१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
हैं। इसलिए अब डटकर प्राणपण से लडो। देखो, युद्ध की देवी ने कैसी तलवार संभाली है और वीरता की पराकाष्टा दिखाने
के लिए शत्रु के हरावल को विचलित कर रही है! रानी बिजली की तरह घूम रही हैं। किसी को सोने के कड़े, किसी को
पोशाक बांट रही हैं। किसी की पीठ ठोकती है तो किसी को अपनी मुस्कान से उत्साहित कर रही हैं। गुलाम गोश खां और
कुंवर खुदाबख्श, तोपों से आग बरसाओ। शत्रु मुख्य द्वार तोड़ रहा है, किलाबंदी तोड़ रहा है, आठ जगह नसैनियां लगाई गई
हैं। 'हर-हर महादेव' की गूंज के साथ किले से, बुर्जों से, हर घर से गोलियों की बौछार हुई। बाढ़ों का तांता बंध गया। तोपें
लाल गोले उगल रही हैं। आवाजें आती हैं-फिरंगी को मारो'। यह देखो, क्या यह युद्ध देवता है या रणचंडी, काली माता स्वयं
भीषण युद्ध कर रही हैं। लेफ्टिनेंट डिक और लेफ्टिनेंट माइकल जोहान सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और अपने आदमियों को चढ़ने के
लिए ललकार रहे हैं। तोपों का धड़ाका हुआ। साहसी अंग्रेज काल के गाल में चले गए। और कोई है उनके पीछे आनेवाला?
लेफ्टिनेंट बोनस और लेफ्टिनेंट फॉक्स, तुम मरना चाहते हो? बड़ी कठिनाई से चढ़े हुए इन चार वीरों को गिरते देख नसैनियां
भी कांपने लगीं। अंग्रेजों ने पीछे हटने का बिगुल बजाया । सेना पीछे भागी। हर सिपाही चट्टान की ओट लेकर छिपते हुए
भागा।
इस तरह प्रमुख द्वार पर डटकर प्रतिकार हुआ। उधर दक्षिण बुर्ज पर कोई कराह रहा है। मालूम पड़ता है, विश्वासघाती नीच
ने मोरचा द्वार गंवाया होगा। यह सच है कि अंग्रेजों ने देशद्रोहियों के बल पर ही फतह पाई है और अंग्रेज बुर्ज पर चढ़कर
फुरती से आगे बढ़ रहे हैं। उस दिन सबके मन में एकमात्र भाव था-'मारेंगे या मरेंगे।' अंग्रेजों ने शहर में मार-काट मचा दी।
एक के पीछे एक मोरचे पर कब्जा करते गए। कत्ल, आगजनी और विध्वंस का बाजार गरम था। वे राजमहल तक पहुंचे।
राजप्रासाद पर अधिकार कर हजारों रूपए लूटे गए। पहरेदारों को मार डाला गया। ईंट-से-ईंट बजा दी गई। आखिरकार
झांसी अंग्रेजों के हाथों में चली गई।
परकोटे पर खड़ी रानी ने एक बार झांसी पर दृष्टि डाली। दक्षिण दरवाजे पर हुए भीषण कांड का दृश्य उनकी आंखों में तैर
गया। शत्रु के स्पर्श से उनकी झांसी अपवित्र हो गई। क्रोध से रानी पागल हो उठीं। आंखों से क्रोध की चिंगारियां छूट रही
थीं। उन्होंने अपनी तलवार संभाली, हजार-पंद्रह सौ सैनिक साथ लिये और किले को चल पड़ीं। अपने बच्चे को छेड़नेवाले
पर भी शेरनी इतनी फुरती से नहीं झपटती जितनी तेजी से वह दक्षिण द्वार पर तैनात अंग्रेजों पर झपटीं। तलवारों से तलवारें
भिड़ गईं। दोनों दल थोड़ी देर के लिए एक-दूसरे में समा गए। खनाखन की मार बजी, बहुत से गोरे मारे गए। शेष शहर
की ओर भागे और ओट में छिपकर शिकार खेलने लगे। फिरंगी के खून से उस महाकाली का क्रोध कुछ शांत हुआ। ध्यान में
आया कि किले से इतनी
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दूर अकेली का लड़त्रना महामूर्खता थी। अब इस असाधारण साहिसिक वीरता की प्रतिध्वनि शहर के हर रास्ते से मिलेन
लगी। हालांकि सारा शहर, राजप्रासाद अंग्रेजों की तलवारों ने खून से रंग दिया। उनमें से हर वीर ने अपनी शक्ति भर
अधिक-से-अधिक गोरों का सामना किया। उनके मर-मिटने पर ही घुड़साल शत्रु के हाथ लगी। अंग्रेजों ने अब तक शहर
को खंडहर बना डाला था। उनके सामने जो भी आता-भले पांच वर्ष का बालक हो या अस्सी साल का बूढ़ा-उनकी तलवार
का शिकार हो जाता । नगर भर आग से जल उठा। घायलों, मरनेवालों की चीखों से आकाश गूंज उठा।
किले का परकोटा बहुत पक्का होने के कारण अंग्रेजों ने उसे तोड़ने का विचार दूसरे दिन का रखा। रानी परकोटे पर खड़ी
करूणापूर्ण दृश्य को देख रही थीं। उन्हें अत्यंत दुःख हुआ। उनकी आंखे डबडबा आईं। रानी लक्ष्मीबाई रोईं। उनकी सुंदर
आंखें रोने से लाल हो गई। उसकी झांसी की यह दशा! एक बार फिर सिर ऊंचा करके देखा, झांसी की किलाबंदी पर
पराधीनता का दाग, फिरंगी का झंडा गाड़ा गया है। उन रोनेवाली आंखों में एक विलक्षण तेज चमक उठा। धन्य हैं वे आंखें,
वह हृदय और वह धैर्य! इतने में बेतहाशा दौड़ता हुआ एक दूत आया और कहने लगा, "रानी सरकार! किले के प्रमुख
द्वार-रक्षक सरदार कुंवर सिंह, दोनों तोपचियों खुदाबख्श और गुलाम गोश खां को अंगेजों ने गोली से उड़ा दिया है।" पहले
से ही दुःखी हृदय पर यह कितना भयंकर आघात! संकट-पर-संकट आ रहे हैं। रानी का अब एक ही निश्चय है-स्वाधीनता
की कौस्तुभ मणि झांसी की लक्ष्मी के गले से नहीं गिरनी चाहिए। उस दूत से, जो एक बूढ़ा सरदार था, रानी न कहा, "देखो,
मैं इस किले में अपने हाथों बारूद के भंडार में आग लगाकर बाहर निकल जाना चाहती हूं।" अपने जरीपट के साथ
स्वाधीनता के झंडे को लिये हुए या तो वह राजसिंहासन पर विराजमान होंगी या फिर चिता पर। यह सुनकर उस बूढ़े सरदार
ने शांति से कहा, "सरदार, यहां रहना अब खतरनाक है। शत्रु की छावनी को चीरकर आपको आज रात किला छोड़कर चले
जाना चाहिए और पेशवा की सेना में पहुंचना चाहिए। और यदि मार्ग में ही मृत्यु मिल जाए तो समरांगण-तीर्थ की पवित्र धारा
में गोता लगाकर स्वर्ग द्वार में प्रवेश हो सकता है।"
"मैं मैदान में लड़ते-लड़ते मरना अधिक पसंद करती हूं।" रानी का जवाब था, "किंतु मैं स्त्री हूं। मेरे शरीर की कहीं विडंबना
हुई तो?"
