सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 540 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 40

( ३४ )

लाने के लिए वन में गये हुए हैं जहाँ से वे शीघ्र ही ३-४ घण्टे में लौट आये होंगे। इतने अल्प समय में राजा दुष्यन्त और शकुन्तला का उस प्रकार का प्रणयपूर्व मिलन सम्भव नहीं प्रतीत होता। कालिदास के नाटक में महर्षि कण्व शकुन्तला के अनिष्ट शान्ति के लिए प्रवास पर सोमतीर्थ गये हुए हैं। इस अन्तराल में घटित होने वाली आश्रम की घटनाओं के लिए पर्याप्त समय दिया गया है, जो स्वाभाविक सा प्रतीत होता है जिससे कथा में सरसता आ जाती है। यज्ञ के रक्षार्थ तपस्वियों का राजा से ठहरने की प्रार्थना करना, दुष्यन्त शकुन्तला के प्रणय का उद्भव विकास तथा दुर्वासा मुनि के शाप की कल्पना, ये सारी बातें महर्षि कण्व के दीर्घकालीन प्रवास में संभव हो सकती हैं।

सुलभकोप महर्षि दुर्वासा के शाप की चर्चा महाभारत में नहीं है, किन्तु कविवर कालिदास ने शाप की योजना कर दुष्यन्त के साधारण चरित को उठाकर एक आदर्शमय सत्पुरुष के समान समुज्ज्वल बना दिया है। महाभारत के कपटी दुष्यन्त तथा उसके चरित को शाप की सहायता से कालिदास ने स्पृहणीय एवं अनुकरणीय बना दिया है।

महाभारत की कथा के अनुसार शकुन्तला महर्षि कण्व के आश्रम पर ही तीन वर्ष के बाद पुत्र को उत्पन्न करती है, उसके ६ वर्ष के बाद कण्व को स्मरण हुआ कि विवाहिता लड़की को अधिक दिनों तक पिता के घर नहीं रहना चाहिए तब उन्होंने पुत्रसहित शकुन्तला को दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भेज दिया। इस कथा को बेतुकी समझ कर कालिदास ने अपने नाटक में बदल दिया है और विश्वसनीय भारतीय परम्परा का अनुवर्तन किया है। नाटक के अनुसार सोमतीर्थ की यात्रा से लौटने के बाद ही अग्निशाला ने आकाशवाणी के द्वारा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के शरीर के सम्बन्ध की बात ज्ञात होते ही महर्षि कण्व ने तत्काल उसी दिन उसे गौतमी तथा शिष्यों के साथ उसके पति के पास भेज दिया। शकुन्तला गर्भिणी अवस्था में ही दुष्यन्त के पास उपस्थित हुई, उसके इनकार कर देने पर उसकी माँ मेनका ने उसे किंपुरुषवर्ष के हेमकूट पर्वत पर महर्षि कश्यप के आश्रम पहुँचा दिया जहाँ ठीक समय पर शकुन्तला ने सर्वदमन को जन्म दिया। इस परिवर्तन से भी कथा में स्वाभाविकता आ गई है महाभारत के अनुसार ९ वर्ष के बाद कण्व का यह कहना कि विवाहिता लड़की को अधिक दिनों तक पिता के घर में न रहना चाहिए—हास्यास्पद हो जाता है।

कालिदास ने अपने कथानक में शाप तथा उसकी निवृत्ति के निमित्त मुद्रिका की योजना की अभिनव उद्भावना की है। महाभारत का दुष्यन्त कामुक तथा स्वार्थी प्रतीत होता है किन्तु नाटक में शापवाली घटना की योजना से उसका चरित्र उज्ज्वल एवं उदात्त हो जाता है। शाप के कारण शकुन्तला का पति के द्वारा तिरस्कृत होना स्वाभाविक है। इस अवस्था में पाठक दुष्यन्त को दोषी नहीं ठहरा पाते, बल्कि, आश्रम की मर्यादा तोड़ने के लिए शकुन्तला को ही दण्डनीय बताते हैं। वस्तुतः नाटक में विप्रलम्भ शृंगार तथा अन्तिम मिलन का जो हृदयस्पर्शी दृश्य का चित्रण हो गया है वह इसी शापवाली घटना का प्रतिफल है। नाटक में शाप के कारण दुष्यन्त को शकुन्तला का भूल जाना तथा शाप की परिसमाप्ति पर स्मृति जागृत होने कि लिए कवि ने अंगूठी वाली घटना को योजित किया है। दुष्यन्त के दरबार में पहुँचने के पहले अंगूठी का गिरना और पुनः प्रत्याख्यान के बाद उसका मिल जाना बाद में उसे देखकर कण्वाश्रम की सारी घटना का स्मरण हो आना ये बातें बड़ी निपुणता एवं स्वाभाविकता के साथ संयोजित की गई है।