्त्य-संहिता
अगस्त्य उवाच
सर्वं तवाभिधास्यामि पुरारेः पुरतः पुरा।
ब्रह्मा यदब्रवीत् तत् त्वं शृणुष्वावहितो महत्।।२।।
अगस्त्य बोले- प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने भगवान् शंकर के समक्ष जो
कुछ कहा था, वह सब माहात्म्य सुनाऊँगा, उसे ध्यान से सुनो।
अस्ति वाराणसी नाम पुरी शिवमनेाहरा।
सर्वदासौ शिवस्तत्र पार्वत्या सह तिष्ठति।।३।।
वाराणसी नाम की वह नगरी है, जो भगवान् शिव के वास करने से मन
मोह लेती है। वहाँ भगवान् शिव हमेशा पार्वती के साथ वास करते हैं।
तस्याप्युपासकाः सर्वे भक्त्या तं प्रतिपेदिरे।
मुमुक्षवः परित्यज्य सर्वं तत्रैव संस्थिताः।।४।।
सदा शिव शिवेत्येवं वदन्तः शिवतत्पराः।
शिवारर्पितमनःकायवाचः शिवपरायणाः।।५।।
भगवान् शिव की आराधना करनेवाले सभी भक्ति-भाव से अनुगमन
करने लगे। उस प्रकार मोक्ष की इच्छा करनेवाले सभी अन्य स्थलों को छोड़कर
वाराणसी में ही हमेशा 'शिव! शिव' का उच्चारण करते हुए, शिव मे मन, शरीर
एवं वाणी को अर्पित कर शिवभक्त होकर रहने लगे।
शिवस्तु तान् मुहुः पश्यन्नास्ते चिन्तासमाकुलः।
कथमेभ्यः प्रदास्यामि मुक्तिमित्यतिदुःखितः।।६।।
तत्रैवास्ते गणैः सार्द्धमृषिभिश्च सुरासुरैः।
भगवान् शिव उन्हें बार-बार देखते हुए चिन्तित हो गये कि इन्हें मुक्ति
किस प्रकार दूँगा। इस प्रकार वे अत्यधिक दुःखी थे। फिर भी भगवान् शिव सभी
गण, ऋषि, देवता एवं असुरों के साथ वहीं रहे।
एवं वसति भूर्लोकमाजगाम चतुर्मुखः।।७।।
तमीश्वरो निरीक्ष्यैव सम्भ्रमेणाकरोत् प्रियम्।
बहु संभावयामास यद्धितं तन्न्यवेदयत्।।८।।
Rarest Archiver
सप्तमोऽध्यायः (37)
इस प्रकार जब शिव वहाँ रहे थे, तब एक दिन ब्रह्मा पृथ्वी पर आये। उन्हें
देखकर भगवान् शिव ने उत्साह से उन्हें प्रसन्न किया और अनेक प्रकार से
अभ्यर्थना कर अपना अभीष्ट निवेदित किया।
ततः स प्राह भगवानीश्वरस्तं चतुर्मुखम्।
कुशलं ननु ते ब्रह्मन् चिराय त्वमिहागतः॥९॥
श्रीमदागमनेनाहं लोकपूज्योऽप्युपासकैः।
समाराध्य हि मां भक्तिं प्रार्थयन्ति मुमुक्षवः॥१०॥
केनोपायेन तेषां तत्फलं दास्यामि तद् वद।
इसके बाद भगवान् शिव ने ब्रह्मा से कहा- 'हे ब्रह्मा, आप कुशल तो हैं न!
