अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
एकोनत्रिंशोऽध्यायः (213)
अग्रहण अथवा वैशाख मास की पूर्णिमा को चन्द्र तारा आदि के बली होने
पर मूल आदि नक्षत्र-दोष न रहने पर विधानपूर्वक श्रीराम की प्रतिष्ठा करें।
प्रयत्न कर विधान से अपनी शक्ति के अनुसार भक्ति के साथ स्थापना करें।
गोपालस्य प्रतिष्ठायां श्रावणं शस्यते सदा।
नृसिंहानां तु वैशाखे केशवस्यापि शस्यते।।20।।
चैत्रे तु रामचन्द्रस्य माघे वापि बलान्विते।
अनन्तस्यापि माघे स्यादन्येषां च यथारुचि ।।21।।
श्रीकृष्ण की स्थापना में श्रावण मास, नृसिंह और केशव आदि की स्थापना
में वैशाख प्रशस्त मास हैं। श्रीराम की स्थापना चैत्र मास में और चन्द्रतारा आदि
बली रहे तो माघ में एवं अनन्त भगवान् की स्थापना माघ में करें। अन्य देवताओं
की स्थापना अपनी रुचि के अनुसार करें।
सर्वकालेषु सर्वत्र प्रतिष्ठाप्यो रघूत्तमः।
न लग्नं न तिथिवारो न नक्षत्रबलं न च ।।22।।
सभी कालों में, किसी भी स्थान पर श्रीराम की स्थापना करें, इसके लिए,
लग्न, तिथि, दिन और नक्षत्र के बल की गणना अपेक्षित नहीं है।
चैत्रशुद्धनवम्यां च स्थाप्यो रामो मुमुक्षुभिः।
सर्वान् कामानवाप्नोति माघे शुभबलान्विते ।।23।।
कुर्यात् श्रीरामचन्द्रस्य प्रतिष्ठां वै नरोत्तमः।
मार्गशीर्षे च वैशाखेऽप्येवमेव यथाविधिः।।24।।
मोक्ष चाहनेवाले चैत्र शुक्ल नवमी को श्रीराम की स्थापना करें। इससे
उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। माघ मास में चन्द्र और तारा का शुभ
बल देखकर मनुष्यों में श्रेष्ठ श्रीराम की स्थापना करें। अग्रहण और वैशाख में भी
यही नियम है।
सूर्यग्रहे महापुण्ये कुरुक्षेत्रे विधानतः।
कृतैर्यत्पुण्यमाप्नोति तुलापुरुषाकादिभिः ।।25।।
तत्पुण्यं प्राप्नुयान्मर्त्यः प्रतिष्ठाप्य रघूत्तमम्।
यः कुर्याद्रामचन्द्रस्य प्रतिष्ठां विधिवन्नरः।।26।।
ऐहिकानखिलान् भोगान् भुक्त्वा नारायणो भवेत्।
(214) अगस्त्य-संहिता
वर्द्धते तत्कुलं भौमे कल्पकोटिशताधिकम् ।। 27 ।।
नापण्डितो नापि मूर्खो न दरिद्रोऽपि तत्कुले।
नावैष्णवोऽपि जायेत कदाचिदपि कुत्रचित् ।। 28 ।।
सूर्य-ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में विधानपूर्वक तुलापुरुष आदि दान करने से
जो पुण्य मिलता है, वही श्रीराम की मूर्तिप्रतिष्ठा करके मिलता है। जो मनुष्य
विधानपूर्वक श्रीरामचन्द्र की मूर्ति स्थापित करते हैं, वे सांसारिक सभी सुखों का
भोगकर नारायण हो जाते हैं। इस संसार में उनके कुल की वृद्धि सौ करोड़ कल्पों
तक होती है। उनके कुल में सभी विद्वान् होते हैं कोई न तो मूर्ख होता है, न
दरिद्र। कभी कहीं भी उनके कुल में विष्णु की भक्ति से हीन नहीं होते।
लौहेन निर्मिता वापि दारुणा वा यथाविधि।
कारयेत् प्रतिमां रम्यां श्रीरामस्य शुभे दिने ।। 29 ।।
लक्ष्मणस्यापि सीतायाः मारुतेश्च विशेषतः।
सीता स्वर्णनिभा कार्या लक्ष्मणोऽपि तथा भवेत् ।। 30 ।।
लोहा अथवा काष्ठ से शुभ दिन में श्रीराम की सुन्दर प्रतिमा का निर्माण
कराना चाहिए। अपने अपने वैशिष्ट्य के अनुसार लक्ष्मण, सीता और हनुमान्
की भी प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए। सीता की प्रतिमा सोना के समान
चमकीली होनी चाहिए, लक्ष्मण की भी उसी प्रकार होनी चाहिए।
संशोध्य देवतागारं निर्माणस्थानमुत्तमम्।
शल्यलोष्टादिवर्ज्यञ्च कुर्याद्यत्नेन शोधयेत् ।। 31 ।।
खनेत् तद्भूप्रदेशान्तं जलोत्पत्तिर्यथा भवेत्।
यथा पाषाणसिकताः पूरयेत्पूर्ववत् सुधीः ।। 32 ।।
कुट्टिमं च प्रकुर्वीत निवासस्थानमुत्तमम्।
शुद्धरम्यशिलापट्टैरनेकेश्च सुविस्तरैः ।। 33 ।।
देववासप्रदेशं तु पूर्ववद्भूमिकोन्नतम्।
हस्तद्वयोन्नतं कुर्यात् सुविस्तीर्णं मनोरमम् ।। 34 ।।
कुर्याद्दिवालयं रम्यं सर्वनेत्रोत्तमं परम्¹।
- क. सर्वनेत्रोत्सवं यथा।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः (215)
प्राकारं कारयेत्तत्र *चतुर्गोपुरसंयुतम्¹ ।।३५।।
पीठं रम्यं प्रकुर्वीत शिलायां चोन्नतोन्नतम्।
हस्तद्वयायतं कुर्याच्चतुरस्रं सुशोभनम् ।।३६।।
मन्दिर तथा चारों ओर के स्थान से काँटा, गड़ा हुआ ढेला (पत्थर, ईंट
आदि का टुकड़ा) प्रयत्नपूर्वक हटाकर शोधन करें। तब उस स्थान पर तब तक
खुदाई करें, जबतक पानी नहीं छूट जाता है। तब उस गड्ढे को पत्थर और बालू
आदि से भर दें और ऊपर पत्थर कूट कूट कर दृढ़ बनावें। इस उत्तम निवास
स्थान को शुद्ध तथा सुन्दर बड़े शिलापट्टों से मन्दिर की भूमि को पूर्वोक्त विधि से
दो हाथ ऊँची और सुन्दर रूप से विस्तृत करें। वहाँ पर रम्य देवालय का निर्माण
करें, जो सबकी आँखों को अच्छा लगे। वहाँ चारों ओर मेहराव से युक्त भवन
बनाएँ। उसमें पत्थर की शिला पर क्रमशः ऊँचा करते हुए सुन्दर पीठ का निर्माण
करावें। यह पीठ दो हाथ लंबा-चौड़ा चौकोर और सुन्दर होना चाहिए।
अग्रभागे हनूमन्तं पीठस्य विलिखेन्मुने।
पीठशुद्धिं प्रकुर्वीत वक्ष्यमाणविधानतः ।।३७।।
