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सर्वकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 418 में से

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पृष्ठ 384

दिया। जबलपुर में गोंड जाति के राजा शंकर सिंह और उनके पुत्र द्वारा सर्वत्र क्रांति की ज्वाला धधकाई जा रही थी। जब
उन्हें अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिया गया तो उनके पास से एक रेशमी बस्ता भी मिला, जिसमें वह प्रातः स्मरण की श्लोक
पंक्ति भी एक कागज पर लिखी मिली, जिसका राजा शंकर सिंह प्रतिदिन पाठ करते थे। उसके अंग्रेजी भाषांतर का हिंदी
रूपांतर संक्षेप में इस प्रकार है-
साधुओं से छल और दुष्कृत्य कर रहे नित्य,
दुष्ट दलन हेतु धाओ त्वरित, आओ देवि चंडिके।
शत्रुओं का दलन करो, धम्न संस्थापन करो,
भक्त की पुकार सुनो, ध्याओ शीघ्र मातृके।
आंग्ल दुष्ट संहार करो, धरती का त्रास हरो,
शत्रु रक्त पी अघाओ, आओ शत्रु संहारके!
राजा शंकर सिंह ने 52वीं रेजिमेंट को भी अपने साथ विद्रोह में सम्मिलित करने का प्रयास किया था। इस आरोप में उनको
पुत्र सहित 18 सितंबर, 1857 को तोप से उड़ा दिया गया। किंतु इस समाचार ने निराश होने के स्थान पर 52वीं पलटने ने
विद्रोह का शंखनाद ही कर दिया। उन्होंने रणभूमि में कूदकर एक अंग्रेज अधिकारी येक ग्रेगर को यमलोक ही पठा दिया।
इसी भांति धार राज्य में भी विद्रोह की ज्वालाएं दहकी थीं तो दिल्ली के राजपुत्र वीर फीरोजशाह के द्वारा किए गए प्रयासों के
फलस्वरूप महिदपुर और गौरेया में भी क्रांति का विस्फोट हुआ था, जिसका विवरण हम यहां विस्तार के भय से प्रस्तुत नहीं
कर रहे हैं।
किंतु इन सभी स्थानों की अपेक्षा ब्रिटिश सत्ता का मर्मस्थान तो हैदराबाद के निजाम के हाथों में ही था। इस राज्य के
सिंहासन पर मई 1857 के मध्य में अफजल उलउद्दौला सिंहासनासीन हुआ था। सर सालारजंग नामक व्यक्ति उसके दीवान
पद का भार वहन कर रहा था। इस सालारगंज में अपने इशारे मात्र पर ही संपूर्ण दक्षिण को उठाने की क्षमता थी। यदि
हैदराबाद का निजाम विद्रोह में शामिल हो जाता तो यह सुनिश्चित था कि संपूर्ण दक्षिण प्रदेश ही एक व्यक्ति के समान उठ
खड़ा होता । फिर उत्तर में हुए विद्रोह के कारण पड़नेवाले दबाव से कसमसाकर टूटने की स्थिति में आई हुई ब्रिटिश
साम्राज्य की आयु की डोरी दक्षिण का भी दबाव पड़ने से निश्चित रूप से कड़कड़ाकर टूक-टूक हो जाती। यह भी कैसे कहा
जाए कि अंग्रेजों के विरूद्ध प्रारंभ किए गए इस स्वातंत्र्य संग्राम के सिद्धांतों से किसी ने सालारजंग को अवगत नहीं कराया
होगा। यही मानना होगा कि सर सालारजंग के अंतःकरण में इतनी प्रचंड 'राजभक्ति' विद्यमान थी कि उसने स्वधर्म, स्वराज्य
और स्वतंत्रता के प्रति प्रेम की एक भी तरंग से
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