बहुत दिनों के बाद यहाँ आये हैं! श्रीमान् के आगमन से आज मैं उपासकों के साथ
तीनों लोकों में पूज्य हूँ। मोक्ष चाहनेवाले मेरी आराधना कर भक्ति की प्रार्थना
करते हैं, अतः उस भक्ति का फल मोक्ष उन्हें किस प्रकार दूँ, यह बतलाइए।
ईश्वरेणैवमुक्तः सन् द्रुहिणोऽपि बभाण ह॥११॥
अस्त्युपायो गोपनीयः प्रादाद् यं मे रघूद्वहः।
तपः कृत्वा चिरायाहं तं परं लब्धवान् वरम्॥१२॥
ततोऽन्यो मदभिज्ञातो नास्त्युपायो महेश्वर।
मह्यमन्वग्रहीद् रामो न सन्देहोऽस्ति तत्र वै॥१३॥
भगवान् शंकर के ऐसा कहने पर ब्रह्मा भी बोले- “एक ऐसा उपाय है, जो
सभी को बतलाया नहीं जा सकता। यह मुझे स्वयं श्रीराम ने बतलाया था, जब
मैंने चिरकाल तक तपस्या कर उनसे वर प्राप्त किया था। हे महेश्वर! इससे भिन्न
उपाय मेरी जानकारी में नहीं है। मेरे ऊपर श्रीराम ने कृपा की थी, इसमें सन्देह
नहीं।
ईश्वर उवाच
अथ किं मे वदस्वेदं त्वं मां यद्यनुकम्पसे।
स तेनाभिहितो दध्यौ क्व कदा युक्तमित्यपि॥१४॥
ईश्वर (शिव) बोले- “यदि मेरे ऊपर कृपा हो तो बतलाइए कि ऐसा
कौन-सा उपाय है।” ऐसा कहने पर ब्रह्मा ने सबका बखान किया कि यह मन्त्र
कहाँ और किस समय देना चाहिए।
(38) अगस्त्य-संहिता
पुण्यतीर्थे च गङ्गायां लोलार्के सूर्यपर्वणि।
तस्मै मन्त्रवरं प्रादान्मन्त्रराजं षडक्षरम्।।15।।
गंगा के पावन तट पर सूर्यग्रहण के समय जब सूर्य चंचल रहते हैं ऐसे
स्थान और समय में ब्रह्मा ने शिव को यह षडक्षर मन्त्र दिया।
नियतः सोऽपि तत्रैव जजाप वृषभध्वजः।
मन्वन्तरशतं भक्त्या ध्यानहोमार्चनादिभिः।।16।।
वृषभध्वज शिव ने भी वहीं नियमपूर्वक भक्तिभाव से ध्यान, होम और
अर्चना करते हुए सौ मन्वन्तर तक मन्त्र का जप किया।
ततः प्रसन्नो भगवान् रामः प्राह त्रिलोचनम्।
वृणीष्व पदमिष्टं¹ ते देवानामपि दुर्ल्लभम्।।17।।
तदेवाहं प्रदास्यामि मा चिरं वृषभध्वज।
इसके बाद प्रसन्न होकर भगवान् श्रीराम ने भगवान् शंकर से कहा- “हे
वृषभध्वज! आप जो स्थान चाहें वह माँग लें। देवताओं के लिए भी जो दुर्लभ है,
वही मैं दूँगा! देर न करें।”
ततस्तमब्रवीद् विष्णुमीश्वरः परया मुदा।।18।।
दर्शनेनैव ते धन्याः कृतार्थाः वै ममेप्सितम्।
एते मदीयाः सर्वेऽपि मां परं पर्युपासते ।।19।।
मुक्त्यर्थं तत्कुरुष्वैषां तदेवाभिमतं मम।।
नातः परतरं किञ्चित् प्रार्थितं मम विद्यते।।20।।
इसके बाद परम प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने विष्णु से कहा- “आपके
दर्शन से ही हम धन्य हो गये; मेरी इच्छा सफल हो गयी। किन्तु मेरे ये भक्त जो
मुझे परम देव मानकर मेरी उपासना करते हैं, इनकी मुक्ति के लिए उपाय करें;
यही मेरी इच्छा है। इससे बढ़कर मेरी कोई प्रार्थना नहीं है।
एवं वदति तत्रैव तदानीं तदुपासकाः।
सर्वे ज्योतिर्मयाः सन्तो विष्णावेव लयं गताः।।21।।
