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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(96) अगस्त्य-संहिता

लक्षं तदर्द्धमथवा जपित्वा तद्दशांशतः।
तिलैर्वामलकैर्हुत्वा¹ यद्यदिष्टं तदश्नुते।।५।।
विधानपूर्वक पीछे कही गयी विधि से होमकर्म पर्यन्त कर अग्नि में देवता
का आवाहन कर पाँच या सोलह उपचारों से पृथक्-पृथक् पूजा कर पलाश,
पीपल, खैर, गूलर, आम, बड़, या अन्य यज्ञीय की समिधा से अग्नि प्रज्वलित
करें। वहीं 'श्रीराम की पूजा सम्यक् रूप से कर एक लाख अथवा पचास हजार
जप कर उसका दशांश हवन करें। तिल से अथवा आँवला से हवन कर अभीष्ट
वस्तु की प्राप्ति होती है।
बिल्वप्रसूनैरैश्वर्यमर्चितेऽग्नौ हुतैर्भवेत्।
पलाशकुसुमैर्हुत्वा मेधावी वेदविद् भवेत्।।६।।
दूर्वाभिश्च गुडीचीभिः² प्रत्येकमाप चाक्षतैः।
निरामयोऽपि दीर्घायुर्भवत्येव तपोधन³।।७।।
पूजित अग्नि में बेल के फूल से हवन करने पर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
पलाश के फूल से हवन कर वह मेधावी और वेद ज्ञानी होता है। दूर्वा या गुरुच के
साथ अक्षत मिलाकर हवन करने से यजमान नीरोग और दीर्घायु होते हैं।
सम्यक् चन्दनतोयेन प्रत्यग्रैश्च समुक्षितैः।
जातीप्रसूनैर्हुत्वा तु राजानं वशमानयेत्।।८।।
चन्दन के जल से सुगन्धित खिलेहुए तथा उचित रीति से तोड़े गये ताजे
जूही के फूल से हवन कर राजा को वश में करे।
ध्यात्वा च मन्मथं रामं⁴ सीतामपि रतिं स्मरेत्।
सर्ववश्यप्रयोगेषु जपहोमादिकर्मसु।।९।।
श्रीराम का कामदेव के रूप में तथा सीता को रति के रूप में सभी
वशीकरण के प्रयोग में, जप होम आदि में स्मरण करें।
रामं नवोपयन्तारं स्मरेणाराध्य⁵ भक्तितः।
उपैति सदृशीं कन्यां लाजहोमेन साधकः।।१०।।
कामबीज (क्लीं) से नव विवाहित श्रीराम की भक्तिपूर्वक आराधना कर
धान के खील से हवन करने से साधक श्रीसीता के समान कन्या पत्नी के रूप में
प्राप्त करता है।

  1. घ. कमलैर्हुत्वा। 2. घ. गुलूचीभिः। 3. घ. तपोनिधे। 4. घ. ध्यात्वापि राघवं
    कामं। 5. घ. स्मरन्नाराध्य।

पञ्चदशोऽध्यायः (97)
वाञ्छितं फलमाप्नोति हुत्वा रक्तोत्पलैर्नवैः ।
हुत्वा नीलोत्पलैः सम्यग् वशयेदखिलं जगत् ।।11।।
ताजे लाल कमल से हवन कर इच्छित फल प्राप्त करता है तथा नीलकमल
से हवन कर समग्र संसार को वश में करता है।
रामं विधिवदाराध्य ज्वलितेऽग्नौ प्रयोगवित्।
मधुरत्रययुक्तेन पायसेन हुतेन तु ।।12।।
सर्वाधिपत्यं वैदुष्यं भवत्येव न संशयः।
तिलैश्च तण्डुलैराज्यैर्हुत्वा लोकस्य पूज्यताम् ।।13।।
प्रज्वलित अग्नि में श्रीराम की विधिपूर्वक आराधना कर प्रयोग जानने
वाला तीन मधुर (मधु, गुड़ एवं मिसरी) मिले खीर से हवन कर सभी पर
आधिपत्य और वैदुष्य प्राप्त करता है और तिल, चावल एवं घृत से हवन कर
संसार में पूजित होता है।
आराध्य वत्सरं यावत्¹ षट्सहस्रं दिने दिने।
जपेच्च जुहुयादग्नौदशांशं तद्गतान्धसा ।।14।।
अयमेवान्नदो लोके सर्वेषामपि जायते।
बिल्वप्रसूनैः कुमुदैस्तथा बिल्वदलैरपि ।।15।।
हुत्वा स लभते लक्ष्मीमचिरान्मन्त्रसाधकः।
प्रतिदिन छह हजार मन्त्र का जप कर अग्नि में पूर्वोक्त विधि उससे युक्त
भात (अन्धस्) से दशांश हवन करें। यहीं इस संसार में सबके लिए अन्न देने वाला
प्रयोग है। बेल का फूल, कुमुद तथा बिल्वपत्र से हवन कर मन्त्रसाधक शीघ्र लक्ष्मी
प्राप्त करता है।
आराध्य रामं चण्डांशुमण्डले वत्सरं मुने ।।16।।
उदयास्तमने तं च जपेद्राममन्त्रमनन्यधीः।²
फलं भवति तस्याशु देवानामपि दुर्लभम् ।।17।।
वैदुष्येणाधिपत्येन सभ्यानामुत्तमो³ भवेत्।
पूर्णिमासु निशीथिन्यामुदयास्तमयव्रतम् ।।18।।

  1. घ. आरात् संवत्सरं यावत्। 2. घ. उदयास्तमनं यावत् जपेन्मन्त्रमनन्यधीः। 3.
    घ. समानामुत्तमो।

(98) अगस्त्य-संहिता
संवत्सरं प्रकुर्वीत जपहूोमादिकं विभोः।
रात्रौ जपेद्दिवा होमं कुर्यादिवापरेऽहनि।।19।।
ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु व्रतमेतत् समापयेत्।
सोमसूर्यात्मकं यस्तु व्रतं कुर्वीत मानवः।।20।।
इह भुक्तिं च मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः।
एक वर्ष तक सूर्य के प्रभामण्डल में उदय और अस्त के समय श्रीराम की
आराधना कर एकाग्रचित्त होकर श्रीराम के मन्त्र का जप करे, तो इसका जो फल
शीघ्र उसे मिलता है, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वह विद्वत्ता और
आधिपत्य से सभा में स्थित लोगों में श्रेष्ठ हो जाता है। साथ ही पूर्णिमा की रात
में चन्द्रोदय एवं चन्द्रास्त के समय यह व्रत जप, होम आदि विधि में वर्ष पर्यन्त
करे। रात्रि में जप कर दूसरे दिन हवन करे; ब्राह्मण भोजन कराकर यह व्रत जो
मनुष्य करे, वह इस संसार में भोग और मुक्ति प्राप्त करे, इसमें सन्देह नहीं।
रक्तपद्मैश्च बन्धूकैस्तथा रक्तोत्पलैरपि।।21।।
अभीष्टलोकवश्यार्थो जुहुयादर्चितेऽनले।
लाल कमल, बन्धूक (दुपहरिया फूल) और लाल उत्पल से अभीष्ट व्यक्ति
के वशीकरण के लिए पूजित अग्नि में हवन करें।
राज्यैश्वर्योपभोगार्थी गिरौ¹ लक्षमनन्यधीः।।22।।
पद्मैर्बिल्वप्रसूनैर्वा दशांशं जुहुयान्मुने।
राज्य और ऐश्वर्य के उपभोग का इच्छुक एकचित्त होकर पर्वत पर लाख
जप कर लाल कमल या बिल्वपुष्प से दशांश हवन करे।
समुद्रतीरे गोष्ठे वा लक्षजापी पयोव्रतः।।23।।
पायसेनाज्ययुक्तेन हुत्वा विद्यानिधिर्भवेत्।
समुद्र के तट पर अथवा गाय के घर में केवल दूध पीकर एक लाख जप
कर घृत डालकर पायस से हवन कर विद्वान् होता है।
परिक्षीणाधिपत्यो² यः शाकाहारी जलान्तरे।।24।।
जपेल्लक्षं च जुहुयाद् बिल्वपत्रैर्दशान्ततः।
तदेव पुनरायाति स्वाधिपत्यं न संशयः।।25।।

