अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
पृष्ठ 152, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 152ततः कुण्डस्थलं सम्यग् गोमयेनोपलिप्य च।
चतुर्दशोऽध्यायः (91)
ततः कुण्डस्थलं सम्यग् गोमयेनोपलिप्य च।
शालितण्डुलचूर्णैश्च नीलपीतसितासितैः ।।३६।।
शोभोपशोभासंयुक्तं मण्डलं व्यक्तमुज्ज्वलम् ।
कुण्डस्य सन्निधौ¹ सम्यग् वायव्ये विदधीत वै ।।३७।।
तब कुण्ड के स्थल को भलीभाँति गाय के गोबर से लीप कर चावल के
नील, पीला, सफेद और काला पीठा से विभिन्न प्रकार से सजाकर स्पष्ट एवं
चमकीला यन्त्र कुण्ड के समीप वायुकोण (पश्चिमोत्तर कोण) में लिखें।
तत्राष्टपत्रं कमलं वृत्तत्रयपरिवृतम्।
सोमसूर्याग्निबिम्बे द्वे तथा कुर्याद् विचक्षणः ।।३८।।
वहाँ अष्टदल कमल लिखें, जो तीन वृत्तों से घिरा हुआ हो तथा उसपर
चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के दो बिम्ब बनाएँ।
चतुरस्रं बहिस्तस्य षट्कोणं कर्णिकान्तरे।
पीतं पूर्वे सितं देयं पश्चिमेऽप्युत्तरे तथा ।।३९।।
रक्तं तु दक्षिणे कृष्णं पाटलं वह्निसंस्थितम् ।
निर्ऋति नीलवर्णन्तु वायव्ये धूम्रवर्णकम् ।।४०।।
ऐशे गौरं विनिर्दिष्टमष्टपत्रे त्वयं क्रमः।
इसके बाहर चतुर्भुज बनाएँ तथा कर्णिका (मध्यभाग) में षट्कोण बनाएँ।
शङ्खचक्रगदापद्मं धनुर्बाणांश्च² मण्डले ।।४१।।
विलिखेद् वर्णकैः सम्यक् तत्र रामं समर्च्चयेत्।
शंख, चक्र, गदा, पद्म, धनुष और बाण इस षट्कोण में सुन्दर ढंग से बनाएँ
और वहाँ श्रीराम की अर्चना करें।
कुण्डान्तरेष्वेवमेवाराध्य श्रद्धया मुने ।³।४२।।
आदौ वह्निमुखं कुर्यादुपविष्टः सुविष्टरे।
दूसरे कुण्डों में भी इसी प्रकार श्रद्धा से आराधना कर सुन्दर विष्टर (25
कुशों से निर्मित अधःकेश पुंज) पर बैठकर सबसे पहले अग्निमुख करें।
प्राणानायम्य मनसा जपेन्मन्त्रमनन्यधीः ।।४३।।
यावन्मरुत् संचरति सर्वाङ्गेष्वपि निश्चलः।
- घ. दक्षिणे। 2. घ. धनुर्बाणानि । 3. घ. शृणुयान्मुने ।
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