लिखेदाग्नेयदिग्भागे सुग्रीवं द्विभुजं पुनः।
दक्षिणे भरतं चैव नैर्ऋत्ये च विभीषणम् ।।३८।।
पश्चिमे लक्ष्मणं चैव वायव्येऽङ्गदमेव च।
शत्रुघ्नं चोत्तरे भागे ऐशान्यामृक्षनायकम्² ।।३९।।
इस पीठ के अग्रभाग में हनुमान् की आकृति बनावें। तब आगे कहीं
जानेवाली विधि से पीठ की शुद्धि करें। अग्निकोण में दो बाहों वाले सुग्रीव,
दक्षिण में भरत, नैर्ऋत्य कोण में विभीषण पश्चिम में लक्ष्मण, वायव्य में अंगद,
उत्तर में शत्रुघ्न और ईशान कोण में जाम्बवान् को उत्कीर्ण करें।
ततः श्रीरामचन्द्रं च पीठस्योपरि वै लिखेत्।
सौवर्णे राजते वापि ताम्रे वापि यथाविधि ।।४०।।
शिलायां वा प्रकुर्वीत चतुरस्रं सुशोभितम्।
द्वात्रिंशदङ्गुलं वापि षोडशाङ्गुलमेव च। ।४१।।
देवस्य स्थापनस्थाने तद्यन्त्रं स्थापयेन्मुने।
- ग. रम्यगोपुरसंयुतम् । 2. ग. ऐशान्ये जाम्बुनायकम् ।
(216) अगस्त्य-संहिता
इसके बाद पीठ के ऊपर श्रीराम को सुवर्ण, रजत, ताम्र अथवा प्रस्तर के
पीठ पर विधि के अनुसार उत्कीर्ण करें। देवता की स्थापना के स्थान पर उनके
यन्त्र की स्थापना करें। यह यन्त्र सुन्दर चौकोर, बत्तीस अथवा सोलह अंगुल
परिमाण का होना चाहिए।
अङ्कुरार्पणमादौ तु सप्तपञ्चत्रिवासरे।।42।।
यथाविधि प्रकुर्वीत चन्द्रताराबलान्विते।
सबसे पहले सात, पाँच अथवा कमसे कम तीन दिन पूर्व अंकुरार्पण चन्द्र
तारा आदि के बली होने पर विधान से करें।
गणेशप्रार्थनां कुर्यात् सर्वविघ्नोपशान्तये।।43।।
सुवर्णप्रतिमां पूज्यां वस्त्रद्वयसमन्विताम्।
कुटुम्बिने दरिद्राय ब्राह्मणाय निवेदयेत्।।44।।
एकाक्षरो गणेशस्य ध्यानमार्गेण यत्नतः।
श्रीरामप्रतिमां वापि दशाक्षरविधानतः।।45।।
आत्ममूलेन वाचापि द्वादशाक्षरमार्गतः।
येन केनापि मार्गेण कारयेद्विधिवन्मुने।।46।।
तब गणेश की प्रार्थना सभी प्रकार के विघ्नों की शान्ति के लिए करें।
जोड़ा वस्त्र से युक्त स्वर्ण-प्रतिमा की पूजा कर गृहस्थ एवं दरिद्र ब्राह्मण को दान
करें। गणेश का एकाक्षर मन्त्र है, जिसका ध्यान कर अथवा श्रीराम की प्रतिमा
को दशाक्षर मन्त्र के विधान से अथवा अपने मूल मन्त्र से अथवा द्वादशाक्षर मन्त्र
की विधि से जिस किसी भी प्रकार से स्थापना कराएँ।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये श्रीरामप्रतिष्ठाविधिर्नाम
एकोनत्रिंशोऽध्यायः।।29।।
अथ त्रिंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
कथं दशाक्षरादीनां मार्गो वै मुनिसत्तम।
आचक्ष्व सरहस्यं मे त्वयि भक्तस्य सुव्रत।।1।।
त्रिशोऽध्यायः (217)
सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे मुनिश्रेष्ठ! दशाक्षर आदि मन्त्र की कैसी पद्धति है, यह
मुझे रहस्य के साथ बताएँ, जो आपकी दृष्टि में हो।
अगस्त्य उवाच।
साधु वक्ष्यामि ते सर्वं शृणुष्वावहितो मुने।
सीतालङ्कृतवामाङ्कं द्विभुजं चारुलोचनम् ।। २ ।।
वामहस्तेन सीतायाः स्पृशन्तं स्तनमण्डलम्।
ज्ञानमुद्रायुतेनान्येनापि तल्लोकसुन्दरम् ।। ३ ।।
धनुर्द्वययुतेनापि लक्ष्मणेन सुशोभितम्।
कोटिकन्दर्पसंकाशं राघवं करुणाकरम् ।। ४ ।।
उपविष्टं पद्ममध्ये वीरासनमनोहरम्।
हनुमत्सेवितं चाग्रे कुर्यादेवं मनोहरम् ।। ५ ।।
अगस्त्य बोले- हे मुनि! अच्छा, मैं तुम्हें सब कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक
सुनो। जिनके वामभाग में सीता शोभित हों, बायें हाथ से सीता के स्तनमण्डल को
स्पर्श करते हुए दूसरे हाथ से ज्ञानमुद्रा धारण करनेवाले दो भुजाओं वाले एवं
सुन्दर आँखों वाले श्रीराम का ध्यान करें। जो दो धनुष लिए हुए लक्ष्मण से
शोभित हैं, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर हैं, कमल के मध्य में वीरासन में बैठे
हुए हैं, करुणा करनेवाले हैं तथा जिनके आगे हनुमान आज्ञा की प्रतीक्षा में है।
दशाक्षरोऽयं कथितो विधिना मुनिपुङ्गवैः।
नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं विभुम् ।। ६ ।।
द्विभुजं कंजनयनं दिव्यसिंहासने स्थितम्।
वसिष्ठाद्यैः परिवृतं हाररत्नकिरीटिनम् ।। ७ ।।
सीतासंलापचतुरं दिव्यगन्धादिशोभितम्।
चापद्वयकरेणारात् सेवितं लक्ष्मणेन च ।। ८ ।।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च पार्श्वयोरुपसेवितम्।
ऐसे श्रीराम का दशाक्षर मन्त्र 'क्लीं सीतारामचन्द्राभ्यां नमः' है। नीलकमल
के समान श्यामल वर्णवाले, पीताम्बरधारी, दो हाथों वाले, कमलनयन, दिव्य
सिंहासन पर स्थित, वसिष्ठ आदि पार्षदों से चारो ओर से घिरे हुए, रत्न का मुकुट
धारण करनेवाले, श्रीसीता के साथ आलाप करने में चतुर, दिव्य चन्दन आदि से
Rarest Archiver
(218) अगस्त्य-संहिता
शोभित दो धनुष हाथ में लिए हुए लक्ष्मण द्वारा दूर से सेवित, दोनों पार्श्वों में
शत्रुघ्न और भरत से सेवित प्रभु श्रीराम ध्यातव्य हैं।
ध्यायन्ननन्यधी रामं द्वादशाक्षरमन्वहम् ।।९।।
प्रजपेद्दीक्षितो नित्यं श्रीरामन्यासपूर्वकम्।
मन्त्रसन्ध्यां विधायैव त्रिकाले पूजयेत् सदा ।।१०।।