  1. घ. जपेत्। 2. घ. परिक्षताधिपत्यो।

पञ्चदशोऽध्यायः (99)
राज्यच्युत व्यक्ति यदि केवल साग खाकर जल में खड़ा होकर एक लाख
जप करे और बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो उसका शासन पुनः लौट आता है;
इसमें सन्देह नहीं।
उपोष्य गङ्गादिजलान्तरस्थो
रामं समाराध्य जपेच्च लक्षम्।
हुत्वा दशांशं कमलैस्तिलैर्वा
बिल्वप्रसूनैर्मधुरत्रयाक्तैः ।।२६।।
राज्यश्रियं विन्दति मन्दभाग्योऽ-
प्यमुष्य दास्यं वरवाञ्छितं स्यात्।
१वैदुष्यमिष्टञ्च सुतादिलाभो
युद्धे जयः सर्व्वसमृद्धिवृद्धिः।।२७।।
गंगा आदि पवित्र नदी के जल में उपवास करते हुए खड़ा होकर श्रीराम
की आराधना कर एक लाख जप करे और तीन मधुर से युक्त तिल अथवा
बिल्वपत्र से दशांश हवन करे, तो मन्दभाग्य को भी श्रीराम की दासता और
इच्छित वर मिले।
राममाराध्य विधिवदर्चितेऽग्नौ जपेदपि।
सूर्यबिम्बेऽपि तोयस्थो जुहुयादिक्षुदण्डकैः।।२८।।
राज्यलक्ष्मीमवाप्नोति शरत्काले तपोधन।।२९।।
जल में खड़ा होकर सूर्य विम्ब में श्रीराम की विधिवत् आराधना कर जप
भी करे और शरद् ऋतु में पूजित अग्नि में ईख के टुकड़े से हवन भी करे तो हे
तपोधन! सुतीक्ष्ण! वह राज्यलक्ष्मी प्राप्त करता है।
वैशाखे राघवं सूर्य्ये सम्पश्यन्ननिमेक्षणः।
निराहारो जपेल्लक्षं मौनी पञ्चाग्निमध्यतः।।३०।।
दशांशं कमलैर्हुत्वा सार्वभौमो भवेद् ध्रुवम्।
वैशाख मास में निराहार रहकर, मौन धारण कर, पंचाग्नि व्रत करते हुए
(चारो ओर अग्नि जलाकर तथा पाँचवें सूर्य को देखते हुए) सूर्य में श्रीराम को
अपलक देखते हुए एक लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश कमल से हवन
कर निश्चय सार्वभौम बन जाता है।

  1. क. यहाँ से दो चरण अनुपलब्ध।

(100) अगस्त्य-संहिता

माघमासे जले स्थित्वा कन्दमूलफलाशिनः¹ ।।131।।
जपेल्लक्षं च जुहुयात् पायसेनार्चितेऽनले।
दशांशं पुत्रपौत्राय² तच्छेषं प्राशयेत् प्रियाम् ।।132।।
श्रीरामसदृशः पुत्रः पौत्रौ वाप्यस्य जायते।
माघ मास में कन्द, मूल, फल खाकर व्रत करते हुए जल में खड़ा होकर जो
लाख जप करे और पूजित अग्नि में पायस से दशांश हवन करे और पुत्र पौत्र
आदि की प्राप्ति के लिए आहुति शेष पत्नी को विधिपूर्वक खिलावे तो श्रीराम के
समान पुत्र अथवा पौत्र प्राप्त होता है।
बलिष्ठैः शत्रुभिर्मन्त्री परिभूतोऽवमानितः ।।133।।
तदा हनहनेत्युक्त्वा नामान्ते वैरिणो जपेत्।
ध्यात्वा रघुपतिं क्रुद्धं कालानलमिवापरम्³ ।।134।।
आकर्णान्तशराकृष्टकोदण्डभुजमण्डलम् ।
रणाङ्गणे रिपून् सर्वास्तीक्ष्णमार्गणवृष्टिभिः ।।135।।
संहरन्तं महावीरमुग्रमैन्द्ररथस्थितम्⁴।
लक्ष्मणादिमहावीरैर्युतं हनुमदादिभिः ।।136।।
कोटिकोटिमहावीरैः शैलवृक्षकरोद्यतैः।
वेगात् करालहुङ्कारभौँकारमहारवैः ।।137।।
नदद्भिरभिधावद्भिः समरे रावणं प्रति।
एवं ध्यात्वा निराहारो मारणाय⁵ रिपोः पुनः।38।।
जुहुयात् शाल्मलीपुष्पैर्दशांशं मन्त्रसाधकः।
अत्यैश्वर्यसमृद्धोऽपि⁶ न शत्रुरवशिष्यते ।।139।।
यदि मन्त्र साधक शक्तिशाली शत्रु से हारकर अपमानित हुआ हो तो 'हन
हन' यह कहकर शत्रु का नाम अन्त में जोड़कर जप करे। जो श्रीराम क्रोधित हैं,
दूसरे कालाग्नि के समान हैं, कान तक खिंचे हुए बाण वाले धनुष हाथ में धारण
किए हुए हैं तथा युद्ध-क्षेत्र में तीक्ष्ण बाणों की वर्षा से सभी शत्रुओं का संहार
करनेवाले हैं; इन्द्र के रथ पर स्थित हैं। वे लक्ष्मण, हनुमान आदि महान् वीरों से
घिरे हुए हैं तथा चट्टानों और वृक्षों को लेकर उठे हाथ वाले, हुंकार करते हुए युद्ध

  1. घ. फलाशनः। 2. घ. पुत्रपौत्रास्यै। 3. घ. कालाग्निमुव चापरं। 4. घ. महावीरं
    राममुग्ररथस्थितम्। 5. घ. मरणाय। 6. घ. राज्यैश्वर्य°

