१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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हैं। उन्हीं को आत्मा कहा जाता है। उनको छोड़कर सब कुछ अमर्त्य
और अनात्म है। वे परब्रह्म का बोध कराने वाली विद्या शक्ति हैं। वे
ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली हैं वे सत्, चित् और आनन्दस्वरूपा हैं।
प्रत्येक वस्तु के बाहर और भीतर व्याप्त हो रही हैं। उनके अस्ति,
भाति और प्रिय तीनों रूप, सत्, चित् और आनन्द के बोधक हैं। इस
प्रकार से वह महात्रिपुरसुन्दरी समस्त स्थूल वस्तुओं में अधिष्ठित हैं। मैं
और तुम, देवता, सारा संसार व शेष सब कुछ वे देवी ही हैं। ललिता
ही सत्य हैं, वे ही परब्रह्म तत्व हैं। पाँच रूपों (अस्ति, भाति, प्रिय,
नाम, रूप) के त्यागने और अपने रूप के न त्यागने से जो सत्ता शेष रह
जाती है, उसी को परम तत्व कहते हैं ॥ १ ॥
प्रज्ञानं ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मीति वा भाष्यते ।
तत्त्वमसीत्येव संभाव्यते । अयमात्मा ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मा-
स्मीति वा ब्रह्मैवाहमस्मीति वा ॥७॥
योऽहमस्मीति वा सोऽहमस्मीति वा योऽसौ सोऽहमस्मीति
वा या भाव्यते सैषा षोडशी श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी श्रीमहात्रि-
पुरसुन्दरी बालाऽम्बिकेति बगलेति वा मातङ्गीति वरस्वयं-
कल्याणीति भुवनेश्वरीति चामुण्डेति चण्डेति वाराहीति तिरस्क-
रिणीति राजमातङ्गीति वा शुकश्यामलेति वा लघुश्यामलेति वा
अश्वारूढेति वा प्रत्यङ्गिरा धूमावती सावित्री सरस्वती गायत्री
ब्रह्मानन्दकलेति ॥८॥
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यतिय इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥
इत्युपनिषत् ॥६॥
"प्रज्ञान ही ब्रह्म है" व 'मैं ही ब्रह्म हूँ' आदि वाक्यों से उसी
परम तत्व को व्यक्त किया जाता है। जब तक 'वह-तू-मैं' कहते हैं तो
हम उसी को प्रकट करते हैं। जो वह है, वह ही मैं हूँ' 'वह भी मैं