ऐसा कहने पर उस समय वहीं पर भगवान् शिव के सभी उपासक
ज्योतिःस्वरूप होकर विष्णु में ही लीन हो गये।
- ख. यदभीष्टं।
सप्तमोऽध्यायः (39)
ततः प्रोवाच रामस्तं पुनरिष्टं यदस्ति ते।
ब्रूहीश्वरात्र तद् दास्ये प्रार्थनांदुर्लभं च यत्।।22 ।।
इसके बाद श्रीराम ने शिव से कहा- “हे ईश्वर! यदि और भी कोई आपकी
इच्छा हो तो यहाँ कहें। प्रार्थना के द्वारा जो दुर्लभ है वह में दूँगा।”
इत्युक्तः स पुनर्बत्रे हितं तद् भक्तवत्सलः।
सर्वलोकोपकाराय सर्वेषामपि दुर्ल्लभम्।।23।।
ये स्वतो वान्यतो वापि यत्र कुत्रापि वा प्रभो।
प्राणान् परित्यजन्त्यत्र मुक्तिस्तेषां फलं भवेत्।।24।।
विष्णु के द्वारा ऐसा कहने पर भक्तवत्सल भगवान् शिव ने पुनः सबके लिए
दुर्लभ और सबके उपकार के लिए कहा- “हे प्रभो! जो स्वाभाविक रूप से या
अस्वाभाविक रूप से जिस किसी स्थान में प्राणत्याग करते हैं, उनकी मुक्ति हो।”
गंगायां च तटे वापि यत्र कुत्रापि वा पुनः।
म्रियन्ते ये प्रभो देव मुक्तिर्नातो वरान्तरम्।।25।।
गंगा में या इसके तट पर जहाँ कहीं भी लोगों की मृत्यु हो, वे मुक्ति पायें
इसके अतिरिक्त कोई वर नहीं चाहिए।
विश्वामित्र्यां च यः स्नात्वा पश्येत् सिद्धेश्वरं सकृत्।¹
ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः।।26।।
विश्वामित्र्यां च ये नूनं स्नाति श्रद्धालवः सदा।
तेऽपि पापविनिर्मुक्ता यान्ति विष्णोः² परंपदम्।।27।।
विश्वामित्र की नदी (कोशी?) में स्नान कर जो सिद्धेश्वर का एकबार भी
दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाते हैं इसमें सन्देह नहीं।
कौशिकी नदी में जो हमेशा केवल श्रद्धापूर्वक स्नान करते हैं, वे भी पाप से मुक्त
होकर विष्णु का परम पद प्राप्त करते हैं।
श्रीराम उवाच
कुरुते मानवो यस्तु कलौ भक्तिपरायणः।
कल्पकोटिसहस्राणि रमते सन्निधौ हरेः।।28।।
श्रीराम बोले- कलियुग में जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कर्म करते हैं, वे हजारों
करोड़ कल्प तक श्रीहरि के समीप रमण करते हैं।
- क. कृती। 2. ख. शम्भोः।
(40) अगस्त्य-संहिता
क्षेत्रे तु तव देवेश यत्र कुत्रापि वा मृताः।
कृमिकीटादयोऽप्याशु मुक्ताः सन्तु न चान्यथा।।29।।
हे देवेश! आपके क्षेत्र में जहाँ कहीं भी मृत्यु पाकर कृमि, कीट आदि भी
शीघ्र ही मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
त्वत्तो वा ब्रह्मणो वापि लभन्ते ये षडक्षरम्।
जीवन्तो मन्त्रसिद्धाः स्युर्मृता मां प्राप्नुवन्ति ते।।30।।
आपसें या ब्रह्मा से जो षडक्षर मन्त्र पाते हैं, वे जीवित रहते मन्त्रसिद्ध हो
जाते हैं और मृत्यु के बाद मुझे प्राप्त करते हैं।
क्षेत्रेऽस्मिन् योऽर्चयेद् भक्त्या मन्त्रेणानेन शंकर।
अहं सन्निहितस्तत्र पाषाणप्रतिमादिषु।।31।।
