१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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करना पड़ता है । जिस प्रकार कोई रोगी चिकित्सक की शिक्षा
मात्र से अच्छा नहीं हो सकता, उसे चिकित्सक से औषधि भी
प्राप्त करनी पड़ती है, उसी प्रकार सच्चे गुरु न केवल आत्म-
कल्याण का मार्ग बताते हैं वरन् उस पर चल सकने योग्य
साहस, बल और उत्साह भी देते हैं । यह देन तभी सम्भव है
जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-सम्पदा पर्याप्त मात्रा में
हो । इसलिये गुरु का चयन और वरण करते समय उसकी विद्या
ही नहीं आत्मिक-स्तर और तप की संग्रहीत पूँजी को भी
देखना पड़ता है । यदि यह सभी गुण न हों तो कोई व्यक्ति
आध्यात्म-मार्ग का उपदेष्टा भले ही कहा जा सके पर गुरु नहीं
बन सकता । गुरु के पास साधना, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल
की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये । साधक को ऐसा गुरु
तलाश करना पड़ता है और उसी के मार्ग दर्शन में अपना रास्ता
बनाना पड़ता है ।
गुरु की महत्ता एवं योग्यता, शिष्य की पवित्रता एवं
कुपात्रता, गुरु के प्रति भक्ति-भावना रखना, उनके आदर्श का
अनुसरण करना आदि आवश्यक तथ्यों पर उपनिषदों में अनेक
प्रसंग मिलते हैं । वे सभी माननीय एवं विचारणीय हैं ।
देखिये :-
"वेद सम्पन्न आचार्य, ईश्वर भक्त, मत्सरता रहित,
योग-ज्ञाता, योग-निष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त,
परमात्मा में विशेष रूप से लीन इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा
जाता है । 'गु' शब्द का अर्थ है अन्धकार । और 'रु' शब्द
का अर्थ है-रोकने वाला । अन्धकार को दूर करने से गुरु
होता है ।
गुरु ही परब्रह्म है । गुरु ही परमगति है । गुरु ही