पञ्चदशोऽध्यायः (101)
में रावण की ओर दौड़ते हुए “भो भौ” शब्द करते हुए करोड़ों करोड़ो महान् वीरों
से भी घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर शत्रु को मारने के लिए सेमल के
फूल से दशांश हवन करे। इससे अत्यन्त ऐश्वर्य प्राप्त होता है और शत्रु शेष नहीं
रहता।
वैरिणं रावणं ध्यात्वा तथात्मानं रघूद्वहम्।
विधाय पूर्ववत्सर्वमनायासेन मारयेत् ।।40।।
येनैव संहृतः¹ कोपात् स यात्येव यमालयम्।
रावण के रूप में शत्रु का ध्यान कर स्वयं को श्रीराम मानकर पूर्वोक्त
विधि से जप आदि सब कुछ कर सभी शत्रुओं का अनायास मारण करे। क्रोध से
जिस पर सन्धान किया जाए वह यमलोक पहुँच जाता है।
सीताहरणशोकाब्धिस्तम्भीभूतमचेतनम्² ।।41।।
जपेद् रघुपतिं ध्यायन् निराहारो जले वसेत्।
दशांशतस्तिलैर्हुत्वा स्तम्भयेच्छत्रुसंहतिम् ।।42।।
सीता के अपहरण के कारण शोक रूपी समुद्र में स्तब्ध चित्त वाले श्रीराम
का ध्यान करते हुए निराहार रहकर जल में अवस्थित होकर जप करें। उसका
दशांश तिल से हवन कर शत्रु के समूह का वह स्तम्भन करे।
निधाय वायुबीजान्ते तन्नाम भ्रामयेति च।
जपेल्लक्षं निराहारो जुहुयाच्च तिलैरपि ।।43।।
रामं ध्यात्वा विषण्णञ्च सीतान्वेषणकातरम्।
भ्रामयत्यचिरं साक्षाद्धेमाद्रिमपि वैरिणम् ।।44।।
मन्त्र के अन्त में वायु बीज (वं) लगाकर अभीष्ट व्यक्ति का नाम बोलकर
‘भ्रामय’ यह कहे। इस प्रकार निराहार रहते हुए एक लाख जपकर तिल से हवन
करें। इस पुरश्चरण में विषादग्रस्त और श्रीसीता की खोज में व्याकुल श्रीराम का
ध्यान करे तो वह साक्षात् सुमेरु के समान दृढ़ शत्रु का भी ‘भ्रामण’ करे।
समुद्रतीरे लङ्कायां हेमप्राकारसन्निधौ।
सुग्रीवादिभिरन्यैश्च देवैर्जांम्बवदादिभिः ।।45।।
उपास्यमानं सदसि ध्यात्वा रामं सलक्ष्मणम्।

  1. घ. तेनायं संहतः। 2. घ. स्तब्धीभूत।

(102) अगस्त्य-संहिता
विभीषणायायाचिते प्रसन्नं शरणार्थिने।।46।।
वरदं तु जपेल्लक्षं जुहुयात्पङ्कजैरपि।
स्वस्थानमानयेच्छीघ्रं राजानमथवा प्रभुम्।।47।।
समुद्र के तट पर, लंका में, सोने की अट्टालिका के समक्ष, सुग्रीव जाम्बवान्
आदि से घिरे हुए, सभा में आराधित, ऐसे श्रीराम और लक्ष्मण का ध्यान करें,
जिनसे विभीषण याचना कर रहे हों और जो शरण चाहनेवालों पर प्रसन्न हों।
इस प्रकार ध्यान कर एक लाख जप करें और कमल के फूल से हवन करें, तो अपने
निवास स्थान पर राजा अथवा प्रभु का आकर्षण कर लाने में समर्थ हों।
निमील्य चक्षुषी स्नेहादुपलाप्य पुनः पुनः।
प्रमोदयन्तं सहसा मोदन्तं मैथिलीं प्रियाम्।।48।।
रामं ध्यात्वा जपेल्लक्षं हुत्वा रक्ताम्बुजैरपि।
सम्मोहयति वेगेन राजानमथवा प्रभुम्।।49।।
दोनों आँखें बन्द कर स्नेहपूर्वक बार बार आलाप कर प्रिया सीता को
वरवस प्रफुल्लित करते हुए स्वयं भी प्रसन्न श्रीराम का ध्यान कर लाख मन्त्र जपें
और लाल कमल से हवन कर शीघ्र ही राजा अथवा प्रभु को सम्मोहित करता है।
सुतीक्ष्णमुनिवर्य्यात्र षट्प्रयोगप्रदर्शनम्।
सर्वाभीष्टार्थतत्त्वस्य द्योतनाय मनोः पुनः।।50।।
नैव कर्त्तव्यमित्येव मुक्तिर्दूरतरा¹ यतः।
किञ्च प्रयोगकर्तॄणां परलोको न विद्यते।।51।।
हे मुनि सुतीक्ष्ण! यहाँ मैंने सभी अभीष्ट तत्त्वों को स्पष्ट करने के लिए छह
प्रयोगों का प्रदर्शन किया फिर कहता हूँ कि इन्हें करना नहीं चाहिए; क्योंकि इससे
मुक्ति दूर चली जाती है साथ ही, प्रयोग करनेवालों को परलोक नहीं मिलता।
प्रयोगसिद्धिरेतेषां फलं नान्यद् भवत्यपि।
नैष्कामानां तु भक्तानां जपहोमादिकर्मसु।।52।।
मुक्तिरेव फलं तेषामिह किञ्चिन्न विद्यते।
एकैकस्य विधानस्य न कुत्रापि फलद्वयम्।।53।।

  1. घ. मुक्तिर्भारतरा।

षोडशोऽध्यायः (103)
इनके करने से प्रयोगों की ही सिद्धि होती है; अन्य फल उन्हें नहीं
मिलता। किन्तु निष्काम भक्तों का जप, होम आदि कर्मों में मुक्ति ही फल होता
है; उन्हें इस संसार में कुछ नहीं मिलता क्योंकि एक विधि के कहीं भी दो फल नहीं
हो सकते।
सुतीक्ष्ण दृश्यते तस्मान्निष्कामो राममर्चयेत्।
विद्वान् ब्रह्मास्त्रमादाय शशादौ न विमोचयेत्।¹
नायं मुक्तिपदो मन्त्रो मारणादौ प्रयुज्यताम्।।54।।
इसलिए हे सुतीक्ष्ण! इस प्रकार स्पष्ट है कि कामना रहित होकर ही
श्रीराम का अर्चन करना चाहिए। विद्वान् ब्रह्मास्त्र लेकर खरगोश पर न छोड़ें।
मुक्ति प्रदान करनेवाला षडक्षर राम-मन्त्र का मारण आदि के लिए प्रयोग न करें।
इत्यगस्त्यसंहितापरमरहस्ये प्रयोगविधिर्नाम
पञ्चदशोऽध्यायः।
अथ षोडशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
अथ वक्ष्ये विधानानि पौरश्चरणिके विधौ।
विना येन न सिद्धः स्यान्मन्त्रो वर्षशतैरपि।।1।।
अगस्त्य बोले- अब पुरश्चरण की विधि के विधानों को कहता हूँ, जिनके
बिना मन्त्र की सिद्धि सौ वर्षों में भी नहीं होगी।
भक्तिश्रद्धेष्टदानानि चिरोपास्ति प्रसादितात्।
गुरोर्मन्त्रं वरं लब्ध्वा सर्वाभीष्टप्रदं बुधः।।2।।
पूर्ववत् पूजयेन्नित्यं जपेत् नियतव्रतः।
षट्सहस्रं सहस्रं वा शतं वाष्टोत्तरं शुचिः।।3।

