अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
पृष्ठ 150, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 150चतुर्दशोऽध्यायः (89)
चतुर्दशोऽध्यायः (89)
दूसरी और तीसरी मेखला भी एक तिहाई भाग में होनी चाहिए। सभी
प्रकार के कुण्डों में दो-दो अंगुलियाँ बढ़ाकर मेखला बनानी चाहिए। पहली
मेखला एक तिहाई भाग में बनावें और अन्य मेखलाएँ पूर्ववत् परिमाण में
बनाएँ। एक हाथवाले कुण्ड में कण्ठ का भाग (योनि का अग्रभाग, जो कुण्ड में
निराधार स्थापित किया जाये) आठ यव के परिमाण का होगा तथा रत्निप्रमाण
(मुट्ठी बँधा हाथ) के कुण्ड में कण्ठ छह यव के परिमाण का होगा तथा मुट्ठी वाले
भाग से रहित एक हाथ के प्रमाण वाले कुण्ड में चार यव के परिमाण का कण्ठ
बनावें।
सर्वेषु कुण्डमानेषु चाङ्गुलिद्वयवृद्धितः।
कुण्डो यत्नेन कर्तव्यो भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ।।२४।।
भोग और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के कुण्डों में दो-दो
अंगुल बढ़ाकर यत्नपूर्वक कुण्ड का निर्माण करें।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च क्रमाद् भवेत्।
प्रथमा च द्वितीया च तृतीया मेखला स्मृता ।।२५।।
कुण्ड तीन प्रकार के होते हैं- सात्विकी, राजसी एवं तामसी तथा मेखला
भी प्रथमा, द्वितीया एवं तृतीया के नाम से तीन होतीं हैं।
योनिः कुण्डानुसारेण कुर्यादाद्यन्तमध्यतः।
उक्ताङ्गुलिप्रमाणेण द्विगुणाञ्च चतुर्गुणाम् ।।२६।।
होमसंख्यानुविधिना सर्वलक्षणलक्षितम् ।
स्रुवं बाहुप्रमाणेण होमार्थं विदधीत वै ।।२७।।
कुण्ड के परिमाण के अनुसार कुण्ड की योनि आरम्भ, अन्त और मध्य
भाग का निर्माण पूर्वोक्त अंगुल के प्रमाण से दो दुना या चारगुना करें। होम-
संख्या के अनुसार सभी लक्षणों से सम्पन्न मेखलाओं का निर्माण करें। होम के लिए
एक हाथ का स्रुव बनावें।
चतुरस्रं विधायादौ सप्तपञ्चाङ्गुलं क्रमात्।
तृतीयांशेन गर्तः स्यादन्तर्वृत्तशोभितम् ।।२८।।
खनित्वा समं तिर्यगूर्ध्वंवतदधः शोधयेद् बहिः।
चतुर्थाशं चाङ्गुलस्य शेषं त्वर्द्धं¹ तदन्ततः ।।२९।।
- घ. शेषाच्चार्द्धम्।