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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 572 में से

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(२२)
"खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका
जो स्थूल भाग है वह मल बनता है, जो मध्यम भाग है, वह मांस
बनता है और जो सूक्ष्म भाग है सो मन बन जाता है। पिया
हुआ जल तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग
है वह मूत्र हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है,
जो सूक्ष्म भाग है, वह प्राण हो जाता है।......हे सौम्य ! मन
अन्नमय है। प्राण जलमय है। वाक् तेजोमय है।"
—छान्दोग्य, अध्याय ६, खण्ड ५
"अन्न ही बल से बढ़कर है। इसी से यदि दस दिन
भोजन मिले तो प्राणी को समस्त शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं
और वे फिर तभी लौटती हैं जब वह पुनः भोजन करने लगे।
तुम अन्न की उपासना करो। यह अन्न ही ब्रह्म है।"
--छान्दोग्य, अध्याय ६, खण्ड ६
"आहार मे अभक्ष्य त्याग देने से चित्त शुद्ध हो जाता
है। आहार शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती हैं।
जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और
अज्ञान की ग्रन्थियां टूटती जाती हैं।"
--पाशुपत ब्रह्मोपनिषद्
"आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है।
अन्तःकरण शुद्ध होने से भावना दृढ़ हो जाती है और भावना
की स्थिरता से हृदय की समस्त गांठें खुल जाती हैं।"
--छान्दोग्य
तैत्तरीय उपनिषद में इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला
गया है और आत्मकल्याण के इच्छुकों को आहार-शुद्धि का
विशेष रूप से ध्यान रखने का निर्देश किया गया है।