यह सुनकर सब सरदारों ने एक स्वर से कहा, "जब तक हममें से एक भी जीवित है तब तक आपके शरीर को छूनेवाले के
टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे।"
रात हुई। रानी ने अपनी प्रजा को बुलाकर अंतिम बार आर्शीवाद दिया। रानी
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का झांसी छोड़ने का इरादा देख प्रजा की आंखें गीली हो गईं, शायद फिर न लौटें। रानी ने चुनिंदा घुड़सवारों को अपने
साथ लिया। आभूषणों से सजाया हुआ एक हाथी उनके बीच रखा गया। 'हर-हर-महादेव' के घोष के साथ वे किले से
उतरने लगीं। पुरुष वेश बनाया था। फौलादी कवच ने शरीर की रक्षा की थी। कमरबंद में एक जमिया पड़ा था और एक पैनी
तलवार लटक रही थी। अंचल में एक प्याला बंधा था, रेशमी धोती से पीठ पर उनका दत्तक पुत्र दामोदर बंधा हुआ था।
सफेद घोड़े पर सवार रानी साक्षात् लक्ष्मी लगती थीं। उत्तरी दरवाजे के निकट पहुंचने पर देशद्रोही टिहरी नरेश के पहरेदार
ने टोका, "कौन है?'' "टिहरी की सेना सर ह्यू रोज की सहायता के लिए कूच कर रही है।'' उत्तर मिला और प्रहरी ने जाने
दिया। रानी आगे बढ़ीं। एक गोरे प्रहरी को भी इसी तरह टाला गया। रानी के अंगरक्षकों में एक दासी, एक बारगीर और
दस-पंद्रह घुड़सवार थे। इस तरह से यह सेना शत्रु की छावनी की बीच से कालपी तक सुरक्षित पहुंच गई। किंतु रानी के
अन्य घुड़सवारों को संदेह में अंग्रेजों ने रोका और वहीं ठन गई। मोरोपंत तांबे घायल होने पर भी दतिया तक निकल गए;
किंतु दतिया के देशद्रोही दीवान ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और अंग्रेजों को सौंप दिया। अंग्रेजों ने उन्हें फांसी के झूले पर
झुला दिया।
लक्ष्मी ने घोड़े को एड लगाई, क्योंकि लेफ्टिनेंट बॉकर चुने हुए घुड़सवारों के साथ रानी को पकड़ने के लिए पीछा करता हुआ
आ रहा है। हे रानी के अश्व! तुम्हारी पीठ पर जो पवित्र निधि है उसकी रक्षा के लिए पूरा बल लगाकर दौड़ो। देश के मानव
भले ही देशद्रोही बनें, पर देश के पशु तुम तो ईमानदार ही रहोगे। तुम्हारे पशुत्व के आगे देशद्रोहियों के मनुष्यत्व पर हजार
बार लानत है। और हे रजनी! तुम भी रानी और घुड़सवारों को छिपाने के लिए अपनी काली चादर फैला दो! और हे भारत
के मार्ग! तुम उस घोड़े को कोई बाधा मत देना। और आकाश में चमकते तारागणों! शत्रु को प्रकाश मत दो। हां, इतना
प्रकाश अवश्य दो कि कमल के समान कोमल रानी उत्साह के साथ अपने मार्ग पर अग्रसर हो सकें। अब उषा का आगमन
हुआ है और वीर रानी, तुम वायु के पंखों पर रात भर उड़ी चली आ रही हो। सो अब मंडेर गांव के पास कुछ विश्राम लो।
वहां का लंबरदार तुम्हारे प्यार दामोदर को खिलाएगा।
सुबह का नाश्ता करके रानी तुरंत कालपी की ओर चल पड़ीं। लेकिन पीछे से गुबार उड़ रहे हैं। रानी, घोड़े को तेज करो,
दामोदर को संभालो और आगे बढ़ो। अपनी तलवार संभालों। बॉकर नजदीक आ चुका है। 'तो नीच बॉकर, अपनी नीचता का
पुरस्कार ले! तलवार उठी और बॉकर लड़खड़ाता हुआ घोड़े से गिर पड़ा। पीछा करनेवाले अंग्रेज और रानी के दस-पंद्रह
घुड़सवारों में प्राणघातक मुठभेड़ हुई। उनमें से जो बचे वे लक्ष्मी की रक्षा के लिए आगे बढ़े। घायल बॉकर और उसके
साथियों ने पीछा करने
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से मुंह मोड़ लिया । भारत माता की तलवार विजयी होकर चमकती हुई आगे बढ़ीं। आकाश में सूर्य और धरती पर
लक्ष्मी-दोनों आगे बढ़ रहे थे। दोपहर हुई। रानी नहीं रुकीं। सांझ हुई। सूर्यदेव थककर क्षितिज के पीछे जा छिपे। रानी नहीं
थकी। वह बढ़ती गई। दौड़ते-दौड़ते रानी कालपी पहुंची। एक सौ दो मील का सफर और वह भी बॉकर जैसे योद्धा के साथ
जूझते हुए-पीठ पर एक बालक का बोझ लेकर रानी ने तय किया। वह घोड़ा कालपी तक रानी को सुरक्षित पहुंचाने के लिए
ही प्राण धारण किए हुए था। अमूल्य रत्न को अपनी पीठ पर से उतारने के बाद वह लड़खड़ाता और स्वर्ग सिधार गया। छह
आदमियों को उसकी अंतिम क्रिया में तुरंत लगाया गया। वह घोड़ा रानी को अत्यंत प्यारा था। जिस घोड़े ने इतनी ईमानदारी
से अपने प्राण देकर भी अपने जिस कर्तव्य का पालन किया, उसकी स्मृति सदा के लिए प्यारी रहेगी।
रानी ने सवेरे तक आराम किया। सुबह रानी और राव साहब पेशवा का हृदयवेधक साक्षात्कार हुआ। दोनों को अपने पूर्वजों
का स्मरण हुआ, जिन्होंने असंभव को संभव बनाने के लिए बड़े-बड़े काम किए। ऐसे महापुरुषों में जन्म लेने का सौभाग्य दोनों
को प्राप्त था उन्हें इस बात से प्रेरणा मिलती थी मराठों का झंडा अटक पर लहराने का कारण था-शिंदे, होलकर, गायकवाड़,
बुंदेले और पटवर्द्धन का स्वराज्य के लिए अपने प्राणों के उत्सर्ग के लिए कृतसंकल्प होना। जिसके लिए उनके पूर्वजों ने
अपना खून बहाया था, उसी झंडे, उसी स्वराज्य के लिए शुरू हुए युद्ध को अंत तक निभाने के लिए दोनों ने प्रण किया।
स्वदेश को भ्रष्ट करनेवालों से वह युद्ध लड़ा जा रहा था। पुनः लक्ष्मीबाई तथा तात्या टोपे ने घनघोर संग्राम की सिद्धता के
लिए युद्ध शुरू किया।
इन दोनों को युद्ध में तत्पर छोड़ अब हम ब्रिगेडियर विटलॉक की गतिविधि पर सरसरी निगाह डालेंगे, जिसे हम कुछ पहले
छोड़ चुके हैं। नर्मदा तथा गंगा-यमुना के प्रदेश को फिर से जीतने के लिए दो सेनाएं चली थीं। उनमें एक ने ह्यू रोज के
नेतृत्व में झांसी को जीत लिया। झांसी जीतने के बाद वहां अराजकता फैली। लूट के काम में तो नादिरशाह की बराबरी की
गई। मंदिर-मूर्तियां तोड़ी गई। भयंकर हत्याकांड हुआ। उसके बाद मुहिम जारी रखने के लिए यह सेना कालपी की ओर बढ़ने
वाली थी। इसका अंतिम भाग पूरा करने का भार ब्रिगेडियर विटलॉक को सौंपा गया। विटलॉक काली पलटन, गोरा और
काला रिसाला और उत्कृष्ट तोपखाना था। बड़ी शान के साथ उसने सागर में प्रवेश किया। अंग्रेजभक्त आरेछा नरेश उससे
मिला। यहां से यह सेना बांदा के नवाब को जीतने चली, जो उस प्रांत के मुख्य क्रांति-नेता थे। क्रांति की पहली लहर में
झांसी, सागर और अन्य स्थानों में क्रूर कत्ल थे। वहां के गोरे जहां शरण मिली वहां जान बचाने भाग गए। बांदा के नवाब ने
उन्हें अपने राजमहल में सुरक्षित रखा था और
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कोई OCR पाठ नहीं।
किरवी रियासत खालसा में मिलाई गई। विजित प्रदेश में ‘शांति’ स्थापना के लिए विटलॉक महोबा में छावनी डाल रहा था।
दरअसल उसने अपनी मुहिम पूरी की थी। बुंदेलखंड का पूर्वी भाग जीत लिया था। एक-दो छोटी जगहों में शांति कायम
करने के लिए कुछ दस्ते भेजे थे। अब विटलॉक को यहीं छोड़ झांसी की रानी के पवित्र चरणों का दर्शन करें।
