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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 540 में से

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से उसका सौन्दर्य क्षतिग्रस्त हो जाता है उसी प्रकार शाकुन्तल में से किसी पंक्ति या किसी शब्द को हटा देना उसके सौन्दर्य शरीर को आघात पहुँचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। कवि ने एक-एक शब्द एवं एक-एक वाक्य बड़ी सावधानी से सजाया है। फिर भी शाकुन्तला की विश्वव्यापी ख्याति का मूल कारण उसका जीवन दर्शन है। उसमें संशय-संघर्ष का तूफान नहीं है, प्रत्युत परमशान्ति का प्रकाश है। शकुन्तला तथा दुष्यन्त दोनों ने प्रमाद किया है तथा परिणामतः पश्चात्ताप तथा तपस्या अग्नि में तपकर निर्मल हो गये हैं। प्रेम एवं नैतिक दायित्व का ह्रास नहीं है और दोनों परस्पर मिल कर समरस बन गये हैं विषाद एवं निराशा के बाद दोनों जिस मङ्गलमय परिपक्व जीवन में प्रवेश कर गये हैं वहाँ आध्यात्मिक शान्ति है जो संस्कृत नाटकों की विशेषता है।

वस्तुतः कालिदास की काव्यात्मक प्रतिभा जितनी पटभूमि को आच्छन्न करती है उतनी शेक्सपीयर की प्रतिभा की पहुँच के बाहर है। कालिदास ने महाकाव्य तथा नाटकों का प्रणयन किया है जब कि शेक्सपीयर की प्रतिभा केवल नाट्य कला के सजाने में ही सीमित है। कालिदास के काव्यों में भारतीय संस्कृति के चिन्तन आदर्श अनवद्य रूप में ध्वनित हुए हैं और वे सच्चे अर्थों में भारतवर्ष के राष्ट्रीय कवि हैं।

जहाँ तक नाटकीय उपलब्धियों का प्रश्न है शेक्सपीयर सफल हैं। जीवन की विपन्नता एवं विशदता को चित्रित करने में तथा इतिहास के अतीत को सजीवता के साथ नाटकीय अभिव्यक्ति देने में शेक्सपीयर अद्वितीय हैं। किन्तु अन्य दिशाओं में कालिदास शेक्सपीयर से आगे बढ़ गये हैं। प्रकृति का चित्रण तथा मानव जीवन के सामरस्य का निदर्शन जैसा कालिदास की कृतियों में दृष्टिगोचर होता है वैसा शेक्सपीयर की रचनाओं में खोजने पर भी नहीं मिलेगा। इसी प्रकार जीवन के जो आध्यात्मिक तत्त्व कालिदास कृतियों में हैं वह शेक्सपीयर की कृतियों में नहीं हैं। कालिदास सच्चाई एवं सहानुभूति के दरवाजे से विश्व के हृदय में प्रवेश करते हैं। मानव मन की शाश्वत अभिलाषाओं का चित्रण सटीक तथा सर्वाङ्गपूर्ण कालिदास की कृतियों में उद्वेलित है तथा सभी के हृदयों को आवर्जित करती रहती है।

कालिदास की शैली

कालिदास वैदर्भीरीति के कुशल कवि हैं। उनकी रचनाओं में व्यञ्जनाशक्ति की चारुता, प्रसादगुण की प्रचुरता पाठकों के हृदय को चमत्कृत कर देती है। जिस प्रकार स्वच्छ जल में पड़ी हुई वस्तु स्पष्ट दिखाई पड़ती है उसी प्रकार उनके ग्रन्थों में अर्थ निर्मल एवं स्पष्ट प्रतीत होते हैं। इनकी कृतियों में प्रसादगुण के साथ-साथ सरसता के दर्शन होते हैं। यमक अलंकार के प्रति रघुवंश के नवम सर्ग में उनकी रुचि दिखलाई पड़ती है और द्रुतविलम्बित छन्द का अन्तिम चरण यमकमय किया गया है, पर वह भी सीमित स्थान में। उससे प्रसादगुण की कोई क्षति नहीं पहुँचती। उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग भी उन्होंने बड़ी सफलता के साथ किया है, पर इन सबसे बढ़कर उनकी प्रसिद्धि उपमाओं के लिए है। अनुरूपता तथा कमनीयता उनमें कूट-कूट कर भरी पड़ी है। कवि की सबसे सुन्दर उपमा कुमारसंभव के पञ्चम सर्ग के अन्त में आई है। भगवान शङ्कर अपने निमित्त तप कर रही उमा को अपनी ही निन्दा करके उसे क्रुद्ध कर देते हैं। उन्हें न पहचान कर जब वह अन्यत्र जाने लगती है तब वे अपने वास्तविकरूप में प्रगट होकर उसे चौंका देते हैं। वह स्तब्ध रह जाती है, शरीर कांपने लगता है, आगे