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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 337 में से

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पृष्ठ 235

(174) अगस्त्य-संहिता

अगस्त्य बोले- यही मुक्ति का सबसे उत्तम मार्ग है और यहीं सर्वश्रेष्ठ कर्म
है। राम ही परम ज्योति हैं, जो सत् स्वरूप, चैतन्यस्वरूप और आनन्दस्वरूप हैं।
परं ज्योतिः परञ्चात्मा तथैव द्वयमोक्षयोः।¹
अन्त्याद्ययोर्यकारस्य द्वितीयादिस्वरान्तयोः ॥२॥
श्रीराम परम ज्योतिःस्वरूप हैं, इस संसार की परम आत्मा हैं और उसी
प्रकार आदि और अन्त के द्वन्द्व स्वरूप जन्म और मोक्ष की परम ज्योति हैं।
यकार अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति की भी परम ज्योति हैं। द्वितीया शक्ति अर्थात्
माया से स्वर्ग तक की परम ज्योति है।
श्रुतिस्मृतिपुराणानि सम्यगालोक्य निश्चितम्।
वसिष्ठवामदेवाद्यैर्नारदाद्यैश्च यत्नतः ॥३॥
वसिष्ठ, वामदेव आदि ऋषि और नारद आदि भक्तों ने वेद, स्मृति, और
पुराणों का यत्नपूर्वक भलीभाँति अनुशीलन कर ऐसा निश्चय किया है।
यज्ञोऽयमस्माद् भूतानि , जङ्गमाजङ्गमं ततः।
इतरेतरमिश्रेभ्यस्तेभ्यो भूतानि यज्ञिरे ॥४॥
श्रीराम यज्ञस्वरूप हैं, जिससे स्थावर और जंगम प्राणियों की उत्पत्ति हुई
है और स्थावर एवं जंगम प्राणियों में एक दूसरे के मिश्रण से अन्य प्राणियों की भी
उत्पत्ति हुई है।
शब्दप्रकाशमानोऽयं तत एष विनिर्गतः।
व्यस्त एव तु शारीरः परः सारविलक्षणः ॥५॥
शब्द को द्वारा प्रकाशित जो यह मन्त्र है, वह भी श्रीराम से ही निर्गत
हुआ है, जो परम सारमय मन्त्रों में विलक्षण है, वह व्यस्त रूप में , पृथक् रूप में
शरीर से सम्बद्ध है अर्थात् शरीर के अवयव मुख से उच्चरित होने योग्य है, वैखरी
नाद है।
पञ्चाशद्वर्णरूपेण सोऽप्यनेकविधो भवेत्।
पदवाक्यादिना यस्य शब्दस्यान्तो न विद्यते ॥६॥
पचास वर्णों के रूप में वह मन्त्र भी अनेक प्रकार का है। यह मन्त्र पद,
वाक्य आदि के भेद से शब्द रूप में अनगिनत है।

  1. ग. द्वयमाश्रयोः।