अब रानी ने पेशवा की सेना के साथ कालपी से बयालीस मील दूर कंच गांव को कूच किया। लेकिन ऐसा अनुमान है कि
रानी की सूचना के अनुसार सेना की व्यूह-रचना राव साहब ने नहीं की थी। ध्यान रहे, राव साहब या तात्या टोपे के लिए
पूरी तरह प्रबंध करना असंभव-सा था। यद्यपि उनके साथ बांदा का नवाब, शाहगढ़ नरेश, बानापुर के राजा-ये सब एक ही
झंडे के नीचे इकट्ठे हुए थे; फिर भी एक विशाल सैनिक संगठन के अंतर्गत अनुशासित होकर नहीं आए थे। कोई ऐसा
संगठन नहीं था जो एक स्वर से संचालित हो, एक सुनिश्चित विधान के अनुसार चले। प्रत्येक अपनी अलग योजना बनाता,
इससे किसी की योजना पर पूरा अमल न हो पाता था। दूसरी ओर शत्रु दल के नेताओं में कोई झगड़ा न था; उनका संगठन
व्यवस्थित और अच्छी तरह अनुशासित था। सर ह्यू रोज के सेनानी नियुक्त होने से पहले अफवाहों और मतभेदों का बाजार
गरम रहा। लेकिन एक बार जब उसकी नियुक्ति हुई कि उसका मत ही सबका मत था। वह जो भी आज्ञा देता वह ठीक
मानी जाती, उसका पालन होता। किसी साधारण सेनानी की आज्ञा का भी, चाहे वह गलत ही हो, पालन एकता के साथ हो
तो सफलता निश्चित ही है। इसके विपरीत, यदि सैनिक अपनी सनक को महत्त्व दें, शासन में संगठन न हो, सुयोग्य सेनानी
की विचारपूर्ण आज्ञा भी पराजय का कारण बनती है। यदि यह तथ्य गलत है तो कंच गांव में जो पराजय हुई, वह कभी न
होती।
झांसी सेसर ह्यू रोज के आते ही क्रांतिकारियों से कंच गांव में मुठभेड़ हुई। दोपहर की कड़ी धूप गोरे सह नहीं सकते, यह
जानकर क्रांतिकारियों के एक आज्ञापत्र में लिख था-‘सवेरे दस बजे के पहले फिरंगियों से कोई मुठभेड़ न करे, सदा ही दस
के बाद लड़ाई हो।’इस सूझ-बूझकर आज्ञा का उस दिन पालन हुआ। जैसाकि अन्य स्थानों में हुआ था, दस बजने के बाद
जहां लड़ाई शुरु होती, अंग्रेजों की छावनी में कुहराम मच जाता, आज ऐसा ही हुआ। इसपर भी कंच गावं में क्रांतिकारियों की
हार हुई और उन्हें कालपी की ओर हटना पड़ा। जिस सराहनीय ढंग से पीछे हटे, जिस संगठित ढंग से
162
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162 — बागी माना जाए। इस नीचता का कारण यह था कि गोरे सैनिकों को उनकी कठिन लड़ाइयों तथा चिलचिलाती धूप में कष्ट उठाने का
पुरस्कार किरवी के खजाने में ही भरा पड़ा था। वहां के तहखाने आदि में अनमोल हीरे तथा जेवरात थे। इस संपत्ति के लालच में यह अन्याय किया
गया।‘‘
–के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 5, पृष्ठ 140–41
मोर्चे छोड़ते गए, शत्रु ने इसकी अत्यंत प्रशंसा की है।163 काश, यह असंगठन अनुशासनहीनता पराजय से पहले दूर कर दी
जाती! ˙ ˙ इसके बाद क्रांतिकारी कालपी पहुंचे और पराजय का दोष एक-दूसरे पर मढ़ने लगे; पैदल सेना ने रिसाले को
कोसा, सिाले ने झांसीवालों की निंदा की और सब मिलकर तात्या टोपे की गलती बताई।
किंतु इस आपसी बखेड़े को देखने तात्या कालपी पहुंचा ही न था। वह तो जालवण के पास चरखी गांव में अपने पिता से
मिलने गया था। ध्यान रहे, रास्ते में ग्वालियर पड़त्रता है, उसके बाद वह और कहां जा सकता है? हम आशा करते हैं कि
पिता-पुत्र की भेंट अत्यंत प्रेमपूर्वक तथा आनंद से हो; और फिर इस महान् क्रांतिकारी नेता को अपनी योजनाओं के
कार्यान्वयन में यश प्राप्त हो।
इस मनचाही यात्रा में तात्या के चले जाने के बाद रानी लक्ष्मीबाई पेशवा के शिविर में गईं। कंच गांव के पराभव से पेशवा को
बड़ा दुःख हुआ। अपने ओजपूर्ण शब्दों से उनकी उदासी को दूर करते हुए तथा धीरज बंधाते हुए वीरांगना रानी ने कहा,
“आप यदि सेना को फिर से संगठित करें तो शत्रु उसपर कभी विजय नहीं पा सकता।‘‘ रानी के शब्दों से बांदा के नवाब को
उत्साह प्राप्त हुआ। ओजपूर्ण शब्दों में रचे घोषणापत्र फिर से क्रांति-सेना में वितरित हुए । आज यमुना के किनारे भीड़ जमा
हो रही थी। तलवारें और तोपें चमकती हैं; मातृभूमि की साधना में रत सिपाही यमुना मैया से आशीर्वाद मांग रहे हैं। इस तरह
का मेला यमुना किनारे पहले कभी किसी ने नहीं देखा होगा। सब ओर मातृभूमि और धर्म की जय-जयकार हो रही है-‘जय
यमुना मैया! तुम्हारा पवित्र जल हाथ में लेकर हम प्रतिज्ञा करते हैं कि फिरंगी नष्ट होगा। देश स्वतंत्र होगा। स्वधर्म की
पुनःस्थापना होगी। मां यमुना! यह सब होगा, तभी हम जिंदा रहेंगे, नहीं तो रणभूमि में सदैव के लिए सो जाएंगे। कालिंदी
माता, हम तीन बार प्रतिज्ञा करते हैं।‘
तीन बार शपथ ग्रहण किए वीरों! मैदान में बढ़ो। रण-लक्ष्मी तुम्हें उत्तर की ओर बुला रही है। राव साहब सारी सेना का
नेतृत्व करेंगे। ह्यू रोज के नेतृत्व में चलने वाली
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163 सं. 49 ‘‘फिर बागियों ने वह काम किया जिसकी प्रशंसा उनके शत्रुओं को भी करनी पड़ी। पीछे हटने का कार्यक्रम उन्होंने इस तरह पूरा किया कि
उसका जोड़ पाना असंभव है। अंग्रेज अफसरों ने उन्हें जो पाठ अच्छी तरह पढ़ाए थे, उनको ठीक तरह ध्यान में रखा गया था। किसी प्रकार की
जल्दबाजी, अव्यवस्था तनिक भी न थी, पीछे भागने का नाम नहीं। रणक्षेत्र का संचालन आदि सबकुछ व्यवस्थित था। दो मील लंबी मुठभेड़ का हरावाल
हाने पर भी किसी पर भी किसी जगह घबराहट नहीं थी। सैनिक गोली चलाते, फिर पीछे की पाती की ओर दौड़ते और अपनी बंदूकें भरते। फिर
आगेवाले गोलियां चलाते और पीछे अपनी जगह पर हट जाते। पीछा करनेवाले यदि बहुत जोर करते तो वे डटकर खड़े हो जाते और घमासान लड़ाई
पर मजबूर करते।‘‘-मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 5, पृष्ठ 124 । (शत्रु द्वारा की गई इस प्रशंसा से ‘पांडे’ की सेना का श्रेष्ठतव निखर पड़ता
है।)
25वीं पैदल पलटन को भगा दो। ये सब अहिंदी हैं-इन देशद्रोहियों को भगा दो। यह मेजर आर्क बढ़ा क्या? उसकी भी वही
गत कर दो। कालपी के सामने के मैदान में हिलोरनेवाले हिस्से की सेना को सुरक्षित रखने पर हमारी स्थिति लगभग अजेय
है। देखो, सेना मुख पीछे हट रहा है। वह बहुत अधिक आगे बढ़ गया था और पीछे से पूरी सहायता न मिलने पर उसे पीछे
हटना पड़ा है। रान लक्ष्मी, तुम उनकी रक्षा के लिए दौड़ो। तलवार हाथ में लिये हुए अपनी सेना को बचाने बिजली की तरह
वह दौड़ पड़ी। अंग्रेजों के दाएं पार्श्व पर लाला गणवेशधारी सवारों के साथ टूट पड़ी। अंग्रेज एकदम ठंडे पड़े-हमला इतना
जोरदार था! लाचार हो पीछे हटने लगे। इक्कीस साल की लड़की की बिजली-सी झपट, उसके घोड़े का वायु वेग से
दौड़ना, दांह-बाएं गाजर मूली की तरह उसका अंग्रेजों को काटना-इन सबको देख कौन होगा जो लड़ने को तत्पर न होगा?
