सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 540 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

( ५७ )

इस प्रकार अनुराग का विकास, नये नये पात्रों की सृष्टि, शाप की कल्पना अंगूठी की उद्भावना आदि कालिदास की बुद्धि का चमत्कार हैं। कण्व, दुष्यन्त, शकुन्तला और सर्वदमन ये महाभारत के पात्र हैं। शिकार खेलते समय कण्वाश्रम पर पहुँचना, गान्धर्व विवाह का कण्व द्वारा अनुमोदन, पहचानने से इनकार और फिर स्वीकार महाभारत के कथानक से संगृहीत है।

नाटक में कथा का वर्गीकरण

समालोचक वर्ग के अनुसार अभिज्ञानशाकुन्तल की कथा तीन अंशों में विभक्त है। (१) प्रथम अंश में शिकारी राजा दुष्यन्त और प्रकृति सुकुमारी भोली-भाली शकुन्तला का कण्वाश्रम में अस्थायी मिलन (२) दूसरे अंश में इन दोनों का किञ्चित्कालिक विरह (३) और तीसरे अंश में पुनः दोनों का स्थायी मिलन। प्रथम अंक में अस्थायी प्रथम मिलन के बाद चार अङ्कों तक तो प्रयाण की तैयारी की गई है। पञ्चम और षष्ठ दो अङ्कों में वियोग घटनाएँ अङ्कित हैं। अन्त के सप्तम अङ्क में पुत्रसहित शकुन्तला और दुष्यन्त इन दोनों का पुनः स्थायी मिलन वर्णित है।

प्रथम अस्थायी मिलन के घटनाचक्र तथा चार अंकों तक के कथानक का स्थान तपोवन में महर्षि कण्व का पुनीत आश्रम है। पञ्चम तथा षष्ठ अङ्क में वर्णित वियोग दशा का वर्णन-स्थान नगर में राजा का महल तथा उद्यान हैं। अन्त के स्थायी मिलन का स्थान किंपुरुष वर्ष के हेमकूट पर्वतपर मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप का आश्रम है। इस प्रकार की घटनाओं को तीन भागों में विभक्त कर प्रकृति के उपासक कविवर कालिदास ने संकेत किया है कि वस्तुतः तपोवन ही सुखशान्ति के सदन हैं तथा अनेक चाकचक्कियों से परिपूर्ण नगर अनेक कष्टकर तथा सन्तोषों की भूमि है। प्रकृति प्रेमी कालिदास की प्रगाढ़ धारणा है कि नगरों के कृत्रिम जीवन से ऊबे हुए प्राणियों के लिए ऋषि-महर्षियों के तपोवन और आश्रम ही शाश्वत शान्तिदायक हैं तथा वहीं जीवन की सफलता है इस प्रकार की धारणा से प्राचीन काल के राजे महाराजे अपने उत्तराधिकारियों को राज्य भार देकर अपनी धर्म-भार्या के साथ तपोवन में जाकर अपने जीवन के अन्तिम क्षण व्यतीत करते थे।

नाटकों की उत्पत्ति समीक्षा

किसी कलाकार की मानसिक अभिव्यक्ति को दो भागों में विभक्त किया गया है। उपयोगी कला और ललितकला। पुनः ललितकला का वर्गीकरण पांच भागों में विभक्त है। (१) वास्तुकला (२) मूर्तिकला (३) चित्रकला (४) संगीतकला ओर (५) काव्य कला। इनमें काव्यकला के प्रमुख दो भेद हैं, एक गद्यकाव्य दूसरा पद्यकाव्य। नाटक इन दोनों भेदों के अन्तर्गत आता है। नाटक ही काव्य का एक ऐसा अङ्ग है जो श्रवणेन्द्रिय एवं नेत्रेन्द्रिय दोनों से सम्बद्ध मन को आनन्दित करता है। अतः नाटक को सर्वाधिक श्रेष्ठ काव्यकला कहा गया है—'काव्येषु नाटकं श्रेष्ठम्' संस्कृत के काव्यशास्त्र में रूपक के दश भेद हैं नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अङ्क, वीथि और प्रहसन¹, इस प्रकार नाटक रूपक का ही एक भेद है।


१. नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोगसमवकारडिमाः ।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥ सा० द० ६।३ ।