हे शंकर! इस क्षेत्र में इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक जो मेरी अर्चना करते हैं, मैं
उनके समीप रहता हूँ; क्योंकि यहाँ पत्थर आदि की प्रतिमाओं में लीन मैं हूँ।
मुमूर्षोर्दक्षिणे कर्णे यस्य कस्यापि वा स्वयम्।
उपदेक्ष्यति मन्मन्त्रं स मुक्तो भविता शिव।।32।।
हे शिव! जिसकी मृत्यु निकट हो, वैसे किसी के दाहिने कान में दूसरा कोई
मेरा मन्त्र कहे या वह स्वयं जपे वह मुक्ति पायेगा।
इत्युक्तवति देवेशे पुनरप्याह शंकरः।
महान् महाभिमानोऽत्र क्षेत्रे त्रैलोक्यदुर्ल्लभे।।33।।
फलं भवतु देवेश सर्वेषां मुक्तिलक्षणम्।
मुमूर्षूणां च सर्वेषां दास्ये मन्त्रवरं परम्।।34।।
श्रीराम के ऐसा कहने पर पुनः शंकर ने कहा- "यह इस क्षेत्र की बड़ी
महिमा होगी, जो तीनों लोको में दुर्लभ है। हे देवेश! सबको मुक्तिस्वरूप फल
मिले। जिनकी मृत्यु निकट है, ऐसे सब लोगों को मैं यह मन्त्रराज प्रदान करूँगा।
इत्येवमीरितो विष्णुस्तस्मै दत्वा वरान्तरम्।
यदभीष्टं पुनस्तत्र तत्रैवान्तरधीयत।।35।।
इस प्रकार कहने पर विष्णु ने उन्हें अन्य इच्छित वर देकर फिर वहीं
अन्तर्धान हो गये।
अष्टमोऽध्यायः (41)
तदादितदभून्मुक्तिक्षेत्रं त्रैलोक्यपावनम्।
तत्र तिष्ठन्ति ये भक्त्या यावज्जीवं नियम्यते।।
मुक्तिभाजो भवन्त्येव सत्यं सत्यं न चान्यथा।।३६।।
इसके बाद उस समय से तीनो लोकों में पवित्र वाराणसी 'मुक्तिक्षेत्र' हो
गयी। वहाँ जो भक्तिपूर्वक वास करते और जीवन पर्यन्त नियम का पालन करते
हैं, वे मुक्ति के भागी होते हैं। यह सत्य है, सत्य है; यह अविचल है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये मन्त्रराजमाहात्म्यं नाम
सप्तमोध्यायः।
अथ अष्टमोऽध्यायः
कथं मन्त्रवरं चादौ केन भूमौ ¹ प्रतिष्ठितम्।
उपादिश कः ² कस्मै तन्मे ब्रूहि तपोधन।।1।।
सुतीक्ष्ण ने पूछा— हे तपोधन अगस्त्य मुनि! किसने सबसे पहले इस पृथ्वी
पर इस मन्त्रराज को प्रतिष्ठित किया। किसने किसे उपदेश किया, यह बतलाइए।
अगस्तिरुवाच
ब्रह्मा ददौ वसिष्ठाय स्वसुताय मनुं ततः।³
स वेदव्यासमुनये ददावित्थं गुरुक्रमात् ⁴।।2।।
ब्रह्मा ने अपने पुत्र वसिष्ठ को यह मन्त्र दिया। इसके बाद गुरु परम्परा से
वसिष्ठ ने वेदव्यास मुनि को दिया।
वेदव्यासमुखेनात्र मन्त्रो भूमौ प्रकाशितः।
वेदव्यासो महातेजाः शिष्येभ्यः समुपदिशत्।।3।।
वेदव्यास के मुख से यह मन्त्र पृथ्वी पर फैला। महान् तेजस्वी वेदव्यास ने
अपने शिष्यों को इसका उपदेश किया था।
गुरुः शिष्यगुणानादौ⁵ शौनकायाब्रवीन्मुनिः।
स शौनकेन पृष्टः सन्नाह मन्त्रान्तराणि च।।4।।
गुरु मुनि वेदव्यास ने पहले शिष्य के गुणों का उपदेश देकर शौनक को
इसका उपदेश किया। शौनक ने जब वेदव्यास से पूछा तब उन्होंने दूसरे मन्त्रों का
भी उपदेश करते हुए कहा—
- घ. भूमौ केन चादौ। 2. घ. तदादिदेशकः। 3. घ. पुनः। 4. घ गुरुक्रमः। 5. घ.