  1. घ. ब्रह्मन् ब्रह्मास्त्रमादाय शशादौ न विमोचय।

(104) अगस्त्य-संहिता
भक्ति, श्रद्धा और इच्छित दान कर चिरकाल तक की उपासना (सेवा) से
प्रसन्न किये हुए गुरु से सभी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाला मन्त्रश्रेष्ठ षडक्षर मन्त्र
का ग्रहण कर योग्य साधक पूर्वोक्त विधि से नित्य पूजन करें और नियमों का
पालन करते हुए पवित्र होकर प्रतिदिन छह हजार, एक हजार अथवा एक सौ
आठ बार जप करें।
एवमाराधितो रामः परां¹ भक्तिं प्रबोधयेत्।
पुरश्चरणकृत्याय पूर्वमेवं विधीयते।।4।।
इस प्रकार आराधित श्रीराम परम भक्ति जगाते हैं। पुरश्चरण के लिए
इस प्रकार पूर्वकृत्यों का विधान किया जाता है।
यथाशक्ति नियम्यान्ते बहिरात्मानमात्मवित्।
पुरश्चरणवत्सर्वं कुर्याद् होमं विधानतः²।।5।।
ततः संकल्प्य कुर्वीत पुरश्चरणमादरात्।
चिरं निरन्तरेणैव नियतात्मा दृढव्रतः।।6।।
आत्मज्ञानी यथाशक्ति प्राणायाम कर बाह्य और अन्तःशुद्धि पुरश्चरण
की विधि के समान करें। तब विधानपूर्वक हवन करें। इसके बाद संकल्प कर
आदर भाव से अधिक दिनों तक लगातार एकाग्र भाव से दृढ़तापूर्वक नियमों का
पालन करते हुए पुरश्चरण करें।
शैलाग्रे जलमध्ये वा तीरे वा लवणाम्बुधेः।
नदीतीरेऽश्वत्थमूले रम्ये बिल्ववनान्तरे।।7।।
प्रत्यङ्मुखशिवस्थाने वृषभादिविवर्जिते।
अश्वत्थबिल्वतुलसीवने पुष्पान्तरावृते।।8।।
गवां गोष्ठेषु तीर्थेषु पुण्यक्षेत्रेषु शस्यते।
यह पुरश्चरण पर्वत शिखर पर, जल में, समुद्र के तट पर, नदी के तट
पर, पीपल वृक्ष की जड़ में, बेल के रमणीय वन में, पूर्वाभिमुख शिवालय में जहाँ
वृषभ आदि न हों, पीपल, बेल तुलसी के वन में जहाँ अन्य फूलों के वृक्ष हों, गाय
के घर में, तीर्थों में और पुण्यस्थानों में पुरश्चरण प्रशस्त है।
वैदिकाचारयुक्तानां श्रुतानां श्रीमतां सताम्।।9।।
स्वकुलस्थानजातानां³ भिक्षाशी चाग्रजन्मनाम्।

  1. घ. यदा। 2. घ. विधाय तत्। 3. घ. सत्कुलस्थानजातानां।

षोडशोऽध्यायः (105)
भुञ्जानो वा हविष्यान्नं शाकं यावकमेव वा ।।10।।
पयो मूलं फलं वापि यत्र कुत्रोपलभ्यते ।¹
वैदिक आचार से युक्त, वेदज्ञानी, धनवान्, सज्जन, अपने कुल के निवास
स्थान में उत्पन्न, ब्राह्मणों के घर से मिली भिक्षा का भोजन करता हुआ,
हविष्यान्न, शाक अथवा यव का सत्तू, दूध, कन्द-मूल, जो अनायास उपलब्ध होते
हैं, उनका भोजन करना चाहिए।
धूपस्तथाभिधार्यैतत्² संस्कृत्य प्रोक्षणादिभिः ।।11।।
वाचयेद् वैदिकैर्मन्त्रैः पुनर्मन्त्रेण मन्त्रवित् ।³
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं⁴ कुर्वीतैवाश्रमोदितम् ।।12।।
वर्जयेत् काम्यकर्माणि स्वाश्रमाविहितं च यत् ।
पुरश्चरण के लिए धूप जलाकर प्रोक्षण आदि से संस्कार कर वैदिक मन्त्र
से स्वस्तिवाचन करें, तब षडक्षर मन्त्र का जप करें। नित्य, नैमित्तिक और काम्य
कर्म जो अपने आश्रम के लिए विहित हो उसे करें। अपने आश्रम के लिए निषिद्ध
जो काम्य कर्म हो, उसका त्याग करना चाहिए।
लवणं च फलं वापि क्षारं क्षौद्रं रसान्तरम् ।।13।।
माषमुद्गमसूराद्यान् कोद्रवांश्चणकानपि ।
असद्भाषणमन्योन्यं वर्जयेदन्यपूजनम् ।।14।।
नमकीन फल, मधु, खारा स्वाद युक्त भोजन एवं अन्य रस, उड़द, मसूर,
मूँग, कोदो एवं चना का भक्षण न करें। परस्पर मिथ्या भाषण तथा अन्य देवता
की पूजा त्याग दें।
तदेव कर्म कुर्वीत तन्मनास्तत्परायणः ।
अधःशयानः शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।।15।।
लघुमृष्टहिताशी च विनीतः शान्तचेतनः ।
दान्तस्त्रिसवनास्नायी मौनी सम्मानितं मतः⁵ ।।16।।
भूमि पर शयन करते हुए आत्मा को शुद्ध कर, क्रोध पर काबू पाकर,
इन्द्रियों को जीतकर उसी देवता का ध्यान करते हुए, एकाग्रचित्त होकर कम मात्रा
में पवित्र और शरीर के लिए पथ्य भोजन करते हुए, विनयी, शान्त चित्त, उद्दान

  1. घ. यदुपलभ्यते। 2. घ. उपस्तीर्याभिधार्यैतत्। 3. घ. पावयेद् वैष्णवैर्मन्त्रैः
    पुनर्मूलेन मन्त्रवित्। 4. घ. यद्यत्। 5. घ. सम्मानितान्तरः।