ऐसे श्रीराम का ध्यान करते हुए दीक्षित द्वादशाक्षर मन्त्र 'रां क्लीं ह्रीं ऐं हुं
क्षौं श्रीं आं क्रौं फट् स्वाहा' प्रतिदिन श्रीराम का न्यास और मन्त्रसन्ध्या कर जप
करे और तीनों कालों में पूजन करे।
क्रीडन्तं सीतया सार्द्धं नीलजीमूतसन्निभम्।
वृषाकपिच्छाद्यष्टेन वसिष्ठेन स्मृतं विभुम् ।।११।।
तद्गदादाय सौमित्रं चापबाणग्रहोद्यतम्।
चापद्वयभृतं पश्चाल्लक्ष्मणं तु सुशोभनम् ।।१२।।
सर्वलोकहितोद्युक्तं पीताम्बरधरं विभुम्।
ध्यायन् सप्ताक्षरं जप्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।^1 ।।१३।।
सीता के साथ क्रीडा करते हुए, नील मेघ के समान, वृषाकपिच्छ^1 अर्थात्
हनुमान् आदि आठ देवताओं और वसिष्ठ के द्वारा स्मरण किए गये श्रीराम,
जिनके पीठ पीछे दो धनुष लिए हुए सुन्दर रूप वाले लक्ष्मण धनुष और बाण
लेकर तैयार हैं। ऐसे श्रीराम, जो सभी लोकों की भलाई करने के लिए तैयार हैं,
पीत वस्त्र धारण करते हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर सात अक्षरों वाला मन्त्र
जपकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
सुनीलाम्बुदसंकाशं धनुर्बाणकरं मुने।
ध्यायेदष्टाक्षरं जप्त्वा राम एव भवेत्ततः ।।१४।।
सुन्दर नील मेघ के समान तथा हाथ में धनुष और बाण धारण करने वाले
श्रीराम का ध्यान करते हुए अष्टाक्षर मन्त्र का जपकर इससे साधक राम ही हो
जाये।
ज्ञानमुद्रालसद्बाहुं हनुमत्सेवितं पुनः।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च लक्ष्मणेन समावृतम् ।।१५।।
ध्यायेदेकाक्षरं जप्त्वा मुक्तो भवति भाजनम्।
- वैदिक साहित्य में 'वृषाकपि' वानरवाची शब्द प्रयुक्त हुआ है।
त्रिंशोऽध्यायः (219)
श्रीराम हाथ से ज्ञान मुद्रा धारण किए हुए हैं, हनुमान् जिनकी सेवा कर
रहे हैं तथा शत्रुघ्न, भरत और लक्ष्मण से घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान
करते हुए आधार स्वरूप एकाक्षर मन्त्र का जप कर साधक मोक्ष प्राप्त करता है।
अन्याश्च मूर्त्तयः सन्ति बहवो मुनिसत्तम ।।16।।
आसामन्यतमा मूर्तिः स्थापनीया प्रयत्नतः।
मन्त्राँस्तु वैष्णवानुक्त्वा मूलमन्त्रस्य चेतसा ।।17।।
देवस्यापि प्रकुर्वीत ततोऽस्ति किमतः परम्।
प्राणप्रतिष्ठां तन्न्यासान् यथाविधि विचक्षणाः ।।18।।
लक्ष्मणस्यापि मन्त्रस्य न्यासं देव्याश्च मारुतेः।
शत्रुघ्नभरतादीनां कुर्याद्यत्नेन देशिकः ।।19।।
हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! श्रीराम की ऐसी अन्य अनेक मूर्तियाँ हैं। इनमें से
एक मूर्ति की स्थापना यत्नपूर्वक करनी चाहिए। वैष्णव-मन्त्रों का उच्चारण कर
मूल मन्त्र का उचित प्रयोग करें, इससे बढ़कर और क्या होगा? लक्ष्मण, देवी
सीता तथा हनुमान् के दिव्य-मन्त्रों को तथा शत्रुघ्न, भरत आदि के मन्त्रों का भी
न्यास प्रयोग-साधक यत्नपूर्वक करें।
सुतीक्ष्ण उवाच
लक्ष्मणादिमनूनां च विधानं लक्षणं मुने।
वक्तुमर्हसि मे सर्वं भक्तस्यैवं दयानिधे ।।20।।
सुतीक्ष्ण ने कहा- हे दयानिधि अगस्त्य! लक्ष्मण आदि के मन्त्रों के लक्षण
एवं विधान भी आप मुझे कह सकते हैं, क्योंकि मैं भी भक्त हूँ।
अगस्त्य उवाच
शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सुविस्तरमनेकधा।
रेफपूर्वं समुद्धृत्य विन्दुलक्षणसंयुक्तम् ।।21।।
ङेन्तोयं लक्ष्मणमनुर्नमसा च समन्वितः।
ऋषिः स्यामहमेवात्र गायत्रीच्छन्द उच्यते ।।22।।
लक्ष्मणो देवता प्रोक्ता लं बीजं शक्तिरेव हि।
नमः स्याद्विनियोगे हि पुरुषार्थचतुष्टये ।।23।।
दीर्घमात्राञ्च बीजेन षडङ्गानि समाचरेत्।
(220) अगस्त्य-संहिता
अगस्त्य बोले- सुनो! मैं अनेक प्रकार से विस्तारपूर्वक तुम्हें सबकुछ कहता
हूँ। रेफ के साथ बिन्दु लगाकर पहले बोलना चाहिए। तब डेन्त लक्ष्मण पद
(लक्ष्मणाय) 'नमः' पद जोड़कर बोलें। यह लक्ष्मण मन्त्र है। इसका ऋषि मैं हूँ,
गायत्री छन्द कहा जाता है। इसके देवता लक्ष्मण हैं, लं बीज है और 'नमः' शक्ति
है। विनियोग में पुरुषार्थचतुष्टय कामना है। बीज के साथ दीर्घमात्राओं को
जोड़कर षडंगों का न्यास करें।
द्विभुजं स्वर्णरुचिरतनुं पर्णनिभेक्षणम्।
धनुर्बाणकरं रामसेवासंसक्तमानसम् ॥२४॥
दो भुजाओंवाले, स्वर्ण के समान सुन्दर शरीरवाले तथा कोमल पत्र के
समान आँखोंवाले, हाथों में धनुष और बाण धारण करनेवाले और श्रीराम की
सेवा में संलग्न चित्त वाले श्रीलक्ष्मण का ध्यान करें।
पूजापि वैष्णवे पीठे साङ्गावरणवर्जिते।
सप्तलक्षं पुरश्चर्या ततः सिद्धिं तु साधयेत् ॥२५॥
लक्ष्मण की पूजा भी वैष्णव पीठ पर होगी, जिसपर अंग देवता और
आवरण देवता न रहें। लक्ष्मण का पुरश्चरण सात लाख मन्त्रों का है इसके बाद
सिद्धि के लिए साधना करनी चाहिए।
देव्यास्तु पूर्वमेवोक्तं सह रामेण तद्भवेत्।
भरतस्यैवमेवं स्यात् शत्रुघ्नस्याप्ययं विधिः ॥२६॥
अगस्त्येनोदिताः ह्येते प्राधान्येनापि सत्तम।
श्रीरामपूजानिरत एतेन पूजयेत् सदा ॥२७॥
देवी सीता का ध्यान आदि तो श्रीराम के साथ ही पूर्व में कहे गये हैं। वहीं
