अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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अयोध्याकाण्ड
७१
कैकेयी रामदुःखस्य कारणं विधिना कृता ।
मन्थराबुद्धिमाश्रित्य कैकेयी पापमाचरत् ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः प्राह सखे शृणु वचो मम ।
कः कस्य हेतुर्दुःखस्य कश्च हेतुः सुखस्य वा ॥ ४ ॥
स्वपूर्वार्जितकर्मैव कारणं सुखदुःखयोः ॥ ५ ॥
सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता
परो ददातीति कुबुद्धिरेषा ।
अहं करोमीति वृथाऽभिमानः
स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥ ६ ॥
सुहृन्मित्रार्युदासीनद्वेष्यमध्यस्थबान्धवाः ।
स्वयमेवाचरन्कर्म तथा तत्र विभाव्यते ॥ ७ ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं स्वकर्मवशगो नरः ।
यद्यद्यथागतं तत्तद् भुक्त्वा स्वस्थमना भवेत् ॥ ८ ॥
न मे भोगागमे वाञ्छा न मे भोगविवर्जने ।
आगच्छत्वथ मागच्छत्वभोगवशगो भवेत् ॥ ९ ॥
यस्मिन् देशे च काले च यस्माद्वा येन केन वा ।
कृतं शुभाशुभं कर्म भोक्तव्यं तत्तत्र नान्यथा ॥ १० ॥
अलं हर्षविषादाभ्यां शुभाशुभफलोदये ।
विधात्रा विहितं यद्यत्तदलङ्घ्यं सुरासुरैः ॥ ११ ॥
सर्वदा सुखदुःखाभ्यां नरः प्रत्यवरुध्यते ।
शरीरं पुण्यपापाभ्यामुत्पन्नं सुखदुःखवत् ॥ १२ ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
द्वयमेतद्धि जन्तूनामलङ्घ्यं दिनरात्रिवत् ॥ १३ ॥
सुखमध्ये स्थितं दुःखं दुःखमध्ये स्थितं सुखम् ।
द्वयमन्योन्यसंयुक्तं प्रोच्यते जलपङ्कवत् ॥ १४ ॥
तस्माद्धैर्येण विद्वांस इष्टानिष्टोपपत्तिषु ।
न हृष्यन्ति न मुह्यन्ति सर्वं मायेति भावनात् ॥ १५ ॥
गुहलक्ष्मणयोरेवं भाषतोर्विमलं नभः ।
बभूव रामः सलिलं स्पृष्ट्वा प्रातः समाहितः ॥ १६ ॥
हुए हैं ॥ १-२ ॥ विधाताने रामजीके इस दुःखका कारण कैकेयीको बना दिया। मन्थराकी बुद्धिपर विश्वास करके कैकेयीने यह बड़ा पापका काम किया !” ॥ ३ ॥
यह सुनकर लक्ष्मणजीने कहा-“भाई ! मेरी बात सुनो; किसीके दुःख अथवा सुखका कारण दूसरा कौन है ? अर्थात् कोई भी नहीं है। मनुष्यका पूर्वकृत कर्म ही उसके सुख अथवा दुःखका कारण होता है ॥४-५॥ सुख और दुःखका देनेवाला कोई और नहीं है; 'कोई अन्य सुख-दुःख देता है' यह समझना कुबुद्धि है। 'मैं करता हूँ' यह वृथा अभिमान है, क्योंकि लोग अपने-अपने कर्मोंकी डोरीमें बँधे हुए हैं ॥ ६ ॥ यह मनुष्य स्वयं ही पृथक्-पृथक् आचरण करके उसके अनुसार सुहृद्, मित्र, शत्रु, उदासीन, द्वेष्य, मध्यस्थ और बन्धु आदिकी कल्पना कर लेता है ॥ ७ ॥ अतः मनुष्यको चाहिये कि प्रारब्धानुसार सुख या दुःख जो कुछ भी जैसे-जैसे प्राप्त हो उसे वैसे ही भोगते हुए सदा प्रसन्नचित्त रहे ॥ ८ ॥ हमें न तो भोगोंकी प्राप्तिकी इच्छा है और न उन्हें त्यागनेकी । भोग आयें या न आयें हम भोगोंके अधीन नहीं हैं ॥९॥ जिस देश अथवा जिस कालमें जिस-किसीके द्वारा शुभ अथवा अशुभ कर्म किया जाता है, उसे निसन्देह उसी प्रकार भोगना पड़ता है ॥ १० ॥ अतः शुभ अथवा अशुभ कर्मफलके उदय होनेपर हर्ष अथवा दुःख मानना व्यर्थ है, क्योंकि विधाताकी गतिका देवता अथवा दैत्य कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता ॥ ११॥ मनुष्य सदा ही सुख और दुःखसे घिरा रहता है क्योंकि मनुष्य-शरीर पाप और पुण्यके मेलसे उत्पन्न होनेके कारण सुख-दुःखमय ही है ॥ १२ ॥ सुखके पीछे दुःख और दुःखके पीछे सुख आता है। ये दोनों ही दिन और रात्रिके समान जीवोंसे अनुल्लङ्घनीय हैं ॥१३॥ सुखके भीतर दुःख और दुःखके भीतर सुख सर्वदा वर्तमान रहता है। ये दोनों ही जल और कीचड़के समान आपसमें मिले हुए रहते हैं ॥ १४ ॥ इसलिये विद्वान् लोग ‘सब कुछ माया ही है' इस भावनाके कारण इष्ट या अनिष्टकी प्राप्तिमें धैर्य रखकर हर्ष या शोक नहीं मानते” ॥ १५ ॥
गुह और लक्ष्मणके इस प्रकार बातचीत करते-करते आकाशमें उजाला हो गया। तब रामचन्द्रजीने