रानी ने अपने रण-कौशल से सभी क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ाया। भीषण युद्ध शुरू हुआ। हलकी तोपों पर धावा बोल
दिया। तोपची भागे। घोड़ों पर चलनेवाला तोपखाना तितर-बितर हो गया। क्रांतिवीर चारों ओर से आगे बढ़ने लगे। आज
तक हाथ में न आनेवाले फिरंगी को मटियामेट करने का मौका मिलने से वे आनंदित हो उठे। उन सबके आगे रानी लक्ष्मीबाई
चल रही थीं।
इस आकस्मिक धावे को देखकर ह्यू रोज चौंक पड़ा। वह अपने इमदादी ऊंटों को लेकर आगे बढ़ा; किसी तरह ऊंटों को
कारण अंग्रेजों ने अपनी प्राणरक्षा की । एक अंग्रेज का कथन है, "यदि पंद्रह मिनट और बीत जाते तो क्रांतिकारियों ने हमारा
सफाया कर दिया होता। इमदादी डेढ़ सौ ऊंटों ने ही उस दिन हमारा उद्धार किया। और उसी दिन से सचमुच मैं ऊंट को
प्यार की नज़र से देखने लगा।" केवल ऊंटों के काफिले ने 22 मई को पेशवा की सेना को कालपी तक पीछे हटने को
मजबूर किया। कुछ मुठभेड़ों के बाद 24 मई को ह्यू रोज कालपी में घुस पड़ा। तात्या टोपे तथा पेशवा राव साहब द्वारा
कालपी किले में एकत्र की गई-सामग्री अनायास ही अंग्रेजों के हाथ लगी। साठ हजार रतल बारूद भूमि में गड़ी पाई गई।
नई बंदूकें, पीतल की तोपों के गोलें, उन्हें बनाने के यंत्र, ढेरों सैनिक गणवेश, झंडे, मारू बाजे, फ्रांसीसी तुरहियां, यूरोप में
बनी गरनाल तोपें तथ कई प्रकार के शस्त्रास्त्र आदि युद्धोपयोगी सामग्री अंग्रेजों के हाथ लगी।
अगर हाथ न लगे तो शूरवीर चिरस्मरणीय क्रांति नेता, क्योंकि कालपी का संपूर्ण पतन होने के पहले एक सप्ताह तक राव
साहब, बांदा का नवाब, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य नेता वहां से गायब होकर किसी अज्ञात स्थान को चले गए थे। निस्सहाय,
निःशस्त्र इन नेताओं को मारे-मारे फिरकर, भूखों भटककर या तो शत्रु के चंगुल में पकड़ा जाने
1857 का स्वातंत्र्य समर – 372
या आत्महत्या करने के अतिरिक्त और कोई चारा न था।
इस तरह, यमुना के उत्तर कांठे का प्रदेश फिर से हड़पकर विजयी कैंपबेल हिमालय तक पहुंच गया। इधर ह्यू रोज और
विटलॉक ने नर्मदा से प्रारंभ कर यमुना के दक्षिणी कांठे के प्रदेश पर दखल किया। क्रांतिकारियों का पूरा सफाया करने पर
अंग्रेजों को हक था किवे अपना अभिनंदन करें। ह्यू रोज ने अपने सैनिकों का अभिनंदन इन शब्दों में किया है—“वीर सैनिकों!
तुमने एक हजार मील का प्रदेश रौंदकर शत्रु से सौ तोपें छीन ली हैं। नदियों को तैरकर, पहाड़–टीले लांघकर, जंगलों, दर्रों,
उपत्यकाओं में शत्रु का सफाया कर असीम प्रदेश अपने देश की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए हैं। वीर तो तुम हो ही, पर
अनुशासन के साहसी वीरता का मूल्य नहीं होता। अत्यंत कठिन परिस्थितियों में , कठोर यंत्रणाओं में भी तुमने अपने
अधिकारियों की आज्ञा का पालन ज्यों-का-त्यों किया है। आज्ञा भंग करने या उददंडता का तनिक भी परिचय नहीं दिया।
यमुना से नर्मदा तक तुमने अपने अद्वितीय सैनिक अनुशासन से महान् महान विजय प्राप्त की है।”
वीर स्तुतिपूर्ण और प्रभावशाली वक्तव्य देकर ह्यू रोज स्वास्थ्य के कारण सैनिक सेना से निवृत्त हुआ। उसकी विजयी सेना भी
शत्रु की पूरी हार होने से छुटकारे की सांस लेकर आराम की अपेक्षा करने लगी।
लेकिन अंग्रेज सैनिकों, अभी आराम की क्यों सोचते हो? अभी तो तात्या और लक्ष्मीबाई जीवित हैं। और यदि स्वेच्छा से रण के
लिए तैयार नहीं होंगे तो ग्वालियर की सेना युद्धभूमि में खदेड़ने के लिए कटिबद्ध है। कालपी से छिटककर सभी क्रांति नेता
आगामी योजना बनाने के लिए गोपालपूर में जमा हो गए। वास्तव में इस समय विजय के कोई आसार नहीं थे। नर्मदा से
यमुना तक और यमुना से हिमाचल तक सारा प्रदेश अंग्रेज फिर से जीत चुके थे। क्रांतिकारियों के पास सैन्यबल नहीं था,
किले आदि भी नहीं थे, बराबर हार होते रहने से नई सेना का संगठन करना भी असंभव-सा ही था। परंतु तात्या जीवित है,
यही पर्याप्त है। रानी लक्ष्मी भी वहां थीं, तात्या गोपालपुर लौट आया था। लोगों में यह खबर उड़ी कि वह अपने पिता से
मिल आया है। खबर झूठ हो या सच, पर इतिहास इसका कोई प्रमाण नहीं देता। अब ह्यू रोज ने अपना धूर्त दांव कालपी में
चलाया। तभी एकाएक तात्या को अपने पिता के दर्शन की सनक आ गई। और पितृ-दर्शन की यह धुन आगे चलकर युद्ध
की विस्मृति कराने लगी और अपनी इस इच्छा पर काबू न रखते हुए वह चरखी चला गया। इस सनक का रहस्य क्या हो
सकता है? यही कि कालपी का पतन होने पर क्रांतिकारियों के हाथ में कोई-न-कोई सुरक्षित स्थान या किले का होना
अत्यंत आवश्यक था। नई सेना मिल जाए, यह भी अच्छा था। इसी कारण क्रांति का अग्रदूत तात्या कालपी से छिटककर
ग्वालियर में घुस पड़ा। अब
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क्रांति का वात्याचक्र घूमने लगा है। सेनाधिकारियों के शपथपूर्वक आश्वासन तात्या ने प्राप्त किए तथा दरबार के उत्तरदायी
व्यक्ति, सरदार आदि लोगों से संबंध स्थापित कर क्रांति के लिए उसने एक स्वतंत्र सेना बना ली। अपनी शक्ति भर सबकुछ
करने का आश्वासन लोगों ने उसका दिया, एक महीने में ही ग्वालियर की संपूर्ण सेना तात्या की मुट्ठी में थी। फिर ग्वालियर
के मर्म स्थानों को जान लिया और शिंदे के सिंहासन के नीचे से सुरंग बनाकर तात्या टोपे राव साहब के पास गोपालपुर में
आया। अपने ‘पिता के दर्शन’ वह कर चुका था।
ग्वालियर की प्रजा को क्रांति कार्य की ओर कर लेने में सफल हो तात्या के आ पहुंचने के समाचार सुनकर रानी लक्ष्मी को
बड़ा आनंद हुआ और उसने पेशवा से सीधे ग्वालियर पर चढ़ाई करने का आग्रह किया। 28 मई को क्रांतिकारी अमीनमहल
पहुंचे। नंबरदार ने उन्हें रोकने की चेष्टा की। उत्तर मिला, “तुम कौन हो रोकनेवाले? हम पेशवा हैं और स्वराज्य, स्वधर्म के
लिए लड़ रहे हैं।'”
श्रीमंत राव साहब के इन शब्दों से कायर चुप हो गए और वहां के हजारों देशभक्तों ने क्रांतिवीरों का हृदय से स्वागत किया।