करें। भरत का लक्ष्मण से समान होना चाहिए। शत्रुघ्न की भी यही विधि है।
अंग-देवताओं के रूप में ये प्रमुख कहे गये हैं। श्रीराम की पूजा में रत साधक इस
प्रकार पूजन करें।
आदौ जाप्यं ततो वापि पूजाया राघवस्य तु।
एतेषामपि कर्तव्या भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ॥२८॥
श्रीराम की पूजा के प्रारम्भ में इन अंग देवताओं के मन्त्रों का जप करना
चाहिए अथवा पूजा के बाद जप करना चाहिए। भोग और मोक्ष के इच्छुक साधक
इन अंग-देवताओं की भी पूजा करें।
Rarest Archiver
त्रिंशोऽध्यायः (221)
— — — — — — — — — — — — — —
प्राधान्येन पूज्येन अङ्गत्त्वे रामपीठके।
हनूमतोप्येवमेव कुर्यात् पूजामतन्द्रितः ।।२९।।
मुख्य रूप से श्रीराम के पीठ पर अंग देवता के रूप में हनुमान् की भी इस
प्रकार से आलस्य छोड़कर पूजन करें।
पूर्वं नमः पदं चोक्त्वा ततो भगवते पदम्।
आञ्जनेयपदं ङेन्तं महाबलपदं तथा।।३०।।
वह्निजायान्त एव स्यान्मन्त्रो हनुमतः परम्।
सर्वसिद्धिकरः प्रोक्तः सर्वेषामपि सर्वदा।।३१।।
मालाख्यः परमो मन्त्रो मारुतेः सर्वसिद्धिदः।
पहले 'नमः' बोलकर तब 'भगवते' यह पद बोलें। इसके बाद चतुर्थी
विभक्ति में 'आञ्जनेय' पद (आञ्जनेयाय) कहें तब वैसे ही महाबल पद (अर्थात्
महाबलाय) कहें। इसके अन्त में वह्निजाया (स्वाहा) लगावें। इस प्रकार "नमो
भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा"- यह हनुमान का मन्त्र है। इसे सबके के
लिए सदा सभी सिद्धियाँ देनेवाला कहा गया है। यह सभी सिद्धियाँ देनेवाला
हनुमान् का माला मन्त्र है।
लक्ष्मणस्तु सदा पूज्यः प्राधान्येनैव नित्यशः।।३२।।
यथा रामस्य पूजा स्यात् तथा तस्यापि नित्यशः।
वैष्णवं न्यासजालं च सर्वं कृत्वा समाहितः ।।३३।।
भूतशुद्धिं विधायैव मातृकापि प्रयत्नतः।
विधाय मानसीं पूजां बाह्यपूजामपि द्वयम्।।३४।।
त्रिकालमेककालं वा नित्यमेकान्तमाश्रितः।
प्रधान देवता के रूप में प्रतिदिन लक्ष्मण की पूजा करें। जिस प्रकार
श्रीराम की पूजा प्रतिदिन होती है उसी प्रकार लक्ष्मण की भी पूजा होनी चाहिए।
सभी वैष्णव न्यास कर मानस-पूजा कर तीनों कालों में या एक काल प्रतिदिन
एकान्त में रहते हुए पूजन करें।
साफल्यं रामपूजाया च इच्छेन्नियतव्रतः।।३५।।
तेन यत्नेन कर्तव्या लक्ष्मणस्यापि विस्तरात्।
(222) अगस्त्य-संहिता
श्रीराम पूजा की सफलता की इच्छा जो रखते हों, वे नियम का पालन
करते हुए यत्नपूर्वक लक्ष्मण की पूजा भी विस्तार से करें।
श्रीराममन्त्रभेदास्तु बहवः सन्ति वै मुने॥36॥
तत्साधकैस्सदा कार्या सौमित्रेरपि सर्वशः।
परं ब्रह्मापि लोकेस्मिन् रामलक्ष्मणसंज्ञया॥37॥
आविर्भूय च कार्त्स्न्येन सेव्यतां तु द्वयं सदा।
श्रीराम के मन्त्र अनेक प्रकार के हैं। उन मन्त्रों के जो साधक हैं, वे सदा
हर प्रकार से लक्ष्मण की पूजा करें। परम ब्रह्म इस संसार में श्रीराम और लक्ष्मण
के नाम से अंग के रूप में प्रकट हुए हैं, अतः दोनों की सदा सेवा करें।
अष्टोत्तरसहस्त्रं वा शतं वा सुसमाहितः॥38॥
लक्ष्मणस्य मनुर्जप्यो मुमुक्षुभिरतन्द्रितैः।
एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार एकाग्र होकर आलस्य का त्याग
कर मोक्षार्थियों को लक्ष्मण के मन्त्र का जप करना चाहिए।
तारकं ब्रह्म लोकेऽस्मिन् यथा सेव्यो मुमुक्षुभिः॥39॥
तथैव लक्ष्मणमनुः सदा सेव्यो भवेदिह।
जिस तरह तारक ब्रह्म मोक्षार्थियों का पूज्य है, उसी प्रकार लक्ष्मण का भी
मन्त्र इस संसार में सेव्य होना चाहिए।
दशाक्षरादिमन्त्राणां साफल्यस्यापि कांक्षया॥40॥
सेव्योऽयं सर्वदा मन्त्र ऐहिकामुष्मिकप्रदः।
दशाक्षर आदि मन्त्रों की सफलता की इच्छा से भी यह मन्त्र हमेशा जप
करने योग्य है, जो संसार में और परलोक में कामनाओं को पूर्ण करता है।
अजप्त्वा लक्ष्मणमनुं राममन्त्रा जपन्ति ये॥41॥
तज्जप्तस्य फलं नैव प्रयान्ति कुशला अपि।
अरिमित्रविवेकोऽपि नैव कार्यों भवेदिह॥42॥
लक्ष्मण का मन्त्र जप किए विना जो श्रीराम का मन्त्र जपते हैं, उस जप का
फल वे अच्छे साधक भी प्राप्त नहीं करते हैं। इस मन्त्र में शत्रु और मित्र का भी
विचार नहीं होना चाहिए।
त्रिंशोऽध्यायः (223)
— — — — — — — — — — — — — — — — — —
रामपूजारतैर्नित्यं सदा सेव्योऽयमञ्जसा।
यो जपेल्लक्ष्मणमनुं नित्यमेकान्तमास्थितः।।43।।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो स कामानश्नुतेऽखिलान्।
श्रीराम की पूजा में लीन साधकों को इस मन्त्र का विधानपूर्वक जप करना
चाहिए। जो प्रतिदिन एकान्त में रहते हुए लक्ष्मण-मन्त्र का जप करतें हैं वे सभी
पापों से मुक्त होकर सभी कामनाओं का भोग करते हैं।
मनोवाक्कायकर्मद्यैरत्यन्तैरप्यनेकशः ।।44।।
महद्भिरपि पापौघैर्मुच्यते नात्र संशयः।
सर्वान् कामानवाप्नोति यान्ति विष्णोः परं पदम्।।45।।
मन, वाणी, शरीर और क्रिया से अनेक बार जो महान् पाप किए गये हो
उस समूह से पाप मुक्त हो जाता है साधक, इसमें सन्देह नहीं। वह सभी