(106) अगस्त्य-संहिता
विचारों से ओतप्रोत, तीनों सन्ध्याओं, प्रातः, मध्याह्न एवं सायं में स्नान करनेवाले,
मौन धारण करनेवाले तथा सम्मानित साधक पुरश्चरण के योग्य माने जाते हैं।
स्त्रीशूद्रपति तव्रात्यनाग्निकोच्छिष्टभाषणम् ।
अन्यत्संभाषितं¹ जिह्मभाषणं परिवर्जयेत् ।। 17 ।।
स्त्री, मूर्ख, पतित, कर्मच्युत, नास्तिक के साथ तथा जूठे मुँह से संभाषण का
त्याग करें, अप्रत्यक्ष व्यक्ति के प्रति भाषण, कुटिल भाषण का त्याग करें।
सभ्यैरपि न भाषेत जपहोमार्चनादिषु ।
यदि² भाषेत तत्काले सभ्यैः प्रस्तुतसाधकम् ।।18।।
अन्यथानुष्ठितं³ सर्वं भवत्येव निरर्थकम्।
जप, होम, अर्चना आदि के बीच सभ्यों के साथ भी बातचीत न करें।
यदि इस बीच उपस्थित कार्य का साधक भाषण करते हैं, तो सभी अनुष्ठान व्यर्थ
हो जाते हैं।
वाङ्मनःकर्मभिर्नित्यमस्पृहो वनितादिषु ।।19।।
वर्जयेद् गीतकाव्यादिश्रवणं नृत्यदर्शनम् ।
ताम्बूलं गन्धलेपञ्च पुष्पधारणमेव च।।20।।
मैथुनं तत्कथालापं तद्गोष्ठीरपि वर्जयेत्।
कौटिल्यं क्षीरमभ्यङ्गमनिवेदितभोजनम् ।।21।।
असंकल्पितकृत्यं च वर्जयेन्मर्दनादिकम्।
त्यजेदुष्णोदकस्नानं सुगन्धामलकादिकम् ।।22।।
वाणी, मन एवं कर्म से स्त्री आदि में अनासक्त रहें। गीत, काव्य आदि
सुनना, नाच देखना, पान खाना, सुगन्धित लेप लगाना, फूल धारण करना,
मैथुन, उसकी कथा, आलाप, शृंगारिक गोष्ठी, आदि भी छोड़ दें। कुटिलता,
दुग्धपान, तेल मलना, देवता को समर्पित किए बिना भोजन, संकल्प के बिना कोई
कर्म और मालिश आदि छोड़ दे। गर्म दूध तथा सुगन्धा, आँवला आदि से स्नान
करना भी छोड़ दें।
शिरोरुहं⁴ पञ्चगव्येन पावयेद् बहिरन्तरम्।
स्नायाच्च पञ्चगव्येन केवलामलकेन वा।।23।।

  1. घ. असत्यभाषणं। 2. घ. यद्यत्। 3. घ. अन्यथाभाषितं।4. घं. शिरोहे, क.
    शिरोगं।

षोडशोऽध्यायः (107)

श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तमन्त्रैः स्नायादनन्तरम्।
अनुतिष्ठेदनुष्ठेयं शुचिव्रततपोऽनिशम्।।२४।।
शिर के बाल को पंचगव्य से भीतर बाहर पवित्र करें। पंचगव्य से अथवा
केवल आँवले के रस से स्नान करें। इसके बाद वेद, स्मृति, पुराण में कहे गये मन्त्र
से स्नान करें। पवित्रता और नियम से दिन रात तप करते हुए अनुष्ठान करें।
सितैकविधं हेमन्ते शाल्यन्नं स्वीयसञ्चितम्¹।
आशुद्धानिर्हतं प्राद्यादनुतिलमाहृतं च यत्²।।२५।।
दधिक्षीरघृतं गव्यं ऐक्षवं गुडवर्जितम्।
तिलाश्चैव सिता मुद्गा कन्दः केमुकवर्जितम्।।२६।।
नारिकेलफलं वापि कदली लवली तथा।
आम्रामामलकं चैव पनसार्द्रं हरीतकी।।२७।।
व्रतान्तरप्रशस्तं च हविष्यं मन्यते बुधः।
अवैष्णवमसभ्यं वै यत्प्रशस्तं व्रतान्तरे।।२८।।
त्याज्यमेवात्र तत्सर्वं यदिच्छेत् सिद्धिमात्मनः।³
एक एक कण करके स्वयं संचित किया हुआ श्वेत रंग के, एक प्रकार के
अगहनी धान का चावल, जो सर्वथा शुद्ध हो और पैरों से मसला न गया हो,
भोजन करें। गाय का दही, दूध एवं घी, गुड़ को छोड़कर ईख से प्राप्त पदार्थ,
सफेद तिल, उजला मूँग, केमुक अर्थात् अरुइ अथवा पेंची से भिन्न कन्द, नारियल
का फल, केला, लवली, आम, आँवला, कटहल, आदि, हर्रे तथा अन्य व्रतों में जो
भोज्य पदार्थ प्रशस्त माने गये हैं वे हविष्यान्न हैं। किन्तु जो विष्णु को समर्पित न
किये गये हों, भले लोग न खाते हों वे हविष्यान्न नहीं हैं। यदि अपनी सिद्धि चाहते
हों, तो ऊपर कही गयी त्याज्य वस्तुओं का त्याग करें।
जपे तु⁴ वैष्णवं कर्म स्थिरधीः कर्तुमास्थितः।
जपेच्च नियतो नित्यं त्रिकालं पुरुषोत्तमम्।।२९।।
जप में विष्णु-परम्परा के कर्म करने के लिए स्थिरचित्त होकर बैठकर
प्रतिदिन, नियमपूर्वक पुरुषोत्तम श्रीराम का जप प्रातः, मध्याह्न और सन्ध्या में करें।
क्षमाहिंसादयाशीलो गृहीतस्थिरनिश्चयः।।३०।।
अर्चयन् राममव्यग्रो⁵ यावत् षडलक्षमादितः।⁶

  1. घ. स्वीयसम्भूतम्। 2. घ. अशूद्रावह्तं प्राद्यादन्यतो नाहृतं च यत्। 3. घ.
    सिद्धिमुत्तमाम्। 4. घ. यजेत। 5. घ. अर्चयन्नेव चाव्यग्रो। 6. घ. षड़लक्षमादरात्।

