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सर्वकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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के आदेश से वहां के सारे सरकारी भवन गिरा दिए गए थे। अपने जाने के बाद वहां अंग्रेजी सेना आएगी और सेना की एक
छोटी टुकड़ी वहां रखकर सर कोलिन बरेली जाएगा, यह समझकर उस कुशाग्र मौलवी ने शाहजहांपुर छोड़ा था। अंग्रेजी सेना
बरेली में कितनी देर रहेगी, यह पक्का जानकर मौलवी ने ऐसा जाल रचा कि सर कोलिन के जाते ही-शाहजहांपुर में उतरना
वहां के मुट्ठी भर अंग्रेजों को मटियामेट कर बरेली का बदला ले लेना है। मौलवी ने दूरदृष्टि से जो सोचा वैसे ही
शाहजहांपुर में छोटी सी सेना रह गई और सारे भवन तोड़ दिए जाने के कारण उन्हें मैदान में ही उतरना पड़ा।
इस तरह सारी योजना बनती चली गई। 2 मई को वह थोड़ी सी अंग्रेजी सेना भी शाहजहांपुर छोड़कर जानेवाली है-यह ज्ञात
होते ही दिन-रात मंजिलें तय करते हुए मौलवी अहमद शाह दौड़ने लगा और उसका असावधान शिकार एकदम उसके पंजे
के पास आ गया। परंतु उस मध्यरात्रि में ही हमला न करते हुए मौलवी की सेना किसी की मूर्खता के कारण, किंचित् समय
पूर्व चार मील दूर खड़ी हो गई। इतने भर से सारी योजना बिगड़ गई! क्योंकि “Native spies employed by the
British were on the alertand one of these flew with the intelligence of his dangerous vicinity to
colonel Hale of Shahjahanpur. ’’ उस नेटिव पिशाच के वह समाचार अंग्रेजों को बताते ही उनक ीवह छोटी सेना
जेल के मजबूत भवन में घुस गई। मौलवी योजनानुसार वहां पहुंचा। उसने सारा शहर कब्जे में लिया, किला लिया और युद्ध
की यथान्याय पद्धति के अनुसार शहर के श्रीमंत लोगों पर रसद कर लगाया। मैलसन लिखता है-“मौलवी ने वही बरताव
किया जो यूरोप की युद्ध-नीति में किया जाता है।’ और तुरंत आठ तोपें मंगाकर उसने जेल में छिपी अंग्रेजी सेना पर
गोलीबारी शुरू कर दी।
यह खबर 7 मई को बरेली पहुंचते ही सर कोलिन की खुशी सातवें आसमानपर पहुंची। पहले मौलवी जब उसके हाथ से
निकल भागा था तभी से वह मन-ही-मन बहुत खार खाए था। वह भूल सुधारने का अवसर अब मौलवी ने ही दे दिया।
अपने आप शत्रु के जाल में घुसे इस शिकार पर झपट्टा मारने सर कोलिन निकला। इस समय उसने पूरा परीक्षण कर लिया
कि जाल में कहीं भी सेंध न रह जाए। 11 मई से उस अकेले मौलवी ओर इस प्रचंड अंग्रेजी सेना की भयंकर लड़ाई आरंभ
हो गई। यह समाचार सुनते ही उस लोकप्रिय मौलवी की सहायता के लिए विद्रोहियों के झुंड-के-झुंड दसों दिशाओं से आने
लगे। अवध की बेगम, मरूयन साहब मोहम्मदी का राजा, दिल्ली का मिर्जा फीरोजशाह, कानपुर के नाना साहब आदि सारे
स्वतंत्रता सेनानियों की सेनाएं 14 मई के पहले ही मौलवी के झंडे तले आ गई। जिस शिकार को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने
कोई छेद न छोड़ते हुए जो विशाल बुना था, उस शिकार ने ही
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