कामनाओं को प्राप्त करता है और विष्णु के परमधाम को चला जाता है।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये लक्ष्मणादिपूजनविधिर्नाम
त्रिंशोऽध्यायः।
एकत्रिंशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
पुरोदितस्य मन्त्रस्य प्रयोगानखिलाञ्जसा¹।
कथयामि यथाशक्ति सरहस्यं सुविस्तरम्।।1।।
प्रयोगायैव मन्त्रोऽयमुपदिष्टोऽथ शार्ङ्गिणा।
अर्जुनस्य पुरा सर्गे तेनैव² धनञ्जयः।।2।।
दिशो विजित्य सकलाः स कुरून् एक एव हि।
प्रातिष्ठिपद्धर्मराजं पैतृके राज्य उत्तमे।।3।।
अगस्त्य बोले- पूर्व में कहे गये मन्त्रों के रहस्य के साथ अपनी शक्ति के
अनुसार मैं उनके प्रयोगों को विस्तारपूर्वक कहता हूँ। ये मन्त्र इससे पूर्व की सृष्टि
में भगवान् विष्णु के द्वारा अर्जुन को प्रयोग करने के लिए ही दिये गये थे और उन
मन्त्रों के द्वारा ही अर्जुन ने अकेले ही सभी दिशाओं और कुरुओं को जीत कर
धर्मराज युधिष्ठिर को अपने उत्तम पैतृक राज्य में स्थापित किया।
- घ. प्रयोगोऽहमञ्जसा। 2. घ. अर्जुनस्य पुरा सम्यगनेनैव धनञ्जयः।
(224) अगस्त्य-संहिता
जपप्रधानो मन्त्रोऽयं राज्यप्राप्त्येकसाधनम्।
यो जपेन्नियतो मन्त्रं लक्षमेकं समाहितः।।4।।
सोऽचिरान्नष्टराज्यं स्वं प्राप्नोत्येव न संशयः।
इस मन्त्र में जप की प्रधानता है। यह राज्यप्राप्ति का साधन है। जो
नियमपूर्वक एकाग्र होकर इस मन्त्र का एक लाख जप करते हैं, वे शीघ्र ही अपने
नष्ट राज्य को प्राप्त करते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
अभिषिक्तमयोध्यायां ध्यायेद्राममनन्यधीः।।5।।
पंचायुतमिदं जप्त्वा नष्टराज्यमवाप्नुयात्।
अयोध्या में राज्याभिषिक्त श्रीराम का ध्यान करें और एकाग्र होकर
पचास हजार मन्त्र का जप कर अपने नष्ट राज्य को पावें।
नागपाशविनिर्मुक्तं ध्यायन्नेकान्त आस्थितः।।6।।
जप्त्वायुतं प्रमुच्येत निगडायैस्तदेव हि।
नागपाश से विमुक्त श्रीराम का ध्यान करते हुए एकान्त में रहकर दस
हजार जप कर बेड़ी के बन्धन से मुक्त हो जाता है।
आञ्जनेयसमानीतैरोषधीभिर्गतव्यथम् ।।7।।
ध्यायन्नयुतजायेन स्वापमृत्युं जयेन्नरः।
हनुमानजी के द्वारा लायी गयी औषधियों के प्रभाव से कष्ट से मुक्त
श्रीराम का ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से मनुष्य अपनी अपमृत्यु को
जीत लेता है।
इन्द्रजित्प्राणहन्तारं ध्यायन्नेव समाहितः।।8।।
दुर्जयं चापि वेगेन जयेदरिकुलं बहु।
मेघनाद का वध करनेवाले श्रीलक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकाग्र होकर
जप करने से शीघ्र ही बहुत सारे दुर्जय शत्रुओं को जीत लेते हैं।
शूर्पणख्याश्च नासाग्रछेदनोद्युक्तमानसम्।।9।।
ध्यायन् सहस्रजापेन पुरहूतादिकान् जयेत्।
शूर्पणखा की नाक काटने के लिए उन्मुख श्री लक्ष्मण का ध्यान करते हुए
एक हजार जप करने से इन्द्र आदि को भी जीत लेते हैं।
एकत्रिंशोऽध्यायः (225)
रामपादाब्जसेवार्थं कृतद्वारमथ स्मरन् ।।10।।
जपन्नयुतमेकान्ते महारोगान् बहून्यपि।
क्षयापस्मारकुष्ठादीन्नाशयत्येव तत्क्षणात् ।।11।।
श्रीराम के चरणकमल की सेवा करने के लिए द्वार बनाकर अवस्थित श्री
लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकान्त में जप करते हुए साधक अनेक महारोगों को
जीत लेते हैं।
त्रिमासं नियताहारो जपेत् सप्तसहस्रकम्।
दिने दिने विधानेन युगपद् विजितेन्द्रियः ।।12।।
अष्टोत्तरशतैः पुष्पैः निश्छिद्रैः शतपत्रकैः।
पायसं शर्करोपेतं नैवेद्यं विधिवन्मुने।।13।।
घनसारसमायुक्तं चन्दनेनावलिप्य च।
देवोद्देशेन नित्यं च सम्पूज्यैव द्विजोत्तम ।।14।।
कुष्ठरोगात् प्रमुच्येत दुःचिकित्स्यादनेकंशः।
दुर्दोषाजा बहुविधा मण्डलादिप्रभेदतः ।।15।।
ते सर्वे नाशमायान्ति दुःचिकित्स्या अपि क्षणे।
तीन मास तक संयमित भोजन करते हुए प्रतिदिन सात हजार जप
विधानपूर्वक कर के साथ साथ छिद्र रहित एक सौ आठ कमल के फूलों से तथा
शक्कर के साथ पायस (खीर) नैवेद्य समर्पित कर, कर्पूर के साथ चन्दन से देवता
का लेपन कर प्रतिदिन पूजा करके साधक कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है। अन्य
अनेक असाध्य रोग, मण्डल आदि अनेक प्रकार के रोग जो बुरे दोषों से उत्पन्न
होते हैं वे सभी क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
एकान्ते नियताहारः षण्मासान् विजितेन्द्रियः ।।16।।
जपन्नेवं विधानेन क्षयरोगात्प्रमुच्यते।
एकान्त में संयमित आहार लेकर छह मास तक इन्द्रियों को वश में कर के
इस प्रकार जप करते हुए क्षय रोग से मुक्ति मिलती है।
मासं पूपादिनैवेद्यैः जपन्मन्त्रं समाहितः ।।17।।
वातरोगात्प्रमुच्येत बहुभेदादपि क्षणात्।
(226) अगस्त्य-संहिता
एक मास तक पुआ आदि नैवेद्य समर्पित करते हुए एकाग्र होकर जप करने
से अनेक प्रकार के बात रोगों से क्षण भर में मुक्ति मिल जाती है।
अभिमन्त्र्य जलं नित्यं मन्त्रेण त्रिः समाहितः ।।18।।
पीत्वा सन्ध्यासु भक्त्या वै मुच्यते सर्वरोगतः।