(108) अगस्त्य-संहिता
तर्पयेच्च विधानेन दशांशं शुद्धवारिणा।।३१।।
पुष्पाक्षतादियुक्तेन जले संपूज्य पूर्ववत्।
ततो बिल्वफलैः पुष्पैः पत्रैरपि हुताशने।।३२।।
राममाराध्य चावाह्य पूर्ववज्जुहुयात् स्वयम्।
मधुरत्रययुक्तैश्च पद्मैर्वा पायसेन वा।।३३।।
तिलैर्वाऽन्यन्तरैरेषां ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः।
क्षमाशील, अहिंसाव्रती और दयालु होकर दृढ़निश्चयी साधक आरम्भ से
छह लाख मन्त्र जप सम्पन्न होने तक व्याकुलता का त्याग कर श्रीराम की अर्चना
करता हुआ उसका दशांश तर्पण शुद्ध जल से विधानपूर्वक करे। पूर्वोक्त विधि से
जल में (कलश पर) पुष्प, अक्षत आदि से श्रीराम की पूजा करे। तब अग्नि में
आवाहन कर, श्रीराम की आराधना कर, बेल का फल, पुष्प और पत्र से पूजा
कर तीन मधुरों से युक्त कमल फूल, पायस, तिल अथवा अन्य सामग्री से पूर्वोक्त
विधि से हवन करें। तब ब्राह्मण भोजन कराये।
पूजा त्रैकालिकी नित्यं जपस्तर्पणमेव च।।३४।।
होमो ब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते।
गुरोर्लब्धस्य मन्त्रस्य प्रसन्नाच्च यथाविधि।।३५।।
पञ्चाङ्गोपासनं सिद्धेः पुरश्चैतदधीयते।
निष्कामानामेनेनैव साक्षात्कारो भवेदिति¹।।३६।।
अथ सिद्धिः सकामानां सर्वं तन्निष्फलं भवेत्।
त्रिकाल पूजन, नित्य जप एवं तर्पण, हवन एवं ब्राह्मण भोजन को पुरश्चरण
कहते हैं। सिद्ध एवं प्रसन्न गुरु से विधानपूर्वक प्राप्त मन्त्र की पंचांग उपासना को
पुरश्चरण कहते हैं। निष्काम साधक का ईश्वर से साक्षात्कार केवल इतना ही
करने से हो सकता है। सकाम साधकों को कामनाएँ सिद्ध होती है, किन्तु ईश्वर से
साक्षात्कार निष्फल हो जाता है।
पञ्चाङ्गमेतत् कुर्वीत यः पुरश्चरणं बुधः।।३७।।
सर्वं विजयेते लोके विद्यैश्वर्यसुतादिभिः।
दाता भोक्ता वरिष्ठोऽयं² जायते ज्ञातिषु स्वयम्।।३८।।
व्याख्याता लुप्तशास्त्रस्य³ श्रुतानामेव⁴ भूतले।

  1. घ. भवेदपि। 2. घ. बलिष्ठोऽयं। 3. घ. श्रुतिशास्त्राणां। 4. घ. श्रुतानामपि।

षोडशोऽध्यायः (109)
चिरायुर्भाग्यवान् पुत्रपौत्रसौभाग्यवान् सुखी ।।39 ।।
निधानमय एव स्याद् धर्मस्य यशसः श्रियः।
यदिच्छति लभेदेतन्मनसापि तपोधन ।।40 ।।
असाध्यमपि देवानां द्वीपान्तरगतं च यत्।
पञ्चाङ्गोपासनं कृत्वा यद्यदिष्टं तदाप्नुयात् ।।41 ।।
जो सकाम ज्ञानी साधक पंचांग पुरश्चरण करते हैं, वे विद्या, ऐश्वर्य पुत्र
आदि सभी वस्तुओं इस लोक में विजयी होते हैं; अपने परिचितों के बीच दाताओं
और भोग करनेवालों में श्रेष्ठ होते हैं; लुप्त शास्त्रों तथा वेदों के व्याख्याता, दीर्घायु,
भाग्यवान्, पुत्र-पौत्रवान् सौभाग्यशाली तथा सुखी होते हैं; धर्म, यश, लक्ष्मी के
भण्डार बन जाते हैं। वे मन में भी जो इच्छा करते हैं वह भले दूसरे द्वीप में भी
क्यों न हो; देवताओं के लिए भी दुर्लभ क्यों न हो उन्हें प्राप्त करते हैं। पंचांग
उपासना कर जो जो इच्छा हो उसे प्राप्त करें।
आदावन्ते च मध्ये च ब्राह्मणान् भोजयेद् बहून्।
दिने दिने यथाशक्त्या राममुद्दिश्य भक्तितः ।। 42 ।।
दधिक्षीरघृतापूपव्यञ्जनैस्तृप्तिहेतुभिः ।
ऐक्षवैरपि पानीयैर्नारिकेलफलैरपि ।। 43 ।।
सुपक्वकदलीसारपनसाम्रतिलैरपि ।
अन्यैश्च षड्रसोपेतैः पदार्थैः भोजयेद् द्विजान् ।। 44 ।।
सुभोजितेषु विप्रेषु तत्साङ्गं सफलं भवेत्।
यो विप्रं भोजयेन्नित्यं राममुद्दिश्य भक्तितः ।। 45 ।।
दरिद्रो मन्दभाग्यो वा कुले तस्य न जायते।
आदि, अन्त और मध्य में अथवा प्रतिदिन श्रीराम को समर्पित कर
भक्ति-भाव से अपनी शक्ति के अनुसार अनेक ब्राह्मण-भोजन कराएँ। तृप्त
करनेवाले दही, दूध, घी, पुआ, व्यंजन, ईख से प्राप्त रस, नारिकेल का जल आदि
पेय पदार्थ एवं फल जैसे पका केला, सार (मलाई), कटहल, आम आदि, तिल
आदि अन्न तथा अन्य छह रसों से युक्त पदार्थों से ब्राह्मणों को भोजन कराएँ।
ब्राह्मण यदि भलीभाँति भोजन कर लें, तो अंगों के साथ पुरश्चरण सफल हो
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(110) अगस्त्य-संहिता
जाता है। जो प्रतिदिन श्रीराम के नाम पर ब्राह्मण भोजन कराते हैं, उसके कुल
में दरिद्र अथवा मंदभाग्य का व्यक्ति कोई नहीं होता।
उपोष्य द्वादशीष्वेकां द्विजं यो भोजयेद् द्विजः।।46।।
गन्धैः पुष्पाक्षतैर्भक्त्या राममाराध्य भक्तितः।
नैव तत्कुलजातानां दुःखं दारिद्र्यमेव च।।47।।
एक भी द्वादशी तिथियों में भी व्रत कर जो द्विज चन्दन, फूल और अक्षत
से भक्तिपूर्वक श्रीराम की आराधना कर द्विजों को भोजन कराते हैं, उनके कुल में
जन्म लेनेवालों को इस संसार में दुःख और दरिद्रता नहीं होती है।
संक्रान्तौ पुण्ययोगे च¹ पर्वस्वपि कदाचन।
रामं यो² भोजयेद् विप्रं स वै नरपतिर्भवेत्।।48।।
संक्रान्ति में, अन्य पुण्यमय योग में या पर्वों (अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी
तथा चतुर्दशी) में श्रीराम के स्वरूप विप्रों को जो भोजन कराते हैं, वे राजा बन
जाते हैं।
यः पुरश्चरणं कुर्यात् सर्वेषां स विशिष्यते।
विद्यया पुत्रपौत्रैश्च धनधान्यादिसंपदा।।49।।
जो पुरश्चरण करते हैं, वे सबमें विद्या, पुत्र, पौत्रादि तथा धन-धान्य,
सम्पत्ति से सभी लोगों में विशिष्ट बन जाते हैं।
संसारे दुःखभूयिष्ठे य इच्छेत् सुखमात्मनः।
पञ्चाङ्गोपासेनेनैव रामं भजत भक्तितः।।50।।
संसार अनेक प्रकार के दुःखों से परिपूर्ण है; इसमें जो अपना सुख चाहते हैं
वे पंचांग उपासना कर श्रीराम की आराधना करें।
पञ्चाङ्गोपासनं भक्त्या पुरश्चरणमुच्यते।
एतद्धि विदुषां श्रेष्ठं संसारोच्छेदकारणम्।।51।।
नानेन सदृशो धर्मो नानेन सदृशं तपः।
नानेन सदृशः किञ्चिदिष्टार्थस्य तपोधन।।52।।
हे विद्वानों में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! भक्तिपूर्वक पंचांग उपासना को पुरश्चरण
कहते हैं। यह संसार में पुनर्जन्म का नाश करता है। इसके समान कोई धर्म,
तपस्या और अभीष्ट सिद्धि का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