तब पेशवा सीधे ग्वालियर की राजधानी की दीवारों से टकराए। शिंदे को उन्होंने लिखा–“मात्र मित्रता की भावना से हम
आपके पास आ रहे हैं। पुराने आपसी संबंधों का स्मरण करो। हम आपकी सहायता चाहते हैं। और उसी से हम दक्षिण पर
चढ़ाई कर सकेंगे। किंतु कृतघ्न ग्वालियर नरेश ने पुराना नाता कब को तोड़ दिया था। यह तो उसे बताना होगा कि पुराना
नाता कब का और क्या है–‘शिंदे के पुरखे हमारे सेवक थे, मामूली सेवक; यही पुराना नाता। और इस समय शिंदे की सारी
सेना हमारा साथ देने का उद्यत है। तात्या टोपे ने सेनाधिकारियों से मिलकर सब भेद जान लिया है।'”
किंतु यह सब भूलकर शिंदे अपनी सेना और तोपों के साथ ग्वालियर के पास पेशवा की सेना पर चढ़ाई करने चला। श्रीमंत
पेशवा ने सैन्यदल को आते देख यह जाना कि शिंदे पछताकर स्वदेश के झंडे की वंदना करके अगवानी कर रहा है। किंतु
रानी लक्ष्मी ने स्पष्ट बता दिया कि ग्वालियर नरेश स्वदेश के झंडे को ठुकराने आ रहा है। रानी ने अपने तीन सौ सैनिकों के
साथ शिंदे के तापेखाने पर धावा बोल दिया। थोड़े ही समय में जयाजीराव शिंदे और उसके अंगरक्षक ‘भाले घाटी’ वीर दीख
पड़े। छेड़ी हुई नागिन से अधिक क्रोधातुर रानी लक्ष्मी उनपर टूट पड़ीं। देख, महादजी शिंदे के शूर वंशज जयाजी! रनवास में
पड़ी यह बाईस वर्ष की अबला तुम्हारी तलवार को ललकार रही है। अब संसार यह देखे कि देशभक्त महादजी के कितना
अंश इस फिरंगी भक्त जयाजी में उतरा है। रानी के पहले हमले से ही उसके मुसाहब बगलें झांकने लगे और ‘भाले घाटी’
भाग खड़े हुए। किंतु उसका विशाल तोपखाना अवश्य अपनी शक्ति दिखा
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देगा। ग्वालियर की सेना ने तात्या टोपे को देखा और अपनी शपथ का स्मरण कर पेशवा के विरूद्ध लड़ने से साफ इन्कार
कर दिया। मुख्य सेनाधिकारियों के साथ सारी सेना पेशवा के साथ हो गई। तोपखाना रखा रह गया। ग्वालियर के हर सैनिक
ने स्वराज्य के झंडे को प्रणाम किया। इस प्रकार क्रांति नेता के जादुई स्पर्श से ग्वालियर नरेश का सिंहासन लड़खड़ाकर गिर
पड़ा। और कायर जयाजी, उसका मंत्री दिनकर राव दोनों केवल रणभूमि ही नहीं, ग्वालियर छोड़कर आगरा भाग गए।
ग्वालियर की प्रजा के आनंद का ठिकाना र रहा। श्रीमंत राव साहब के सम्मान में सेना ने तोपें दागीं। शिंदे के कोषाध्यक्ष
अमरचंद भाटिया ने शिंदे के खजाने का सबकुछ पेशवा के चरणों में अर्पित कर दिया। क्रांति कार्य में सहानुभूति दिखानेवाले
इन देशभक्तों को बंदी बनाया गया था, उन्हें जनता के जयघोष में मुक्त किया गया। अंग्रेजों का साथ देनेवाले सलाहकार
पिट्ठू जयाजी के साथ भाग गए। लेकिन उनके घरों में इसलिए आग लगाई गई कि उनका नामोनिशान भी न रहे, उनकी
संपत्ति भी जब्त कर ली गई। 'राजा और प्रजा का नाता एशियाई लोग बिलकुल समझ नहीं पाते।' इस घृणित व्यंग्य का
ग्वालियर की प्रजा ने मुंहतोड़ जवाब देकर झूठ साबित कर दिया है, क्योंकि वह राजा क्या जो 'स्वदेश', 'स्वधर्म' का द्रोह
करे! पेशवा के सिंहासन से बाजीराव (द्वितीय) को ठीक समय पर नीचे न खींचने के कारण ही तो सन् 1857 में मातृभूमि का
द्रोह करने के कलंक का टीका पूना के माथे लगा। ग्वालियर इस कलंक से बचा रहा, इसलिए सन् 1857 की क्रांति आधुनिक
भारत में नवांकुरित प्रजा की शक्ति के प्रथम उदाहरण के रूप में इतिहास में अंकित होगी। शिंदे यदि स्वदेश का साथ नहीं
देता तो देश भी उसे सहारा नहीं देगा। तलवारें और तोपें, रिसाला तथा पैदल सेना, दरबार एवं सरदार, मंदिर और
मूर्ति-सबकुछ राष्ट्र के लिए है और अकेला शिंदे यदि राष्ट्र के लिए नहीं है तो उसे सिंहासन से घसीटकर फेंक दो।
राजमहल से निकाल बाहर करो। राजसीमा से भी दूर भगा दो। अब 'राजाप्रकृति रंजनात्' (रघुवंश, सर्ग 4, श्लोक 12) अर्थात्
राजा जनता के सुख के लिए है-इस रघुकुल रीति के अनुसार राजा वही बनेगा, जो प्रजा को सुखी करने के लिए ही राजपद
स्वीकार करेगा।
3 जून का शुभ दिन निकम्मे होकर बिताना अच्छा नहीं। स्वराज्य को पवित्र स्नान कराकर स्वदेश के सिंहासन पर बिठाना
आवश्यक है। अतः फूलबाग में एक बड़ा साथ दे रहे थे, अपनी श्रेणी के अनुसार सभी विराजमान थे। तात्या के नेतृत्व में
अरब, रूहेले, पठान, राजपूत, रंगड़, परदेशी-हर प्रकार के वीर अपने-अपने सैनिक गणवेश में तलवार से सज्जित होकर आए
थे। श्रीमंत पेशवा ने भी अपने शाही वस्त्र पहने थे; मस्तक पर सिरपेंच और कलगी-तुर्रा, कानों में मोती के कुंडल, गले में
मोतियों तथा
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हीरों के हार थे। पेशवा के समस्त सम्मान -चिह्नों के साथ भालदार, चोपदारों की ललकारों के बीच श्रीमंत दरबार में पधारे।
सबने उनकी वंदना की और आनंदाश्रुओं से डबडबाई आंखों के साथ पेशवा सिंहासन पर विराजमान हुए। फिर उन्होंने
ओजपूर्ण शब्दों में धन्यवाद देकर रामराव गोविंद को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। तात्या टोपे सेनापति बने और उन्हें रत्नजड़ित
तलवार दी गई। अष्ट प्रधानों का चुनाव हुआ। सैनिकों को बीस लाख रूपए बांटे गए ˙(पारसनी कृत-'रानी लक्ष्मीबाई का
जीवनचरित', पृष्ठ 309)
नाना साहब पेशवाके प्रतिनिधि राव साहब ने इस तरह एक नया सिंहासन जमाकर एक नई आशा, नया प्राण क्रांतिदल में
प्रेरित किया और विश्रंखलित क्रांतिकारियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए एक नया केंद्र स्थापित किया। युद्ध की धूम के बीच
ही इस प्रकार राज्योरोहण समारोह संपन्न करने और वंदनार्थ तोपों को दागने में तात्या का पागलपन नहीं था। संसार ने
क्रांति को मृतप्राय देखा था, जिसे इसी उपाय से तात्या ने निराशा के मर्त से उठाया था। संसार कुछ आनंद से, कुछ निराशा
से चिल्लाया था, क्रांति अब मर गई, उसमें कोई चेतना नहीं। किंतु यह कैसा जादू है! तात्या ने गोपालपुर में मरी मिट्टी में
से एक सिंहासन ऊपर उठा। जिसके चरणों में लाखों रुपयों की झनझनाहट थी। हजारों तलवारें बढ़ रही हैं, तोपें वंदना कर
रही हैं। एक नई सेना खड़ी हुई है। नई तोपें तैयार हैं, तात्या ने एक नया राज्य जीता है। पर तात्या ने अपने चमत्कार से