दारिद्र्यं नाशयित्वा तु श्रियमाप्नोति सुव्रत ।।19।।
मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित कर प्रतिदिन तीन बार ध्यानस्थ होकर तीनों
सन्ध्याओं में भक्तिपूर्वक पीने से सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है। वह अपनी
दरिद्रता का नाश कर लक्ष्मी प्राप्त करता है।
विषादिदोषसंस्पर्शो न भवेच्च कदाचन।
प्रक्षाल्यैवं प्रतिदिनं मुखं भक्त्या समाहितः ।।20।।
मुखनेत्रादिसम्भूतान् जयेद्रोगान् सुदारुणान्।
पीत्वाभिमन्त्रितं वारि कुक्षिरोगान् जयेद् बहून् ।।21।।
उसे विष आदि दोषों का स्पर्श भी नहीं होता। इस अभिमन्त्रित जल से जो
प्रतिदिन भक्तिपूर्वक अपने मुख का प्रक्षालन करते हैं, वे मुख। नेत्र आदि के
अनेक रोगों की जीत लेते हैं और उस अभिमन्त्रित जल को पीकर कोख सम्बन्धी
रोगों को जीत लेते हैं।
देवस्य प्रतिमादानं कृत्वा भक्त्या विधानतः।
सर्वेभ्योप्यथ रोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।।22।।
भक्तिपूर्वक तथा विधानों के साथ देवता की प्रतिमा का दान करनेवाले
सभी रोगों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
कन्यार्थी चोर्मिलापाणिग्रहणासक्तमानसम्।
लक्ष्मणमनुर्जप्त्वा हुत्वा लाजैर्दशांशकम् ।।23।।
ईप्सितां प्राप्नुयात् कन्यां शीघ्रमेव तपोधन।
पत्नी की इच्छा रखनेवाले साधक उर्मिला का पाणिग्रहण करने के लिए
आसक्त चित्त वाले लक्ष्मण का ध्यान कर धान के खील (लाबा) से उसका दशांश
हवन कर शीघ्र ही अभीष्ट पत्नी को प्राप्त करते हैं।
एकत्रिंशोऽध्यायः (227)
दीक्षितं स्तम्भनास्त्राणां१ मन्त्रेषु नियतव्रतः ।।२४।।
संस्मरन् विधिवन्नित्यं मासत्रयममन्यधीः।
पूजापुरस्सरं सप्तसहस्त्रं विजितेन्द्रियः ।।२५।।
जपन्नखिलविद्यानां तत्त्वज्ञो भवति ध्रुवम्।
'स्तम्भन' नामक अस्त्र के सन्धान में दीक्षित श्रीराम का स्मरण करते हुए
नियमपूर्वक, जितेन्द्रिय होकर तीन मास तक पूजन करते हुए मन्त्र का सात हजार
जप करता हुआ साधक सभी विद्याओं का तत्त्वज्ञ बन जाता है।
विश्वामित्रक्रतुवरे कृताद्भुतपराक्रमम् ।।२६।।
ध्यायन्नयुतजापेन भयेभ्यो मुच्यतेऽचिरात् ।
सन्ध्यां चोपास्य विधिवन्मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ।।२७।।
त्रिकालं नियतो भूत्वा कृतनित्यविधिः स्वयं।
दीक्षायुतो यथान्यायं गुर्वनुज्ञापुरस्सरम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो याति विष्णोः परं पदम् ।।२८।।
विश्वामित्र मुनि के विशाल यज्ञ में अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले श्रीराम का
ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाते हैं।
विधान पूर्वक मूलमन्त्र से तीनों समयों में सन्ध्यावन्दन कर मन्त्रज्ञानी नित्यकर्मों
को सम्पन्न कर गुरु की आज्ञा से जप करते हुए सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं तथा
विष्णु के परम स्थान को प्राप्त करते हैं।
ऐहिकाननपेक्ष्यैव निष्कामो योऽर्चयेद्धरिम्।
दीक्षां प्राप्य विधानेन गुरोर्विगतकल्मषात् ।।२९।।
आचारनियताद् गृहस्थाद् विजितेन्द्रियात् ।
तदनुज्ञानमात्रेण पुरश्चर्यां यथाविधिः ।।३०।।
स सर्वान् पुण्यपापौघान् जित्वा निर्मलमानसः ।
पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं पदमवाप्नुयात् ।।३१।।
जो अपने आचार में दृढ़, जितेन्द्रिय, निष्पाप गृहस्थ गुरु से दीक्षा प्राप्त
कर उनकी आज्ञा से सांसारिक विषयों की कामना न करते हुए हरि की अर्चना
करते हैं और विधि के अनुसार पुरश्चरण करते हैं, वे सभी पुण्यों और पापों के
समूह को जीतकर निर्मल मन से पुनर्जन्म से रहित शाश्वत स्थान को प्राप्त करते हैं।
- घ. जृम्भणास्त्राणां।
(228) अगस्त्य-संहिता
सकामो वाञ्छितान् लब्ध्वा भुक्तभोगान् मनोहरान्।
जातिस्मरश्चिरं भूत्वा याति विष्णोः परं पदम्।।32।।
किन्तु सकाम साधक इस संसार में सभी सुन्दर भोगों को प्राप्त कर अपने
जन्म को स्मरण करते हुए विष्णु के परम स्थान को प्राप्त करते हैं।
यथा श्रीराममन्त्राणां प्रयोक्तुः पापसम्भवः।
तथा न लक्ष्मणमनोः किन्तु यान्ति परां गतिम्।।33।।
जिस प्रकार सांसारिक कामना के लिए श्रीराम के मन्त्र का प्रयोग करनेवाले
को पाप की सम्भावना हो सकती है, उस प्रकार लक्ष्मण के मन्त्र में पाप की
सम्भावना नहीं है, किन्तु वे परम गति को प्राप्त करते हैं।
मन्त्रोऽयं ब्रह्मणा पूर्वं तुष्टेन तपसा चिरम्।
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे मह्यं दत्तो हि सादरम्।।34।।
प्राचीन समय में ब्रह्मा ने मेरी तपस्या से सन्तुष्ट होकर कुरुक्षेत्र में
सूर्यग्रहण के समय यह मन्त्र मुझे दिया था।
मयाप्युपासितोऽयं वै भक्तियुक्तेन चेतसा।
गुरुभक्तिं समालोक्य मामेवास्याकरोदृषिम्।।35।।
प्रकाशितो मयाप्यस्मिंल्लोके गुर्वाज्ञया पुनः।
मैंने भी भक्तियुक्त मन से इस मन्त्र की उपासना की। तब मेरी गुरु
भक्ति से सन्तुष्ट होकर उन्होंने इस मन्त्र का ऋषि मुझे ही बना दिया। फिर मैंने