  1. घ. संक्रान्त्यां पुण्ययोगेषु। 2. घ. कामं च।

षोडशोऽध्यायः (111)
यदि होमे त्वशक्तः स्यात् पूजायां तर्पणेऽपि वा।।52।।
तावत्संख्याजपेनैव ब्राह्मणाभ्यसनेन¹ च।
भवेदङ्गद्वयेनैव पुरश्चरणमार्य वै।।53।।
हे आर्य! यदि हवन, पूजा और तर्पण करने की शक्ति न हो, तो उतनी
संख्या में जप एवं ब्राह्मण भोजन- इन दो अंगों से ही पुरश्चरण पूरा हो जाता है।
यद्यदङ्गं विहायैतत्² संख्याद्विगुणो जपः।
कर्तव्यः साङ्गसिद्ध्यर्थं तदशक्तेन भक्तितः।।54।।
न चेदङ्गं विहायैतत्³ ततश्चेष्टमवाप्नुयात्।।55।।
यदि शक्ति के अभाव में अंगों को छोड़कर पुरश्चरण किया जाता है, तो
अंगों की भी सिद्धि के लिए भक्ति-भाव से जप की संख्या दोगुनी होनी चाहिए।
यदि अशक्त भक्तिपूर्वक अंगों को छोड़कर भी पुरश्चरण करें, तब भी इच्छित
वस्तुओं की प्राप्ति होती है।
अङ्गहीनं भवेद्यद्यत् कर्म नेष्टार्थसाधकम्।
सर्वथा भोजयेद् विप्रान् कृतसाङ्गत्वसिद्धये।।56।।
अंगहीन कर्म जो जो होते हैं, उनसे इच्छित की सिद्धि नहीं होती है; अतः
सांगत्व की सिद्धि के लिए ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए।
विप्राराधनमात्रेण व्यङ्गं साङ्गं तदाप्नुयात्।
न्यूनातिरिक्तकर्माणि न फलन्ति मनोरथान्।।57।।
केवल ब्राह्मणों की आराधना करने से अंगहीन भी अंगसहित के समान
फलदायी होता है, अन्यथा कमी-बेशी जिस कर्म में हुआ हो, उससे मनोरथ पूरे
नहीं होते।
तेष्वेव यदि पूज्येष्वपर्याप्तानि सन्ति च।
अतो यत्नेन विदुषो भोजयेत् सर्वकर्मसु।।58।।
विप्रों की आराधना कर लेने पर जो अपर्याप्त अर्थात् अंगहीन पुरश्चरण
कर्म हैं, वे भी फलदायी होते हैं; अतः सभी कर्मों में विद्वानों को भोजन कराना
चाहिए।

  1. घ. ब्राह्मणाराधनेन च। 2. घ. विहीयेत। 3. घ. विहीयेत।
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(112) अगस्त्य-संहिता

यानि यान्यपि¹ कर्माणि हीयते द्विजभोजनैः।
निरर्थकानि तानि स्युः पथि बीजाङ्कुरा इव ।।159।।
जो कोई कर्म ब्राह्मण-भोजन के अभाव में च्युत हो जाते हैं, वे रास्ते पर
गिरे बीज के अंकुर के समान निरर्थक हो जाते हैं।
तस्यैव स्तुतिलक्षेषु शस्यते बहिरर्चनम्।
रामाराधनकोटिभ्यः स ध्यानजप उत्तमः ।।160।।
लाखों स्तुतियों के द्वारा की गयी अर्चनाओ में बाह्यार्चन प्रशस्त है और
श्रीराम की आराधना की अनेक श्रेणियों में ध्यान के साथ जप उत्तम है।
मन्त्रार्थलोचनात्मायं स्वयमेवेष्टसाधकः।
योऽर्चयेद् बहुशो² नित्यं रामं तेष्वेव चिन्तयन् ।।61।।
इह भुक्तिश्च मुक्तिश्च भवेत्तस्य न संशयः ।।62।।
मन्त्रार्थ रूपी आँखों वाला, इष्टसाधक, स्वयं ही, अनेक प्रकार से,
प्रतिदिन, मन्त्रों में हीं श्रीराम की सत्ता का चिन्तन करते हुए, आराधना करते हैं,
उन्हें संसार में भोग और जीवनान्त में मोक्ष उन्हें मिलता है, इसमें सन्देह नहीं।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पुरश्चरणविधिर्नाम
षोडशोऽध्यायः।
अथ सप्तदशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
अथाभिषेकं वक्ष्यामि दीक्षाविधिमनुत्तमम्।
उपासनाशतैनापि विना येन न सिद्ध्यति ।।1।।
अगस्त्य बोले- 'अब मैं दीक्षा विधान के अन्तर्गत अभिषेक की विधि
बतलाता हूँ, जिसके विना सैकड़ो उपासना करने से भी प्रयोजन की सिद्धि नहीं
होती है।'

  1. घ. यान्यनल्पानि। 2. घ. विदुषो।

सप्तदशोऽध्यायः (113)
——————————————————————————————
उपासकस्तु शुद्धात्मा गुरुं यत्नेन तोषयेत्।
स्वचित्तवित्तकायैश्च भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥२॥
साधक शुद्ध चित्त से भक्ति और श्रद्धापूर्वक अपने तन, मन और धन से
गुरु को यत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे।
यदा ददाति सन्तुष्टः प्रसन्नवदनो मनुम्।
स्वयमेव तथा चैवमिति कर्त्तव्यताक्रमः॥३॥
गुरु संतुष्ट होकर प्रसन्न मुख से स्वयं वर प्रदान करनेवाला मन्त्र शिष्य को
देते हैं, यह कर्तव्य का क्रम है।
विशुद्धकाले देशेषु शुद्धात्मा नियतो गुरुः।
संकल्प्योपोष्य कर्त्तव्यमङ्कुरारोपणं मुने॥४॥
हे मुने! पवित्र समय में पवित्र स्थलों पर निर्मल चित्त वाले तथा नियमों का
पालन करते हुए गुरु संकल्प एवं उपवास कर बीजारोपण करें।
कुर्य्यान्नान्दीमुखश्राद्धमादौ च स्वस्तिवाचनम्।
स्वगृह्योक्तप्रकारेण¹ तदेतद् विदधीत वै॥५॥
सबसे पहले अपने गृह्यसूत्र की विधि से नान्दीमुख श्राद्ध करे, तब स्वस्तिवाचन
करें। तब यह कर्तव्य करना चाहिए।
मधुमासे भवेद् दुःखं माधवे रत्नसञ्चयः।
मरणं भवति ज्येष्ठे आषाढे बन्धुनाशनम् ॥६॥
समृद्धिः श्रावणे न्यूनं भवेद् भाद्रपदे क्षयः।
प्रजानामाश्विने मासे सर्वतः शुद्धिमेव हि॥७॥
ज्ञानं स्यात् कार्तिके सौख्यं मार्गशीर्षे भवेदपि।
पौषे ज्ञानक्षयो माघे भवेन्मेधाविवर्द्धनम् ॥८॥
फाल्गुने तु समृद्धिः स्यान्मलमासं विवर्जयेत्।
चैत्र मास में दुख, वैशाख में रत्न-संग्रह, ज्येष्ठ में मृत्यु, आषाढ में बन्धु-
नाश, श्रावण में अल्प समृद्धि, भाद्रपद में नाश, आश्विन मास में सन्तति की शुद्धि,
कार्तिक मास में ज्ञान, अग्रहण में सुख, पौष में ज्ञान का क्षय तथा माघ मास में