चकित करने के लिए इतनी चेष्टा थोड़े ही की है! उसे पहले से ही मालूम था कि मराठा पेशवा के आसीन होने की तोप
गर्जना से दूर बिखरे हुए क्रांतिकारी संगठित होंगे। वह जानता था कि ग्वालियर में राष्ट्रीय झंडे को लहराता देखकर उनमें
असीम उत्साह और साहस पैदा होगा। तात्या ने जो ताड़ लिया था, उसके अनुसार पांडे दल के शरीर में फिर से जान आ
गई। जहां एक ओर तात्या के देशवासियों में उत्साह की लहर दौड़ी, वहां दूसरी ओर अंग्रेज सैनिकों का दिल बैठ गया।
इसीलिए तात्या तथा अन्य क्रांति नेताओं ने राज्यारोहण की धूम मचाई थी। उनकी यह चाल सफल हुई, क्योंकि तात्या की
तोपों की गर्जना से ह्यू रोज के सुस्ताने की योजना मिट्टी में मिल गई। जिस चतुरता और नीतिज्ञता का परिचय ग्वालियर
पर कब्जा करने में तात्या और रानी लक्ष्मीबाई ने दिया, उसके बारे में मैलसन लिखता है—“असंभव संभव कैसे बन गया, यह
बताया गया है। ˙ ˙ ह्यू रोजो यह भी मालूम हुआ कि अब और देर करने का परिणाम क्या होगा! क्रांतिकारियों हाथ से यदि
ग्वालियर शीघ्र न छीना गया तो क्या भयंकर परिणाम होंगे। इसकी कल्पना करना भी कठिन था। समय मिले तो ग्वालियर
पर दखल करने से जो असीम राजनीतिक व सैन्य शक्ति तात्या ने प्राप्त की थी-मानव शक्ति, धन, युद्ध-सामग्री के साधन
उसे जो मिले थे, उसके बल पर कालपी में बिखरी सेना को एकत्रित कर फिर से नई सेना
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खड़ी करेगा और भारत भर में मराठों का उत्थान होगा। अपने स्वाभाविक जीवट के बलबूते पर वह दक्षिणी महाराष्ट्र में फिर
से पेशवा का झंडा लहराने में समर्थ होगा। उस प्रदेश से हमारी अर्थात् अंग्रेजी सेना निकाली गई थी, और यदि मध्य भारत में
तात्या को विशेष विजय मिल जाए तो वहां के लोग पुन:स साधना में लग जाएंगे, इसी साधना को पूरा करने में उसके पूर्वजों
ने अपनी शक्ति क्षीण की थी, अपना खून बहाया था''164
अब तक जो हुआ, सो ठीक हुआ। एक बार तो ह्यू रोज को बेदम-सा बना दिया। लक्ष्मीबाई की बात को महत्त्व न देनेवालों
को धिक्कार है! युद्ध ही एकमात्र कार्य हो और सब समारोह बंद कर दिए जाएं। किंतु खेद है किइस बात की ओर कोई
ध्यान न देकर क्रांतिकारी अपनी मस्ती में बेखबर थे। ऐशो-आराम, शराब, दावतें आदि में सारे लोग बेसुध थे। शायद स्वराज्य
की सीमा उन्होंने यहीं तक मानी थी। पर दरअसल वे स्वराज्य खो रहे थे, क्योंकि मौके का लाभ उठाकर कुशल सैनिकों के
साथ अंग्रेजों ने ग्वालियर पर हमला कर दिया। अपने साथ वे देशद्रोही शिंदे को लाए थे और यह घोषणा की थी कि अंग्रेज
केवल शिंदे के लिए लड़ेंगे। यह घोषणा ग्वालियर की भोली प्रजा को धोखा देने के लिए थी। किंतु अब लोंगों की आंखें खुल
गई थीं। क्रांतिकारियों को संगठित करने में कुशल तात्या अंग्रेजों का मुकाबला करने आगे बढ़ा। मुरार की छावनी के सैनिकों
को अंग्रेजों ने हराया था। पराजय की छाया पड़ने से क्रांतिकारियों में सनसनी फैल गई थी। राव साहब बांदा के नवाब की
कोठी की ओर जाते दिखाई दिए और बांदा के नवाब राव साहब के पास दौड़े। इस भाग दौड़ में मात्र रानी ठंडे दिमाग से
काम कर रही थी। सब तरह से संयत होकर आशा और निराशा को उसने अपने पैरों तले कुचल दिया था। उसकी तलवार
म्यान से बाहर थी। संसार की हर वस्तु से उसे वैराग्य था। उसकी तो एक मात्र इच्छा थी-जब तक उसकी सांस की हर
वस्तु से उसे वैराग्य था। उसकी तो एक मात्र इच्छा थी-जब तक उसकी सांस रहे, उसकी तलवार स्वाधीनता के झंडे को को
ऊंचा करने में ही चलती रहे। इसी हौसलें के सहारे उसने राव साहब को धीरज बंधाया और अपनी शक्ति के साथ व्यवस्थित
सेना का पुनर्गठन किया। इस तरह पूर्वी द्वार की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया। रानी की एक ही मांग थी, ''मैं अपने
प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने प्रण को निभाऊंगी, तुम अपने कर्तव्य का पालन करो।''
रानी ने अपना सैनिक गणवेश धारण किया, अच्छे घोड़े पर सवार हुईं, रत्नजटित खड्ग का म्यान से बाहर निकाला और
सैनिकों को 'आगे बढ़ो' की आज्ञा दे दी। कोटा की सराय के आसपास, जिसकी रक्षा का भार उनपर था, मोर्चाबंदी की। जब
अंग्रेज सेना का चारों तरफ से जोर देखा तो रण के वाद्यों के साथ सैनिक अंग्रेज सेना पर टूट पड़े। काश, उनके पास
उनके समान ही धैर्यवान सेना होती! सानी के नेतृत्व में उद्दंड और भीरू भी अनुशासित वीर बन जाता। उनके तथा अपने
सैनिकों के साथ रानी ने
1857 का स्वातंत्र्य समर - 377
164 मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 149-50 ।
अंग्रेजों पर हमला किया। लक्ष्मीबाई की दो सखियां-मुंदर और काशी भी रानी के कंधे-से-कंधा मिलाकर लड़ीं। पुरूष वेश से
विभूषित इन दो सुन्दर कन्याओं की स्मृति रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ भारतीय इतिहास के जीवन में अमरत्व प्राप्त करेगी।
स्मिथ जैसा जनरल रानी की सेना को दबा रहा था, किंतु रानी का साहस और शौर्य देखत ही बनता था। पूरे दिन
विद्युत-सी रणभूमि में चमक रही थीं। उनके हरावल पर अंग्रेज जोरदार हमले करते, किंतु हर बा रवह अपने पक्ष को
विचलित न होने देतीं। उनका दल जोश में आकर अंग्रेजों के हरावाल पर धावा बोल देता और अंग्रेज मौत की गोद में विश्राम
पाते। अंत में स्मिथ को पीछे हटना पड़ा। उसने चट्टान-सी खड़ी हरावल को तोड़ने की कोशिश छोड़ दी।
इस तरह वह दिन बीता। 18 तारीख का सूरज निकला। आज अंग्रेजों ने बड़े जोर-शोर से हमला करने का निश्चय किया।
सभी दिशाओं से उन्होंने किले पर धावा बोलने का निश्चय किया। जिस स्मिथ को कल पीछे हटना पड़ा था, वही आज नई
कुमुक से झांसी की सेना पर टूट पड़ा। ह्यू रोज ने समझ लिया कि उसका वहां होना आवश्यक है, इसी विचार के कारण
आज के हमलावर सैनिकों के साथ वह स्वयं था। रानी भी अपनी सेना के साथ तैनात थीं। उस दिन रानी ने कामदार चंदेरी
की पगड़ी पहनी, चोगा और पाजामा पहना और गले में मोतियों का एक हार पहनकर घोड़े पर सवार हुई। उनका घोड़ा उस
