१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिया। उन्होंने कई अंग्रेज अधिकारियों की तो हत्या कर ही दी, साथ ही खजाने पर भी अधिकार कर लिया। इन विद्रोही
सैनिकों ने आई हुई गोरी सेना से भी दो-दो हाथ किए और कोल्हापुर से चलकर घाटियों की ओर निकल गए। विभिन्न
क्रांतिकारी सावंतवाड़ी के प्रमुख नेता रामजी शिरसाई के नेतृत्व में एकत्र हुए और वाड़ी के वनों से गोरी सेना पर छापे मारने
लगे। गोवा के पुर्तगालियों के सहयोग से अंग्रेजों ने कोल्हापुर में हुए इस विद्रोह को दबा दिया और वहां आए हुए नए अंग्रेज
अधिकारी जैकब ने बचे हुए क्रांतिकारियों को आत्मसमर्पण करने पर विवश कर उनके नेताओं को गोलियों से उड़ा दिया।
किंतु जिस दिन इन सिपाहियों ने विद्रोह किया उस दिन भी कोल्हापुर के नागरिक तो मौन दर्शक ही बने रहे। इसी मध्य वहां
के तरुण राजा के साथ नाना साहब के दूत से भी मंत्रणा हुई थी। उस दूत ने नरेश को भी क्रांति के संघर्ष में भाग लेने के
लिए प्रेरित किया। लखनऊ के नवोत्थित सिंहासन की ओर से उसे एक तलवार भी भेंट की गई। इसी भांति जपखंडी,
सांगली आदि के अन्य दक्षिणी संस्थानों से भी गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा था। किंतु कोल्हापुर के नरेश की अपेक्षा तो
शिवाजी का अधिक उष्ण रक्त उसके छोटे भाई चिमा साहब की ही नसों में प्रवाहित हो रहा था। अब तक क्रांति का जो
बना-बनाया कार्य बिगड़ गया था, अब क्रांति के उसी कार्य को पुन: व्यवस्थित रूप देने के लिए पुन: मंत्रणाओं का क्रम आरंभ
हो गया था। इस कार्य को चिमा साहब ही निभा रहे थे। उन्होंने कोल्हापुर के अस्थाई सैनिकों को विद्रोह के लिए संगठित
किया। 15 दिसंबर को प्रातःकाल ही कोल्हापुर में पुन: क्रांति की ज्वाला धधक उठी। नगर के द्वार बंद कर वहां तोपें तैनात
कर दी गई। नगर के प्रत्येक मार्ग में क्रांति की पुनीत पताका फहरा उठी। जैकब को ज्यों ही समाचार मिला, उसने अपनी
सेना का एकत्रित कर एक कच्चे द्वार पर आक्रमण कर दिया। उस समय से अंग्रेजी सेना द्वारा राजमहल पर अधिकार करने
की घड़ी तक प्रचंड मुठभेड़ और संघर्ष जारी रहा। पराजय मिलने पर, जैसाकि सामान्यतः होता है, उसने घोषणा की कि
विद्रोह सैनिकों तथा राजाज्ञा का उल्लंघन कर जनता ने आरंभ किया था। जब विद्रोहियों के नाम पूछे गए तो उसने कहा
कि मुझे इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। जैकब विद्रोही नेताओं को बंदी बनाने में प्राणपण लगा रहा। उसने अनेक
व्यक्तियों को संदेह में ही कारागार में बंद कर दिया; किंतु उसके जी तोड़ प्रयास करने पर भी उसे इस विशाल क्रांति का
सूत्र हाथ नहीं लग सका। जब एक करके ही उन्हें निगल गया। बंद बनानेवाले ताकते ही रह गए। अनेक लोगों को तोपों के
सामने खड़ा करके उड़ा दिया गया। उनमें से एक पहली बार के आघात से न मारा जा सका, किंतु वह दूसरी बार तोप से
गोला दगने तक भी निश्चित भाव से निडर खड़ा रहा। उस समय जैकब उसके पास आया और जैकब उसके पास आया और
बोला, “तुम यदि विद्रोहियों के नाम बता दोगे तो तुम्हें प्राणदान दे दिया जाएगा।“ किंतु वह महान् वीर धैर्य सहित अपने
अंग-
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