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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 337 में से

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पृष्ठ 28

(26) अगस्त्य-संहिता
पाण्डुलिपि में लिपिकाल, स्थान तथा लिपिकार का नाम अनुपलब्ध है,
किन्तु लिपि की दृष्टि से यह अर्वाचीन प्रतीत होती है। इस पाण्डुलिपि का काल
20वीं शती का पूर्वार्द्ध माना जा सकता है। लिपि अत्यन्त स्पष्ट है तथा लिपिकार
संस्कृत भाषा के अभिज्ञ प्रतीत होते हैं। फलतः शुद्धता की दृष्टि से यह पाण्डुलिपि
महत्त्वपूर्ण है। इसे हमने पाण्डुलिपि संख्या 'ख' के रूप में अभिहित कर पाठान्तर
आदि का संकेत किया है। इस पाण्डुलिपि का विवरण निम्न प्रकार से है-
पाण्डुलिपि संख्या- 14971
प्रवेश संख्या- 49653
स्थान- सरस्वती भवन पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी।
विषय प्रविष्टि- पुराणेतिहास
आकार - 24 X 11 से.मी.
लिखित स्थान- 19 X 9 से.मी.
प्रति पत्र पंक्तिसंख्या- 11
प्रति पंक्ति अक्षर संख्या - 37
आरम्भ- श्री गणेशाय नमः । अगस्त्यो नाम विप्रर्षिः सत्तमो गौतमीतटे ॥
स्थिति- अपूर्ण, पत्रसंख्या 1-8 तथा 11
पाण्डुलिपि 'ग'
सरस्वती भवन पुस्तकालय, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में सुरक्षित
यह अगस्त्य-संहिता की अन्य अपूर्ण पाण्डुलिपि है। इसमें पत्रसंख्या 39 तथा 47
से 65 तक उपलब्ध है। अन्त भी खण्डित है। इसमें 19वें अध्याय के 28वें श्लोक
से 41वें श्लोक तक तथा 23वें अध्याय के 29वें श्लोक से 32वें अध्याय के 36वें
श्लोक तक उपलब्ध है। लिपिकाल का उल्लेख नहीं है, किन्तु लिपि की दृष्टि से
पाण्डुलिपि प्राचीन प्रतीत होती है। इसका लिपिकाल 19वीं शती का पूर्वार्द्ध या
उसे भी प्राचीनतर अनुमानित है।
यह भी पाण्डुलिपि 'क' की तरह अशुद्धियों से भरी हुई है। यहाँ तक कि
'स' एवं 'श' में भी व्यत्यय है तथा कठिन सन्धि के स्थलों पर तो सर्वत्र अशुद्धि है।
लिपिकार संस्कृत से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं। फिर भी अध्याय संख्या 31 इसमें
पूर्णतः उपलब्ध है, जो पाण्डुलिपि 'क' में लिपिकार के भ्रम से खण्डित है।
इस पाण्डुलिपि का विवरण इस प्रकार है-