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सर्वकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 418 में से

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पृष्ठ 215

केवल आदेश नहीं, आप हमारे नेता बनें। रणांगण में स्वदेश और स्वधर्म के मंत्र की गर्जना करें और महादजी का अपूर्ण हेतु
पूर्ण करने रण-मैदान की ओर ससैन्य चलें। सारा देश एक जयाजी के शब्द पर अवलंबित है। आप युद्ध करें तो आगरा
धराशायी हो जाए, दिल्ली खुल जाए, दक्षिण घन-गर्जना करता उठे, शत्रु देश पार हो! देश स्वतंत्र हो जाए और आप उसके
स्वतंत्रतादाता। द्विदश करोड़ लोगों का जीना एक जीभ के हिलने पर अवलंबित है। ऐसा अवसर विश्व में कभी आया नहीं
था।
पर सिंधिया की जीभ पहले तो बिल्कुल हिली ही नहीं और जब हिली तब 'युद्ध' कहने की जगह उसने 'मित्रता' कहा।
सिंधिया की मित्रता देश के लिए नहीं, अंग्रेजों को बचाने के लिए है-यह देखते हुए कि सिंधिया युद्ध नहीं चाहते तो भी हम
युद्ध करेंगे, देश माता को मुक्त करने तू नहीं चल रहा तो तेरे बिना, तेरे विरूद्ध हम दौड़ेंगे और उसे मुक्त करेंगे। आज 14
जून, रविवार है। आज तक हमने सिंधिया की राह देखी। आज रविवार को केवल सूर्यनारायण की राह देखेंगे। सूर्यास्त होते
ही हर-हर महादेव! उस गाड़ी में बैठा कौन जा रहा है? कूपलैंड, मेम साहब! खबरदार किसी ने उसे सलाम किया तो ! गोरे
को सलाम? आज जून की 14 तारीख को? इस गोरे को ही क्या आगे स्वयं ब्रिगेडियर साहब आ रहा है, परंतु कोई भी सिर
या हाथ न हिलाए। ब्रिगेडियर? किसने बनाया इसे ब्रिगेडियर ? प्रासाद शिखरस्थोऽपि काको न गरुडायते अतः अपनी टोली
उस ब्रिगेडियर की छाती पर से छाती तानकर चलाओ!104 और ग्वालियर कांटिजेंट के सिपाही ब्रिगेडियर को सलाम न करते
आगे निकल गए। हृदय गुहा में जाग्रत् हुए आर्यत्व का सिंह अब आभिजात्य के ऐसे खेल खेलने लगा। फिर भी, शाम तक
कोई गड़बड़ी न करे। शाम हुई और एक बंगले को आग लगी। लो, अब आ गया गड़बड़ी करने का सही समय! अरे
तोपखाने, तू विद्रोह कर, पैदलों चलो-एक हाथ में जलती मशाल की लपटें और दूसरे हाथ में चमचमाती तलवार लेकर दौड़ो
भूत जैसे चिल्लाते, दसों दिशाओं को। जो-जो रास्ते में दिखाई दे-उसका रंग देखो, काला हो तो प्रेम से मिलो, गोरा हो तो
चलाओ तलवार गले पर! मारो फिरंगी को। क्या घर में छिप गया? लगाओ घर में आग। घर जलते ही आएगा बाहर चटपट।
देखो कौन है? गोरा! काटो उसका सिर! ये कौन-गोरी! "मत मारो, मत मारो!" जा, दिया प्राणदान। हम मेमसाब को नहीं
मारेंगे। उस भयानक भूत का नाच चल रहा है जोर-जोर से। ग्वालियर के सिंधिया के राजमहल में भी कोई गोरा बचा न
रहे। सारे गोरों को सिंधिया के राज्य के बाहर आगरा भगा दिया। गोरी महिलाओं को इकट्ठी कर कैद कर लिया। पर उनसे
कुछ भी बात न की जाए, यह ठीक नहीं है। धूप से तिलमिलाती यह औरत सामने है। उससे बात करना चालू करें। आओ।
एक नौकर इसीलिए उससे पूछता है-"क्यों मेम साहब, तुम्हें यहां की धूप कितनी अच्छी लगती है? अब तो खूब जलन हो
रही है न? तुम अपने ठंडे देश में रही होती तो इस देश की धूप में क्यों जलना पड़ता?" इस महिला को आंखें
1857 का स्वातंत्र्य समर – 219
104 श्रीमती कूपलैंड द्वारा लिखित-'नैरेटिव्स' ।