अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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दास्यामि पुत्रमेकं ते उभयोर्वंशवर्धनम् ॥३४॥
ततः प्रासूत सा पुत्रं पुलस्त्याल्लोकविश्रुतम् ।
विश्रवा इति विख्यातः पौलस्त्यो ब्रह्मविन्मुनिः ३५
तस्य शीलादिकं दृष्ट्वा भरद्वाजो महामुनिः ।
भार्यार्थं स्वां दुहितरं ददौ विश्रवसे मुदा ॥३६॥
तस्यां तु पुत्रः सञ्जज्ञे पौलस्त्याल्लोकसम्मतः ।
पितृतुल्यो वैश्रवणो ब्रह्मणा चानुमोदितः ॥३७॥
ददौ तत्तपसा तुष्टो ब्रह्मा तस्मै वरं शुभम् ।
मनोऽभिलषितं तस्य धनेशत्वमखण्डितम् ॥३८॥
ततो लब्धवरः सोऽपि पितरं द्रष्टुमागतः ।
पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता ॥३९॥
नमस्कृत्याथ पितरं निवेद्य तपसः फलम् ।
प्राह मे भगवान् ब्रह्मा दत्त्वा वरमनिन्दितम् ॥४०॥
निवासाय न मे स्थानं दत्तवान्परमेश्वरः ।
ब्रूहि मे नियतं स्थानं हिंसा यत्र न कस्यचित् ॥४१॥
विश्रवा अपि तं प्राह लङ्कानाम पुरी शुभा ।
राक्षसानां निवासाय निर्मिता विश्वकर्मणा ॥४२॥
त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्ते रसातलम् ।
सा पुरी दुष्प्रधर्षान्यैर्मध्ये सागरमास्थिता ॥४३॥
तत्र वासाय गच्छ त्वं नान्यैः साऽधिष्ठिता पुरा ।
पित्रादिष्टस्त्वसौ गत्वा तां पुरीं धनदोऽविशत् ॥४४॥
स तत्र सुचिरं कालमुवास पितृसम्मतः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षसः ॥४५॥
रसातलान्मर्त्यलोकं चचार पिशिताशनः ।
गृहीत्वा तनयां कन्यां साक्षाद्देवीमिव श्रियम् ॥४६॥
अपश्यद्धनदं देवं चरन्तं पुष्पकेण सः ।
"मैं तुझे दोनों वंशों (मातृपक्ष और पितृपक्ष) को
बढ़ानेवाला एक पुत्र दूँगा" ॥३४॥
तब उस कन्याने पुलस्त्यजीद्वारा एक त्रिलोक-
विख्यात पुत्रको जन्म दिया, जो पुलस्त्य-पुत्र ब्रह्म-
वेत्ता मुनिवर विश्रवाके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३५ ।
विश्रवाका शील-स्वभावादि देखकर महामुनि भरद्वाजने
प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी ॥ ३६ ॥
उससे पुलस्त्यनन्दन विश्रवाने एक त्रिलोकमें प्रतिष्ठित
पुत्र उत्पन्न किया । वह विश्रवाका पुत्र अपने पिता-
हीके समान था तथा ब्रह्माजीने भी उसकी प्रशंसा
की थी ॥ ३७ ॥ उसके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने
उसे मनोवाञ्छित श्रेष्ठ वर देकर अखण्डित धनेश्वरता
दी ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे धनाध्यक्ष होकर
वह उन्हींके दिये हुए महातेजस्वी पुष्पक विमानपर
चढ़कर अपने पितासे मिलनेके लिये आया ॥ ३९ ॥
और उन्हें अपने तपका फल निवेदन कर प्रणाम करके
बोला— "भगवान् ब्रह्माजीने मुझे यह अत्युत्तम वर
दिया है ॥ ४० ॥ किन्तु उन परमेश्वरने मुझे रहनेके
लिये कोई स्थान नहीं दिया । अतः आप मुझे कोई
ऐसा निश्चित स्थान बताइये जहाँ रहनेसे किसीकी
हिंसा न हो" ॥ ४१ ॥ तब विश्रवाने उससे कहा—
"(दानवोंके) विश्वकर्माने लंका नामकी एक सुन्दर पुरी
राक्षसोंके रहनेके लिये बनायी है ॥ ४२ ॥ किन्तु दैत्य-
लोग विष्णुभगवान्के भयसे उसे छोड़कर रसातलको
चले गये हैं। उस पुरीका किसी शत्रुसे आक्रान्त होना
अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वह समुद्रके बीचमें बसी
हुई है ॥ ४३ ॥ तुम वहीं रहनेके लिये जाओ । उस
पुरीपर इससे पहले और किसीका अधिकार नहीं
हुआ।" तब धनपति कुबेरने पिताकी आज्ञासे जाकर
उस पुरीमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥ वहाँ अपने पिताकी
सम्मतिसे उन्होंने बहुत समयतक निवास किया ।
किसी समय सुमाली नामक एक मांस-भोजी राक्षस
साक्षात् लक्ष्मीदेवीके समान रूपवती अपनी छोटी पुत्री-
को साथ लिये रसातलसे आकर मर्त्यलोकमें घूम रहा था
॥ ४५-४६ ॥ उसने भगवान् कुबेरको पुष्पक विमान-
पर चढ़कर विचरते देखा । तब महामति सुमाली