गुरुः शिष्यगणानादौ।
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(42) अगस्त्य-संहिता
यन्त्रपूजाविधिमपि होमं तर्पणलक्षणम्।
पुरश्चरणसंख्यां च होमद्रव्यान्तराणि च।।5।।
जपस्थानानि सिद्धिं च यदुक्तं ब्रह्मणा पुरा।
तदुक्तं सम्प्रयच्छामि यदि श्रोतुमिहेच्छसि।।6।।
“हे शौनक! यदि सुनना चाहो तो प्राचीन काल में ब्रह्मा ने जिस प्रकार
बतलाया था उसी प्रकार यन्त्र-पूजा की विधि, होम, तर्पण, पुरश्चरण की संख्या,
हवन-सामग्री, जप-स्थान और सिद्धि के विषय में मैं उपदेश करता हूँ।”
सुतीक्ष्ण उवाच
सतां सन्दर्शनं लोके तर्पयत्येव मङ्गलम्।
मन्दभाग्योऽप्यहं कस्मात् श्रोता कल्प्ये त्वयाधुना।।7।।
मुनिवर्याधुनैव त्वं यदुक्तं तत् प्रबोध मे।
सुतीक्ष्ण ने कहा– साधुओं का मंगलमय दर्शन ही तृप्ति प्रदान करता है।
तब जब आप-जैसे वक्ता इस समय हैं, तो मैं श्रोता होकर कैसे मन्दभाग्य रहूँ? मैं
भी आपसे सुनकर श्रोता बनना चाहता हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ! ब्रह्माजी ने जो कुछ कहा,
वह मुझे अभी सुनाइए।
अगस्तिरुवाच
देवतोपासकः शान्तो विषयेष्वपि निःस्पृहः।
अध्यात्मविद् ब्रह्मवादी वेदशास्त्रार्थकोविदः।।8।।
उद्धर्तुञ्चैव संहर्तुं समर्थो ब्राह्मणोत्तमः।
तन्त्रज्ञो यन्त्रमन्त्राणां धर्मवित्ता रहस्यवित्।।9।।
पुरश्चरणकृत् सिद्धो मन्त्रसिद्धः प्रयोगवित्।
तपस्वी सत्यवादी च गृहस्थो गुरुरुच्यते।।10।।
अगस्त्य बोले– देवों के उपासक, शान्त चित्तवाले, सांसारिक विषयों से
विरक्त, अध्यात्म को जाननेवाले, ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेवाले, वेद, शास्त्र
आदि के ज्ञानी, उद्धार और संहार दोनों करने में समर्थ, ब्राह्मणश्रेष्ठ, तन्त्रज्ञ, यन्त्र
एवं मन्त्र के ज्ञाता, धर्म और रहस्य के ज्ञाता, पुरश्चरण करनेवाले, सिद्धपुरुष,
जिन्हें मन्त्र सिद्ध हों तथा जो प्रयोगों का ज्ञान रखते हों, तपस्वी और सत्यवादी
गृहस्थ गुरु कहलाते हैं।
अष्टमोऽध्यायः (43)
आस्तिको गुरुभक्तश्च जिज्ञासुः श्रद्धया सह।
कामक्रोधादिदुःखोत्थं वैराग्यं वनितादिषु ।।11।।
सर्वात्मना तितीर्षुश्च भवाब्धेर्भवदुःखितः।
ब्राह्मणो धर्ममोक्षार्थी कामार्थं विगतस्पृहः ।।12।।
किं वा धर्मार्थमोक्षार्थी निष्कामश्चाथवा द्विजः।
मनोवाक्कायधर्मैस्तु नित्यं शुश्रूषको गुरोः।।13।।
धर्म में आस्था रखनेवाले, गुरु के भक्त, श्रद्धा के साथ सीखने की इच्छा
रखनेवाले, काम, क्रोध आदि से उत्पन्न दुःखों को देखते हुए स्त्रियों के प्रति वैराग्य
रखनेवाले, सभी प्रकार से संसार को पार करने की इच्छा रखनेवाले, संसार के
दुःखों से दुःखी, ब्राह्मण, धर्म और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले, निष्काम शिष्य होते
हैं। अथवा मन, वचन, कर्म, एवं धर्म से गुरु की नित्य सेवा करनेवाले, क्षत्रिय, एवं
वैश्य शिष्य होते हैं।
स्ववर्णाश्रमधर्मोक्तकर्मनिष्ठः सदाशुचिः।