दिन कुछ थका हुआ सा मालूम देता था। अतः एक दूसरा नया घोड़ा लाया गया। रानी की दोनों सखियां नाश्ता कर ही रही
थीं, तभी संवाद मिला कि अंग्रेजी सेना बढ़ी चली आ रही है। रानी तुरंत अपने खेमे में दौड़ पड़ी।–तीर भी इतनी तेजी से
नहीं छूटता। रानी ने घोड़ा दौड़ाया और तलवार हाथ में लेकर शत्रु पर धावा बोल दिया। इसी विषय में एक अंग्रेज लिखता
है–"तत्काल वह सुंदरी मैदान में उतरी और ह्यू रोज के व्यूह का डटकर सामना किया। अपनी सेनाके आगे रहकर पूरी
मारकाट यद्यपि उसकी सफों को चीरकर अंग्रेज जाते, फिर भी रानी हरावल में दिखाई पड़ती थी और अपनी टूटी पांतियों को
फिर से संगठित कर अतुल धैर्य का परिचय देती थी। इसके बावजूद ह्यू रोज ने स्वयं अपने ऊंट दल के जारे पर आखिरी
पंक्ति तोड़ ही दी तो भी रानी अपने स्थान पर डटी रही।"
इतने असाधारण शौर्य से लड़ते हुए रानी ने देखा कि अंग्रेज सेना पिछाड़ी से आक्रमण कर रही है, क्योंकि पिछाड़ी से रक्षा
करनेवाले क्रांतिकारियों की पांतियों को उन्होंने तोड़ दिया था। तोपें ठंडी पड़ी थीं। मुख्य सेना तितर-बितर हो गई थी,
विजयी अंग्रेज सेना रानी पर चारों तरफ से हमला बोल रही थी और रानी के पास केवल पंद्रह-बीस सवार थे। रानी ने
अपनी दोनों सखियों के साथ घोड़े को एड़ लगाई। शत्रु की पांतियों को चीर वह परले सिरे पर लड़नेवाले लोगों से मिलना
चाहती थी। गोरे घुड़सवार
1857 का स्वातंत्र्य समर – 378
शिकारी कुत्तों की तरह उनका पीछा कर रहे थे। किंतु रानी ने तलवार के बल पर अपना मार्ग बनाया और आगे बढ़ीं और
सहसा एक चीख सुनाई दी- "बाई साहब, मैं मरी!" उफ, यह किसकी पुकार ! रानी ने घूमकर देखा। उसकी सखी मुंदर को
एक अंग्रेज ने गोली मारी थी। वह मर गई। बिजली की गति से दौड़कर रानी ने एक ही बार में उस फिरंगी के दो टुकड़े
कर दिए। मुंदा का प्रतिशोध ले लिया। अब घूमकर आगे बढ़ीं। मार्ग में एक नाला आया। बस घोड़े की एक छलांग में रानी
अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त थीं। किंतु नया घोड़ा वहीं अड़ गया। नाला पार करने से उस बेवफा घोड़े ने इन्कार कर दिया।
काश, आज रानी का वह पुराना घोड़ा होता! मानो किसी जादुई असर के प्रभाव से वह घोड़ा गोल चक्कर काटने लगा। क्षण
भर में ही गोरे सैनिक रानी के करीब आ गए और इस घिरी हुई अवस्था में भी एक तलवार ने अनेक तलवारों का सामना
किया। पर एक एक ही है, उन बहुत से अंग्रेजों में से एक ने पीछे से सिर पर वार किया और उस वार के साथ सिर का
दाहिना हिस्सा और दाईं आंख निकलकर बाहर लटकने लगी; उसी समय दूसरा वार छाती पर हुआ। महालक्ष्मी, अब तुम्हारे
रक्त की पावन बूंद, आखिरी बूंद टपकनेवाली है। स्वतंत्रता की देवी को उसने अंतिम बलि दी। अपने ऊपर वार करनेवाले
अंग्रेज के टुकड़े कर डाले और अब रानी अंतिम सांस लेने लगी। रानी का विश्वासपात्र सरदार रामचंद्रराव देशमुख पास ही
था। उसने रानी को उठाया और पास की एक झोंपड़ी में उन्हें ले गया। बाबा गंगादास ने रानी को ठंडा पानी पिलाया और
रक्त से लथपथ उस देवी के शरीर को बिछौने पर लिटा दिया। उनकी पावन आत्मा स्वर्ग सिधार गई। अंतिम सांस में निकले
अपनी स्वामिनी की अंतिम सूचना के शब्दों के अनुसार रामचंद्रराव देशमुख ने शत्रु की आंख बचाकर घास को ढेर लगा दिया
और उसी चिता पर लिटाकर, पराधीनता के अपवित्र स्पर्श के भय से अग्नि-संस्कार कर डाला।
सिंहासन पर नहीं, चिता पर लक्ष्मी के गले में स्वतंत्रता की कौस्तुभ मणि विराजमान है। रणभूमि में उत्सर्ग करके रानी ने मृत्यु
का दरवाजा तोड़ दिया है। अब भला कोई मानव उसका क्या पीछा करेगा!
इस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई लड़ीं। अपना लक्ष्य पूरा कर गईं। ऐसा एक जीवन संपूर्ण राष्ट्र का मुख उज्जवल करता है। वह
सब सद्गुणों का निचोड़ थीं। एक महिला, जिसने जीवन के तेईस वसंत ही देखे थे; कोमलांगी, मधुर, विशुद्ध चरित्र, पुरुषों में
भी न पाई जाने वाली संगठन-कुशलता से ओतप्रोत थीं। उनके हृदय में देशभक्ति रत्नदीप की तरह प्रकाशमान थी। अपने
देश पर उन्हें गर्व था। युद्ध कौशल में अद्वितीय थीं। विश्व में शायद ही कोई देश ऐसा होगा, जो ऐसी देवी का अपनी कन्या
और रानी कहने का अधिकारी होगा। इंग्लैंड के भाग्य में यह सम्मान अब तक नहीं बदा है। इटली की क्रांति में ऊंचे शौर्य
और आदर्श का परिचय मिलता है; फिर भी इतने वैभवकाल में
1857 का स्वातंत्र्य समर - 379
इटली एक ऐसी लक्ष्मी को पैदा नहीं कर सका।
भारत का यह अहोभाग्य है कि ऐसा स्त्री-रत्न यहां पैदा हुआ। उनका शरीर बाबा गंगादास की झोंपड़ी में प्रज्वलित ज्वाला में
दमक रहा है। पर यह रत्नदीप हमारी मातृभूमि भी कदाचित् पैदा न कर सकती, यदि यह स्वतंत्रता संग्राम का महायज्ञ न रचा
जाता। अनमोल मोती सागर की सतह पर ही नहीं मिल जाते, रात्रि के अंधकार में सूर्यकांत मणि तेज की किरणें नहीं फेंकती,
चमकम पत्थर कोमल वस्तु की रगड़ पर चिंगारी उत्पन्न नहीं करता। इन सबको विरोध की अपेक्षा होती है। अन्याय से पिसे
हुए मन को बेचैन बना दो-अंदर तक, रक्त की एक-एक बूंद में उबाल आना चाहिए। अन्याय का ईंधन प्रतिशोध की भट्ठी
को तपाता रहे, ऐसी भट्ठी में फिर सद्गुणों के कण चमकने लगते हैं।
सन् 1857 में हमारी भूमि पर सचमुच ही आग भड़क उठी थी और फिर विश्व के कानों में गूंज भरनेवाला धमाका ˙इस अग्नि
का कितना विस्तृत फैलाव हुआ है। ऊंची लपट-लपट में से लपट-मेरठ में चिंगारी और डलहौजी के 'रोलर' से समतल बना
धूल का ढेर-सारा देश ज्वालामुखी बारूद के अंबार-सा दिखाई पड़ा। जैसे आतिशबाजी की अनार खुलने पर उसमें से
रंग-बिरंगे बाण-पेड़ तथा अन्य चीजें छूटती हैं और शांत हो जाती हैं, उसी तरह इस क्रांति के अनार से तप्त लहू बहा,
शस्त्रास्त्र और मुठभेड़ें निकलीं। और यह अनार भी कितना बड़ा-मेरठ से विंध्याचल तक लंबा, पेशावर से डमडम तक चौड़ा।
और उसे सुलगाया गया। आग की लपटें सभी दिशाओं में व्याप्त हो गईं और उस अनार के पेट में क्या-क्या अजीब चीजें