गुरु की आज्ञा से इसे लोक में प्रकाशित किया।
उपास्य बहवो लोके मनुमेतदनेकशः।।36।।
संप्राप्य वाञ्छितार्थानगमद्धाम वैष्णवम्।
अनेन सदृशो मन्त्रो मया दृष्टो न कुत्रचित्।।37।।
इस मन्त्र की उपासना कर अनेक लोग इच्छित सांसारिक कामनाओं को
प्राप्त कर विष्णु के परम धाम को प्राप्त कर चुके हैं। इसके समान मन्त्र मैंने दूसरा
कही नहीं देखा।
शैववैष्णवसौरेषु गाणत्येषु वा मुने।
केचिन्मुक्त्यर्थमेव स्युः केचिदैहिकसाधनाः।।38।।
भुक्तिमुक्तिकरश्चायमेको विजयते परम्।।39।।
द्वात्रिंशोऽध्यायः (229)
शैव, वैष्णव, सौर और गाणपत्य मन्त्रों में से कुछ केवल मुक्ति देनेवाले हैं
तथा कुछ केवल सांसारिक कामनाओं के साधक हैं, किन्तु यह मन्त्र भोग और
मोक्ष दोनों प्रदान करनेवाला है, अतः यह परम जयशील श्रेष्ठ है।
इत्यस्त्यसंहितायां परमरहस्ये लक्ष्मणादिमन्त्रकथनं नाम
एकत्रिशोऽध्यायः ।। 31 ।।
द्वात्रिंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
सर्ववेदार्थतत्त्वज्ञो ननु निश्चलमानसः।
सम्यक् संशिक्षितश्चाहं बहुनापि कृपानिधे ।। 1 ।।
त्वया कारुण्यनिधिना पूर्वमज्ञास्तथा जहुः।
त्वत्प्रसादेन संजातं ज्ञानं विगतकल्मषम् ।। 2 ।।
हे करुणा के सागर! मुनि अगस्त्य! प्राचीन काल में आपकी सहायता से
लोगों ने अपने अज्ञान को त्याग दिया था, वह निष्कलुष ज्ञान आपकी कृपा से
आज प्रकट हुआ।
रामात्मनि परं ब्रह्मण्यासक्तमनसं च माम्।
लक्ष्मणे हि तथा रामे किञ्चिद् भेदोऽस्ति नैव हि ।। 3 ।।
श्रीराम के स्वरूप परम ब्रह्म मैं आसक्त हूँ, किन्तु अब ज्ञात हुआ कि
लक्ष्मण और श्रीराम में किंचिद् भेद नहीं है।
हनुमन्मन्त्र इत्युक्तस्त्वया वै मुनिपुङ्गव ।
तस्यानुष्ठानमेवाहं ज्ञातुमिच्छामि तन्त्रभो ।। 4 ।।
त्वयि प्रसन्ने सकलमाचक्ष्वाशु दयानिधे।
आपने हनुमान् का जो मन्त्र कहा, उसकी अनुष्ठान-विधि मैं जानना
चाहता हूँ। जब आप प्रसन्न हों, तब मुझे यह सबकुछ बतलायें।
अगस्त्य उवाच
स्मारितः सम्यगेवाहं त्वया श्रद्धावता मुने ।। 5 ।।
आञ्जनेयमनुल्लोके भुक्तिमुक्त्यैकसाधनम्।
Rarest Archiver
(230) अगस्त्य-संहिता
प्रकाशितं शङ्करेण लोकानां हितमिच्छता ।।6।।
भूतप्रेतपिशाचादिडाकिनीयक्षराक्षसाः ।
दृष्ट्वा च प्रपलायन्ते मन्त्रानुष्ठानतत्परम् ।।7।।
अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण! आप तो श्रद्धा से भरे हुए हैं। आपने ठीक
ही याद दिलाया कि हनुमान् का मन्त्र इस संसार में भोग और मोक्ष दोनों का
अचूक साधन है। संसार का भला चाहनेवाले भगवान् शंकर के द्वारा यह मन्त्र
प्रकट किया गया है। मन्त्र के अनुष्ठान में लगे साधक को देखते ही भूत, प्रेत,
पिशाच, डाकिनी, यक्ष और राक्षस सब भाग जाते हैं।
ऋषिरीश्वर एव स्यादनुष्टुप् छन्द उच्यते।
हनुमान् देवता प्रोक्तो हं बीजं शक्तिरंतजौ ।।8।।
कीलकं हात्रयं प्रोक्तं वेधकं तु हसौ पुनः।
हनुमत्प्रीणनं चैव फलमाद्यमुदीरितम् ।।9।।
सर्वेप्सितानां दातृत्वमस्यैवास्ति न चान्यतः।
इस मन्त्र के ऋषि स्वयं ईश्वर शिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है, हनुमान् देवता कहे
गये हैं, ‘हं’ यह बीज है और अन्त के दो बीजवर्ण शक्ति हैं। तीन बार ‘हा’ का
उच्चारण कीलक है ‘हसौ’ वेधक है। हनुमान् की प्रीति इस मन्त्र का मुख्य फल है।
सभी कामनाओं की पूर्ति की शक्ति इसी मन्त्र में है, दूसरे मन्त्र से नहीं होती है।
प्रणवं पूर्वमुच्चार्य नमो भगवते पदम्।
ङेन्तं प्रकटसंयुक्तं पराक्रमपदं ततः ।।10।।
तदाक्रान्तपदोपेतं दिङ्मण्डलमुदीरयेत्।
यशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितयाय च ।।11 ।।
वज्रदेहेति चोक्त्वा हं रुद्रावतारपदं तथा।
संबुद्ध्यन्तं पदं लङ्कापुरी दहनमीरयेत् ।।12 ।।
उदधिर्ल्लङ्घनं चापि दशग्रीवकृतान्तकः।
सीताश्वासनेतिपदमञ्जनीगर्भसम्भव ।।13।।
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन् कपिसैन्यप्राकारक।
सुग्रीवसन्नद्धपदं पर्वतोत्पाटनं तथा।।14।।
बालब्रह्मचारिन्निति गम्भीरशब्दपदं तथा।
सर्वग्रहविनाशनसर्वज्वरहरं तथा।।15।।
द्वात्रिंशोऽध्यायः (231)
डाकिनीविध्वंसनपदं स्ततस्तारमुदीरयेत्।
भयहात्रयमुच्चार्य हसावेहि वदत्ततः।।16।।
सर्वविषं हर परबलं क्षोभय द्विरुच्चरेत्।
सर्वकार्याणि साधयेति तथैवात्र द्विरुच्चरेत्।।17।।
हुं फट् स्वाहेति मन्त्रोऽयं मालाख्यः सर्वकामधुक्।
पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर 'नमो भगवते' यह पद जोड़ें।
चतुर्थ्यन्त 'प्रकट' सहित 'पराक्रम' (प्रकटपराक्रमाय) पद जोड़े। तब 'आक्रान्त'
पद के साथ 'दिङ्मण्डल' यह पद भी जोड़े। तब 'यशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितयाय'
यह कहें। 'वज्रदेह' ऐसा कहकर 'हं' और 'रुद्रावतार' भी चतुर्थ्यन्त पद के रूप में
कहें। इसके बाद सम्बोधनान्त पद 'लंकापुरीदहन' का उच्चारण करें। तब
'उदधिल्लङ्घन', दशग्रीवकृतान्तक! सीताश्वासन! अञ्जनीगर्भसम्भव!