शुचिव्रततमाः शूद्राः धार्मिकाः द्विजसेवकाः।¹।।14।।
अपने वर्ण और आश्रम के लिए कथित धर्म के अनुसार कर्म करनेवाले,
सदा पवित्र रहनेवाले, पवित्र नियमों का पालन करनेवाले द्विजों की सेवा करनेवाले,
धार्मिक शूद्र शिष्य होते हैं।
स्त्रियः पतिव्रताश्चान्ये प्रतिलोमानुलोमजाः।
लोकाश्चाण्डालपर्यन्तं सर्वेऽप्यत्राधिकारिणः ।।15।।
पतिव्रता स्त्रियाँ, चाहे वे प्रतिलोम विवाह से या अनुलोम विवाह से उत्पन्न
हो, वे भी शिष्या हो सकतीं हैं। चाण्डाल पर्यन्त सभी व्यक्ति यहाँ अधिकारी हैं।
स्वजातिकर्मनिरताः² भक्त्या सर्वेश्वरस्य ये।
उपदेशक्रमस्तेषां तत्तज्जात्यनुसारतः ।।16।।
अपनी जाति के कर्म में लगे हुए भक्तिपूर्वक जो सर्वेश्वर की आराधना
करते हैं, उनके लिए उनकी जाति के अनुसार दीक्षा का क्रम निर्धारित है।
अलसाभिमानिनः³ क्लिष्टा दाम्भिकाः कृपणास्तथा।
दरिद्राः रोगिणो दुष्टा⁴ रागिणो भोगलालसाः ।।17।।
- घ. शुचिव्रततमाः शुद्धाः धार्मिकाः द्विजसत्तमाः। 2. घ. स्वजातिधर्मनिरताः।
- घ. अलसाः मलिनाः। 4. घ. रुष्टाः।
(44) अगस्त्य-संहिता
असूयामत्सरग्रस्ताः शठाः परुषवादिनः।
अन्योपायार्जितधनाः परदाररताश्च ये।।18।।
विदुषां वैरिणश्चैव ह्यज्ञाः पण्डितमानिनः।
भ्रष्टव्रताश्च ये कष्टवृत्तयः पिशुनाः जनाः।।19।।
बद्धाशिनः¹ क्रूरचेष्टा दुरात्मानश्च निन्दकाः।²
एवमेवादयोऽप्यन्ये पापिष्ठाः पुरुषाधमाः।।20।।
अकृत्येभ्योऽनिवार्याश्च गुरुशिष्यासहिष्णवः।
एवंभूताः परित्याज्याः शिष्यत्वेनोपकल्पिताः।।21।।
आलसी, अभिमानी, कठोर हृदय वाले, घमण्डी, कृपण, दरिद्र, रोगी, दुष्ट
विषयों में आसक्त तथा भोग करने की लालसा रखनेवाले, सन्देह और ईर्ष्या
करनेवाले, धूर्त, कठोर वाणी बोलनेवाले, दूसरे तरीके से धन अर्जित करनेवाले,
दूसरे की पत्नी में आसक्त, विद्वानों से शत्रुता रखनेवाले, मूर्ख, स्वयं को पण्डित
माननेवाले, नियम से च्युत, कठोर कार्य करनेवाले, चुगली करने वाले, शरीर को
बाँधकर अर्थात् सिला हुआ वस्त्र पहनकर खानेवाले, क्रूर व्यवहार करनेवाले, दुष्ट,
दूसरे की निन्दा करनेवाले - ये सब और अन्य प्रकार के भी पापाचरण करनेवाले
नीच पुरुष हैं। बुरे कार्य करने से मना करने पर भी नहीं रुकनेवाले और गुरु एवं
उनके शिष्यों के प्रति असहिष्णु व्यक्ति जो शिष्य बनने के लिए परीक्ष्य हों, उनका
परित्याग करना चाहिए।
यदि तेऽभ्युपकल्पेरन् देवताक्रोधसभाजनाः।
भवन्ति हि दरिद्रास्ते पुत्रदारविवर्जिताः।
नरकाञ्चैव देहान्ते तिर्यक्षु भवन्ति ते।।22।।
यदि ऐसे व्यक्ति शिष्य बनते हैं तो वे शिष्य देवता के कोप के भागी,
दरिद्र, सन्ततिविहीन होते हैं; मरणोपरान्त उन्हें नरक मिलता है तथा पुनर्जन्म
लेकर पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनि में उत्पन्न होते हैं।
ये गुर्वाज्ञां न कुर्वन्ति पापिष्ठाः पुरुषाधमाः।
न तेषां नरकक्लेशनिस्तारो मुनिसत्तम।।23।।
हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! जो गुरु की आज्ञा नहीं मानते वे पापी पुरुषों में नीच
हैं। उन्हें नरक के क्लेश से छुटकारा नहीं मिलता है।
- घ. बह्वाशिनः। 2. घ. निन्दिताः
२. मन्त्र-दीक्षा, न्यास व षडङ्ग-पूजा पद्धति
अष्टमोऽध्यायः (45)
— — — — — — — — — — — — — — —
क्षुद्राः¹ प्रलोभितास्तैस्तैर्निन्दितेभ्यो दिशन्ति ये।²
विनश्यत्येव तत्सर्वं सैकते शालिबीजवत् ।।२४।।
क्षुद्र बुद्धि वाले, प्रलोभन के फेर में पड़कर जो जो निन्दित कार्य के लिए
किसी को उकसाते हैं, उस गुरु का भी सबकुछ बालू की ढेर पर पड़े धान के बीज
के समान नष्ट हो जाता है
यैः शिष्यैः शश्वदाराध्याः गुरवो ह्यवमानिताः।
पुत्रमित्रकलत्रादिसंपद्भ्यः प्रच्युता हि ते।।२५।।
जो शिष्य बार बार अपने आराध्य गुरुओं का अपमान करते हैं, वे पुत्र,
मित्र, पत्नी और धन सम्पत्ति से विहीन हो जाते हैं।
अधिक्षिष्य गुरून् मोहात् परुषं प्रवदन्ति ये।
शूकरत्वं भवत्येव तेषां जन्मशतेष्वपि।।२६।।
गुरुओं पर आक्षेप लगाकर मूर्खतावश जो गुरु के प्रति कठोर वचन कहते
हैं, वे सौ जन्मों तक सूअर होते हैं।
ये गुरुद्रोहिणो मूढाः सततं पापकारिणः।
तेषां च यावत्सुकृतं दुष्कृतं स्यान्न संशयः।।२७।।
जो मूर्ख गुरु से द्रोह करते हुए हमेशा पापाचरण करते हैं उनके द्वारा किये
गये अच्छे कार्य भी बुरे फल देते हैं।
तारादिर्मुक्तये लक्ष्मीबीजादिर्भुक्तये तथा।
वाक्सिद्धये च वाग्बीजं प्रणवान्ते विनिक्षिपेत् ।।२८।।
मोक्ष के लिए पंचाक्षर मन्त्र (रामाय नमः) में तार (ॐकार) लगाकर,
सुख-सम्पत्ति के लिए लक्ष्मीबीज (श्रीं) लगाकर तथा वाणी की सिद्धि के लिए
वाग्बीज(ऐं) लगाकर प्रणव ॐकार अन्त में जोड़कर जपना चाहिए।
मान्मथं सर्ववश्याय पदं तत् त्रितयं पुनः।
तारान्ते चैव रामादौ सर्वार्थं विनियोजयेत् ।।२९।।
सर्ववशीकरण के लिए कामबीज (क्लीं) लगाकर तथा सर्वकामना सिद्धि के
लिए तीनों पदों ह्रीं, श्रीं, ऐं के बाद तार (ॐकार) लगाकर रामादि का जप करें।
- घ. क्षुब्धाः। 2. घ. निन्दितानादिशन्ति च।
(46) अगस्त्य-संहिता
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रामाय नम इत्येव मन्त्रः पञ्चाक्षरो मनुः।
रामित्येकाक्षरो मन्त्रो राम इत्यपरो मनुः ।।३०।।
'रामाय नमः' यह एक मन्त्र पाँच अक्षरों का है, 'रां' यह एकाक्षर मन्त्र है
तथा 'राम' यह एक अन्य मन्त्र है।
चन्द्रान्तश्चैव भद्रान्तः पुनर्द्वेधा विभज्यते।
स्वकामशक्तिवाग्लक्ष्मीताराद्यः पञ्चवर्णकः ।।३१।।
षडक्षरः षड्विधः स्याच्चतुर्वर्गफलप्रदः।
पंचाशन्मातृकामन्त्रवर्णप्रत्येकपूर्वकः ।।३२।।
'रामचन्द्राय नमः' और 'रामभद्राय नमः' इस प्रकार दो मन्त्र हो जाते हैं।
स्वबीज (रां), कामबीज(क्लीं), शक्ति(ह्रीं), वाक्(ऐं), लक्ष्मी(श्रीं) तथा तार (ॐ)
इन छह बीजों का आदि में प्रयोग करने से पंचाक्षर मन्त्र छह प्रकार के षडक्षर
मन्त्र हो जाते हैं। जिनमें पचास मातृकावर्णों के बीजरूप प्रत्येक के आदि में
जोड़कर जप किया जाता है।