थीं। लहू मेघ की तरह बरसा-ओलों के साथ। दिल्ली के घेरे, प्लासी के प्रतिशोध, कानपुर, लखनऊ तथा सिंकदराबाद के
कत्ल। सहस्त्रों वीर जूझ रहे हैं, खप रहे हैं, नगर जल रहे हैं; कुंवर सिंह आता है, जूझता है, गिरता है; मौलवी आया, लड़ा
और मरा, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली, बरेली, जगदीशपुर, झांसी, बांदा, फर्रूखाबाद के सिंहासन; पांच हजार, दस हजार, सहस्त्रों,
लाखों तलवारें, ध्वजाएं, सेनापति, घोड़े, हाथी, ऊंट-सब इस अनार से बाहर-एक-के-बाद एक आग के फव्वारे-से निकलते
हैं। एक कुछ ऊंचाई की लपट पर, कुछ दूसरी पर-ये ऊंचे चढ़ जाते हैं, लड़खड़ाते हैं और लुप्त हो जाते हैं। सब ओर
लड़ाई-बिजली की कड़क, ज्वालामुखी की भीषण ज्वालाओं का यह फव्वारा।
और यह चिता-बाबा गंगादास की झोंपड़ी के पास जल रही है। सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर के ज्वालामुखी की यह अंतिम
ज्वाला है।
1857 का स्वातंत्र्य समर - 380
भाग—4
अस्थायी शांति
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प्रकरण-9
विहंगावलोकन
सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर की प्रमुख भूमिका उत्तरी हिंदुस्थान में ही निभाई गई थी, अतः इस प्रदेश में हुई अद्भुत
उथल-पुथल का विस्तृत विवरण इस ग्रंथ में प्रस्तुत करना आवश्यक ही था। परंतु इस स्वातंत्र्य युद्ध को पूर्णतः समझने के
लिए अन्य प्रदेशों में इन दिनों में हुई घटनाओं का उल्लेख करना भी अनिवार्य है। एतदर्थ इस रण-विस्फोट की प्रचंड
ज्वालाओं को उत्तरी हिंदुस्थान के आकाश में किल्लोलें करते हुए छोड़कर अब हम अन्य प्रदेशों में इस विस्फोट से भड़की
चिनगारियों पर भी दृष्टिपात करेंगे।
दिल्ली के घेरे के दिनों में पंजाब प्रांत में चले घटनाचक्र का कुछ विवरण हमने उसी स्थान पर प्रस्तुत किया है। तदुपरांत वहां
एक-दो सामान्य विद्रोही घटनाओं के अतिरिक्त प्रायः शांति ही रही। सिखों के अतिरिक्त यहां की अन्य जनता ने किसी भी
ओर से इस युद्ध में भाग तो नहीं लिया, किंतु वे हृदय से इस बात के आकांक्षी थे कि क्रांति का यह यज्ञ सफलता प्राप्त करे
। हां, सिख लोग और सिख संस्थान निश्चित रूप से ही अंग्रेजों के पक्ष में संघर्ष करते रहे।
राजपूताना के जनसाधारण की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ ही थी। इस तथ्य की साक्षी भी अनेक प्रसंगों से प्रस्तुत हुई।
जयपुर, जोधपुर और उदयपुर आदि के जो भारतीय सैनिक अंग्रेजों की ओर से संघर्ष करते थे, उन्हें अपशब्दों से संबोधित
किया जाता था; किंतु ज्यों ही क्रांतिकारियों के कहीं विजयी होने का समाचार प्राप्त होता था,
1857 का स्वातंत्र्य समर - 383
राजस्थान के बाजारों और गलियों में हर्ष का वातावरण व्याप्त हो जाता था। स्थान-स्थान पर इन क्रांतिकारियों के
जय-जयकार से धरा-गगन निनादित हो उठते थे। किंतु जब कभी क्रांतिकारियों की पराजय की सूचना मिलती थीं तो संपूर्ण
राजस्थान में विषाद और संताप की गहरी छाया व्याप्त हो जाती थी। ये घटनाएं इसी सत्य की परिचायक हैं कि राजस्थान
का जनसाधारण हृदय से क्रांति की सफलता का इच्छुक था। राजस्थान के राजपूत नरेशों की स्थिति यह थी कि क्रांति की
सफलता का इच्छुक था। राजस्थान के राजपूत नरेशों की स्थिति यह थी कि वे किसी विशेष स्थिति के उत्पन्न होने से पूर्व
किसी भी एक पक्ष को प्रकट रूप से सहायता देने के लिए तत्पर नहीं होते थे। किंतु जब कभी भी अंग्रेजों द्वारा दबाव डाला
जाता था तो इन राजपूत राजाओं के सैनिक ही अपने शासकों की आज्ञाओं का खुला उल्लंघन कर अपने देशबांधवों के
विरूद्ध अंग्रेजों का पक्ष लेकर युद्ध करने से स्पष्टतः इन्कार कर देते थे।
विंध्याचल के उत्तर का यह विहंगावलोकन करने के उपरांत जब हमद क्षिण की ओर दृष्टिपात करते हैं तो हमारी आंखों के
समक्ष सर्वप्रथम शिवाजी के मराठों का साम्राज्य उभर आता है। इन्हीं के देशबांधवों ने उत्तर में जाकर कानपुर, कालपी और
झांसी इत्यादि में प्रचंड रण-गर्जना की थी। इसके कारण रायगढ़ में पराभूत हुआ राज्य सिंहासन ब्रह्मवर्त में रक्त से स्नान
करता हुआ दिखाई दे रहा था। वहां स्वराज्य के पुनीत आसन का प्रादुर्भाव हो रहा था। संताजी और धानाजी ने जिस परम
पवित्र भगवा ध्वज को ऊंचा किया था वह अब उत्तर भारत में तात्य ओपे द्वारा पुनः फहराया जा रहा था। उत्तरी हिंदुस्थान ने
इस स्वातंत्र्य युद्ध में जैसी एकता, साहस और दृढ़ संकल्प व्यक्त किया, वैसी ही एकता यदि दक्षिण में भी उत्पन्न हो जाती
तो यह सुनिश्चित था कि यदि संपूर्ण ब्रिटेन भी भारत में आकर युद्ध करने लग जाता तब भी महाराष्ट्र की पावन पताका कभी
भी न झुक पाती। महाराष्ट्र का भगवा ध्वज जब रणांगण में फहराता है तो उसके प्रति प्रेम और गर्व से जिसका हृदय न भर
जाता हो, ऐसा मराठा वंश का एक भी व्यक्ति कहीं खोजने से मिलना कठिन है। सन् 1857 की वीरता की यह पावन प्रेरणा
सभी मराठों के हृदय में स्वाभाविक रूप से ही जाग्रत हो उठी थी। किंतु दृढ़ संकल्प के अभाव और अनिश्चित नीति-इन दो
रोगों ने इस वीर भावना और पावन प्रेरणा की भ्रूण-हत्या ही कर दी। जिन दिनों उत्तरी हिंदुस्थान में क्रांति की योजना प्रगति
पथ पर थी, उन्हीं दिनों दक्षिण भारत में भी क्रांति का प्रचार करने के लिए दूत भेजे गए थे। वे प्रत्येक नगर और संस्थान में
जा रहे थे। सतारा के रंगोजी बापू से भी कानपुर के नाना साहब का पत्र-व्यवहार हो रहा था। पूना, सतारा, बेलगांव,
धारवाड़, बंबई, हैदराबाद इत्यादि स्थानों की विभिन्न पलटनों में ब्राह्मण, मौलवी और उत्तर भारत की क्रांतिकारी सेनाओं के
प्रतिनिधि क्रांति की ज्वाला गुप्त रूप से संलग्न थे। मैसूर से लेकर विंध्य पर्वत मेखला तक सर्वत्र यह प्रतिज्ञा दोहराई जा
चुकी थी कि जब 'उत्तर उठेगा तो दक्षिण भी उभरकार खड़ा हो जाएगा।' दक्षिणी भारत ने भी विद्रोह करना तो स्मरण रखा,
किंतु यह भी सत्य है कि वह उत्तरी हिंदुस्थान के साथ उठना स्मरण न रख
1857 का स्वातंत्र्य समर - 384