  1. घ. विधानेन।

(114) अगस्त्य-संहिता
दीक्षा लेने से ज्ञान-वृद्धि तथा फाल्गुन में समृद्धि की प्राप्ति होती है। दीक्षा-ग्रहण
में मलमास का त्याग करना चाहिए।
रवौ गुरौ सिते सोमे कर्त्तव्यं बुधशुक्रयोः ।।9।।
शुक्लपक्ष में रवि, गुरु, सोम, बुध और शुक्र को दीक्षा लेनी चाहिए।
अश्विनी रेवती¹ स्वाती विशाखा हस्त एव च।²
पुष्यं शतभिषक् चैव श्रवणा च धनिष्ठिका।³ ।।10।।
ज्येष्ठोत्तरात्रयेष्वेव कुर्यान्मन्त्राभिषेचनम्।
अश्विनी, रेवती, स्वाती, विशाखा, हस्त, पुष्य, शतभिषा, श्रवणा, धनिष्ठा,
ज्येष्ठा एवं उत्तरात्रय इन नक्षत्रों में मन्त्राभिषेक करना चाहिए।
पूर्णिमा पञ्चमी चैव द्वितीया सप्तमी तथा ।।11।।
द्वादश्यामपि कर्त्तव्यं षष्ठयामपि विशेषतः ।⁴
त्रयोदशी च नवमी⁵ प्रशस्ताः सर्वकामदाः ।।12।।
पूर्णिमा, पंचमी, द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी, षष्ठी, त्रयोदशी और नवमी
तिथियाँ प्रशस्त हैं, ये सभी कामनाओं की पूर्ति करती हैं।
पञ्चाङ्गशुद्धदिवसे सोदये शशितारयोः।
गुरुशुक्रोदये शुद्ध-लग्ने द्वादशशोधिते ।।12।।
चन्द्रतारानुकूले च शस्यते सर्वकर्मसु ।
तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण इन पांचों अंगों की से पवित्र दिन में
चन्द्रमा और नक्षत्रों के उदित रहने पर, गुरु एवं शुक्र के उदित रहने पर, शुद्ध
लग्न एवं द्वादश लग्नों का शोधन कर चन्द्र एवं नक्षत्र के अनुकूल समय में दीक्षा
सभी कर्मों में प्रशस्त होती है।
सूर्यग्रहणकाले तु नेदमनवेषणं भवेत् ।।13।।
सूर्यग्रहणकालेन समानो नास्ति कञ्चन ।
तत्र यद्यत् कृतं सर्वमनन्तफलं भवेत् ।।14।
न मासतिथिवारादिशोधनं सूर्य्यपर्वणि ।
ददातीष्टं गृहीतं यत् तस्मिन् काले मुनीश्वर ।।15।।

  1. घ. रोहिणी। 2. घ. हस्तभेषु च। 3. घ. में अनुपलब्ध। 4. घ. में अनुपलब्ध।
  2. घ. दशमी।
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३. राम-मन्दिर प्रतिष्ठा, विग्रह-लक्षण व उत्सव विधि

सप्तदशोऽध्यायः (115)
सिद्धिर्भवति मन्त्रस्य विनायासेन वेगतः।
अतस्तत्रैव रामस्य मन्त्रतीर्थाभिषेचनम्।।16।।
सूर्यग्रहण के समय में इन योगों का अन्वेषण नहीं किया जाता है।
सूर्यग्रहण के समान कोई काल नहीं है। उस समय में जो कर्म किये जाते हैं, उनसे
अनन्त फल मिलता है। मास, तिथि, दिन आदि की अपेक्षा सूर्यग्रहण में नहीं
होता। इस समय जो मन्त्र-ग्रहण किया जाता है, वह सभी इच्छित वस्तुओं को
पूरा करता है। बिना प्रयास का ही वह मन्त्र सिद्ध हो जाता है; अतः सूर्यग्रहण के
समय में ही श्रीराम के मन्त्ररूपी तीर्थ से अभिषेक करना चाहिए।
कतव्यं सर्वयत्नेन मन्त्रसिद्धिमभीप्सुभिः।
चतुर्भिर्वर्णकैः सम्यक् नीलपीतसितासितैः।।17।।
पूर्ववन्मण्डलं कृत्वा तत्र धान्याञ्जलिद्वयम्।
नारिकेलफलोपेतं माङ्गलैः परितोज्ज्वलम्।
निधाय कलशं तत्र तीर्थतोयसुपूरितम्।।18।।
¹वेष्टितं वस्त्रयुग्मेन पञ्चरत्नसमन्वितम्।
आम्राश्वत्थप्रसूताभिः शाखाभिरुपशोभितम्।।19।।
नारिकेलफलोपेतं मण्डलैः परितोज्ज्वलम्।
सर्वोत्सवसमायुक्तं कृत्वा तत्रार्चयेद्धरिम्।।20।।
मन्त्र सिद्धि की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के उपाय करें। नीले, पीले,
उजले एवं काले इन चारों रंगों के सुगन्धित पदार्थों से पूर्वोक्त विधि से यन्त्र का
निर्माण कर बीच में दो अंजलि धान रखकर उस पर नारियल के फल से युक्त
तथा मंगलमय पदार्थों को उसके चारों ओर रखकर कलश स्थापित कर तीर्थ के
जले से भली भाँति भर दें। उसमें पंचरत्न डालकर जोड़ा वस्त्र से लपेट दें। कलश
को आम और पीपल की शाखाओं से सुसज्जित करें। नारिकेल के फल से भी सुज्जित
कर दीप जलाकर तथा इसे चारो ओर से घेरकर सभी प्रकार का उत्सव करते हुए
वहाँ श्रीहरि की अर्चना करें।
ऋग्यजुःसामसूक्तैश्च स्मार्तैः पौराणिकैरपि।
मन्त्रैरागमिकैश्चैव वैष्णवैर्देवमर्चयेत्।।21।।
ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के सूक्तों से स्मृति और पुराणों तथा आगम
के विष्णु-मन्त्रों से देवता की अर्चना करें।

  1. घ. यहाँ से चार चरण घ. में अनुपलब्ध।