१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंअल्प आहार, स्वल्प निद्रा वाला, तेजस्वी तथा बलवान होता
है। अकाल मृत्यु का भय मिट कर दीर्घ आयु प्राप्त होती
है। .........सामान्य प्राणायाम से व्याधि और पापों का नाश
होता है। विमेष से महाव्याधियाँ तथा पाप-रोग मिटते हैं,
उत्कृष्ट से अल्प मूत्र, अल्प मल, शरीर की लघुता, अल्प भोजन
होता है। इन्द्रियाँ और बुद्धि तीव्र हो जाती हैं और तीनों
काल का ज्ञान हो जाता है।
नाभिकन्द में प्राण धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते
हैं। नासाग्र में धारण करने से दीर्घायु और देह की लाघवता
प्राप्त होती है। ब्रह्ममुहूर्त में जिह्वा से वायु को खींचकर पीने से
वाक् सिद्धि प्राप्त होती है। शरीर का जो अङ्ग रोग पीड़ित हो,
उसमें वायु को धारण करने से वह निरोग हो जाता है।
जिसका प्राण वायु क्रम से चलता है, वह प्राणजित हो
जाता है; फिर वह दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन आदि के काल
भेद को अन्तर्मुख होकर जानने लगता है।"
—त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद्
"उज्जायी प्राणायाम से मस्तक की उष्णता, गले का
कफ और अन्य अनेक रोग दूर होते हैं। देह की अग्नि की
वृद्धि होती है। इससे नाड़ी सम्बन्धी जलोदर और धातु सम्बन्धी
रोग भी दूर हो जाते हैं। शीतली प्राणायाम से गुल्म, प्लीहा,
पित्त, ज्वर, तृष्णा आदि दूर होते हैं। भस्त्रिका प्राणायाम से
कण्ठ की जलन मिटती है, शरीर की अग्नि बढ़ती है,
कुण्डलिनी जागती है और पुण्यप्रद, पाप-नाशक, शुभ तथा
सुखदायक है।"
—योगकुण्डल्युपनिषद्