लक्ष्मीवाङ्न्मथादिश्च सर्वत्र प्रणवादिकः।
रामश्च चन्द्रभद्रान्तश्चतुर्थ्यन्तो हृदा ^1 सह ।।३३।।
बहुधा विद्यते तारसहितोऽयं षडक्षरः।
लक्ष्मीबीज, वाक्बीज, कामबीज प्रारम्भ में लगाकर तथा प्रत्येक मन्त्र में
तार जोड़कर 'राम' शब्द 'चन्द्र' और 'भद्र' जोड़कर चतुर्थी विभक्ति में 'नमः' के
साथ तथा तारक बीज ॐकार के साथ अनेक प्रकार के यह षडक्षर मन्त्र होते हैं।
एकधा च द्विधा त्रेधा चतुर्धा पंचधा तथा ।।३४।।
षट्सप्ताष्टधा चैव बहुधायं व्यवस्थितः।
एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षर, चतुरक्षर, पंचाक्षर, षडक्षर, सप्ताक्षर, अष्टाक्षर
एवं अनेकाक्षर, इन अनेक प्रकार के मन्त्रों का निरूपण किया गया है।
मन्त्रोऽयमुपदेष्टव्यो ब्राह्मणाद्यनुरूपतः ।।३५।।
संपूज्य विधिवत् तत्र संस्थाप्य कलशं नवम्।
तत्सामर्थ्यानुरूपेण मृत्सुवर्णमयं तथा।
दात्रा प्रदीयते यद्वन्मन्त्रो देयस्तथा मुने ।।३६।।
- क. नमः।
नवमोऽध्यायः (47)
हे मुनि सुतीक्ष्ण! ब्राह्मण आदि जाति के शिष्यों को उनके अनुरूप विधानपूर्वक
पूजा कर सामर्थ्य के अनुसार सोने का या मिट्टी के नवीन कलश की स्थापना कर
यह मन्त्र उसी प्रकार शिष्य को दें जैसे कोई दाता किसी को धन देता है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये गुरुशिष्यलक्षणं
नामाष्टमोऽध्यायः।।8।।
अथ नवमोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
किं तन्मन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपन्तस्य चानघ।
कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र लेख्यः किं तेन वा भवेत्।।1।।
हे ब्रह्मन्! मुनि अगस्त्य! वह मन्त्र क्या है? इसका स्वरूप क्या है? किस
मन्त्र से किस प्रकार और किस स्थान पर उपासना करनी चाहिए तथा अंकित
करने योग्य यन्त्र कैसा है, यह सब हमें बतलायें।
सुतीक्ष्ण उवाच
किं तद्यन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपं चास्य चानघ।
कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र जाप्यं किं तेन वा भवेत्।।1।।
सुतीक्ष्ण बोले- हे मुनि अगस्त्य! वह यन्त्र क्या है, इसका स्वरूप क्या है
और किन मन्त्रों से कैसे कहाँ जप करना चाहिए और उसका क्या फल मिलेगा?
अगस्त्य उवाच
मनोरथकराण्यत्र नियम्यन्ते तपोधन।
कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घदुःखनियन्त्रणात् ।¹।2।।
यन्त्रमित्याहुरेतस्मिन् रामः प्रीणाति पूजितः।
यन्त्रं मन्त्रमयं प्राहुर्देवता मन्त्ररूपिणी।।3।।
अगस्त्य बोले- यहाँ में मनोरथ पूरा करनेवाले यन्त्रों की विधि बतलाता
हूँ। काम, क्रोध आदि दोषों से उत्पन्न दुःखों को नियन्त्रित करने के कारण इसे
यन्त्र कहा जाता है। इसपर पूजित श्रीराम प्रसन्न होते हैं। मन्त्र से युक्त यन्त्र
होता है, जिसमे मन्त्र-स्वरूप देवता स्वयं होते हैं।
- घ. कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घयन्त्रनियन्त्रणात्।