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन्! कपिसैन्यप्राकारक! 'सुग्रीवसन्नद्ध', 'पर्वतोत्पाटन',
'बालब्रह्मचारिन्', 'गम्भीरशब्द' 'सर्वग्रहविनाशन', 'सर्वज्वरहर' एवं 'डाकिनीविध्वंसन'
पद बोलकर तार (ॐ) का उच्चारण करें। इसके बाद तीन बार 'भयहा' बोलकर
'हसौ' बोलें। तब 'सर्वविषं हर' 'परबलं' कहकर 'क्षोभय' यह दो बार कहें।
सर्वकार्याणि के बाद 'साधय' भी दो बार बोलें। इसके बाद 'हुं फट् स्वाहा' यह
बोलें।
ॐ नमो भगवते प्रकटपराक्रमाय आक्रान्तदिङ्मण्डलाय यशोवितान-
धवलीकृतजगत्त्रितयाय वज्रदेहाय हं रुद्रावताराय लङ्कापुरीदहन! उदधिल्लङ्घन!
दशग्रीवकृतान्तक! सीताश्वासन! अञ्जनीगर्भसम्भव! श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन्!
कपिसैन्यप्राकारक! सुग्रीवसन्नद्ध! पर्वतोत्पाटन! बालब्रह्मचारिन्! गम्भीरशब्द!
सर्वग्रहविनाशन! सर्वज्वरहर! डाकिनीविध्वंसन! ॐ भयहा! भयहा! भयहा! हसौ एहि
सर्वविषं हर परबलं क्षोभय क्षोभय सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट् स्वाहा। यह
मन्त्र सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है।
ॐ नमो भगवते चाञ्जनेयायेत्यङ्गुष्ठाभ्यामुदीरितः।।18।।
रुद्रमूर्त्तय इत्येवं तर्जनीभ्यामनन्तरम्।
वायुसुतायापि तथा मध्यमाभ्यामपि स्फुटम्।।19।।
अग्निगर्भाय च तथानामिकाभ्यां प्रविन्यसेत्।
रामदूताय च पुनः कनिष्ठिकाभ्यां विचक्षणः।।20।।
(232) अगस्त्य-संहिता
ब्रह्मास्त्रनिवारणाय चास्त्रमन्त्रसमीरितः।
षडङ्गं च मुने कृत्वा ध्यायेद्देवमनन्यधीः॥२१॥
अब करन्यास कहते हैं। 'ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय' इससे दोनों हाथों
के अंगूठे में न्यास कहा गया है। 'रुद्रमूर्तये' इससे दोनों तर्जनी में न्यास करें।
'वायुसुताय' इसका दोनों मध्यमा में स्पष्ट रूप से न्यास करें। 'अग्निगर्भाय' इससे
दोनों अनामिका में न्यास करें। तब 'रामदूताय' से दोनों कनिष्ठिका में न्यास
करें। 'ब्रह्मास्त्रनिवारणाय' यह अस्त्रमन्त्र कहा गया है। इस प्रकार षडंगन्यास कर
एकाग्र होकर भगवान् हनुमान् का ध्यान करें।
ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय इत्यङ्गुष्ठाभ्याम्।
ॐ नमो भगवते रुद्रमूर्त्तये इति तर्जनीभ्याम्।
ॐ नमो भगवते वायुसुताय इति मध्यमाभ्याम्।
ॐ नमो भगवते अग्निगर्भाय इत्यनामिकाभ्याम्
ॐ नमो भगवते रामदूताय इति कनिष्ठिकाभ्याम्
ॐ नमो भगवते ब्रह्मास्त्रनिवारणाय हुं अस्त्राय फट्।
स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम्।
कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं मुहुर्मुहुः ।। २२ ।।
स्फटिक के समान चमकते हुए, स्वर्ण के समान कान्तिवाले, दो भुजाओं
वाले, अंजलि बाँधे हुए, दो कुण्डलों से शोभित मुखकमल वाले हनुमान् का ध्यान
बार बार करता हूँ।
अयुतं च पुरश्चर्या रामस्याग्रे शिवस्य वा।
पूजां तु वैष्णवे पीठे शैवे वा विदधीत वै ।। २३ ।
हनुमान् का पुरश्चरण श्रीराम के आगे या शिव के आगे दस हजार मन्त्रों
का होता है। पूजा वैष्णव या शैव पीठ पर करें।
अवृत्तिभिर्विना नित्यं नक्ताशी विजितेन्द्रियः।
क्षुद्ररोगनिवृत्त्यर्थमष्टोत्तरशतं जपेत् ।। २४ ।।
जप्त्वा त्रिदिनमेकान्ते तेभ्यो मुच्येत तत्क्षणात्।
निराहार न रहकर प्रतिदिन केवल रात्रि में भोजन कर जितेन्द्रिय होकर
छोटे छोटे रोगों से छुटकारा पाने के लिए एक सौ आठ बार जप करें। इस प्रकार
एकान्त में तीन दिन जप करने से उन रोगों से तत्क्षण मुक्ति मिल जाती है।