सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

९६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ९


योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी ।
शेषोऽपि लक्ष्म॑णो जातो राममन्वेति सर्वदा ॥४४॥
रावणं हन्तुकामास्ते गमिष्यन्ति न संशयः।
कैकेय्या वरदानादि यद्यन्निष्ठुरभाषणम् ॥४५॥
सर्वं देवकृतं नोचेदेवं सा भाषयेत्कथम् ।
तस्मात्त्यजाग्रहं तात रामस्य विनिवर्तने ॥४६॥
निवर्तस्व महासैन्यैर्मातृभिः सहितः पुरम् ।
रावणं सकुलं हत्वा शीघ्रमेवागमिष्यति ॥४७॥
इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं भरतो विस्मयान्वितः ।
गत्वा समीपं रामस्य विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥४८॥
पादुके देहि राजेन्द्र राज्याय तव पूजिते ।
तयोः सेवां करोम्येव यावदागमनं तव ॥४९॥
इत्युक्त्वा पादुके दिव्ये योजयामास पादयोः।
रामस्य ते ददौ रामो भरतायातिभक्तितः ॥५०॥
गृहीत्वा पादुके दिव्ये भरतो रत्नभूषिते ।
रामं पुनः परिक्रम्य प्रणनाम पुनः पुनः ॥५१॥
भरतः पुनराहेदं भक्त्या गद्गदया गिरा ।
नवपञ्चसमान्ते तु प्रथमे दिवसे यदि ॥५२॥
नागमिष्यसि चेद्राम प्रविशामि महानलम् ।
बाढमित्येव तं रामो भरतं संन्यवर्तयत् ॥५३॥
ससैन्यः सवसिष्ठश्च शत्रुघ्नसहितः सुधीः ।
मातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं गमनायोपचक्रमे ॥५४॥
कैकेयी राममेकान्ते स्रवन्नेत्रजलाकुला ।
प्राञ्जलिः प्राह हे राम तव राज्यविघातनम् ॥५५॥
कृतं मया दुष्टधिया मायामोहितचेतसा ।
क्षमस्व मम दौरात्म्यं क्षमासारा हि साधवः ॥५६॥


रूपसे जन्म लिया है ॥४३॥ इसी प्रकार योगमाया-
ने जनकनन्दिनी सीताके रूपसे अवतार लिया है।
और शेषजी लक्ष्मणके रूपसे उत्पन्न होकर उनका
अनुगमन कर रहे हैं ॥४४॥ वे रावणको मारना
चाहते हैं इसलिये निस्सन्देह वनको ही जायेंगे। कैकेयी-
के जो कुछ भी वरदान आदि और निष्ठुर भाषण
आदि कार्य हैं वे सब देवताओंकी प्रेरणासे ही हुए हैं,
नहीं तो वह ऐसे वचन कैसे बोल सकती थी ? इस-
लिये हे तात ! तुम रामको लौटानेका आग्रह छोड़ दो
॥४५-४६॥ और भाई शत्रुघ्न तथा सेनाके सहित
अयोध्याको लौट चलो; राम भी कुलसहित रावणका
संहार करके वहाँ शीघ्र ही आ जायेंगे" ॥४७॥

गुरुजीके ये वचन सुनकर भरतको अति विस्मय
हुआ और उन्होंने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्र-
जीके पास जाकर कहा-॥४८॥ "हे राजेन्द्र ! आप
मुझे राज्य-शासनके लिये अपनी जगत्पूज्य चरण-
पादुकाएँ दीजिये । जबतक आप लौटेंगे तबतक मैं
उन्हींकी सेवा करता रहूँगा ।" ॥४९॥

ऐसा कह भरतजीने उन्हें उनके चरणोंमें दो
दिव्य पादुकाएँ (खड़ाऊँ) पहना दीं । श्रीरामचन्द्र-
जीने भरतका भक्ति-भाव देखकर वे खड़ाऊँ उन्हें दे
दीं ॥५०॥ भरतजीने वे रत्नजटित दिव्य पादुकाएँ
लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की और उन्हें
बारम्बार प्रणाम किया ॥५१॥

तदनुसार, वे भक्तिवश गद्गद्-वाणीसे बोले, "हे
राम ! यदि चौदह वर्षके व्यतीत होनेपर आप पहले
दिन ही अयोध्या न पहुँचे तो मैं महान् अग्निमें प्रवेश
कर जाऊँगा ।" तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा'
कह भरतजीको विदा किया ॥ ५२-५३ ॥

तदुपरान्त बुद्धिमान् भरतजीने सम्पूर्ण सेना, वसिष्ठ,
शत्रुघ्न, समस्त माताओं तथा मन्त्रियोंके साथ चलनेकी
तैयारी की ॥५४॥

इसी समय कैकेयीने एकान्त स्थानमें नेत्रोंमें जल
भरकर हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा-"हे राम !
मायासे मुग्धचित्त हो जानेके कारण मुझ कुबुद्धिने
तुम्हारे राज्याभिषेकमें विघ्न डाल दिया सो तुम मेरी
इस कुटिलताको क्षमा करना क्योंकि साधुजन सर्वदा
क्षमाशील ही होते हैं ॥ ५५-५६ ॥ आप साक्षात्