१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ | छान्दोग्योपनिषद्
तीन ऋषि उद्गीथ सम्बन्धी विद्या में पारङ्गत थे। एक शालावान् के पुत्र शिलक, द्वितीय चिकितायन
के पुत्र दाल्भ्य और तृतीय जीवल के पुत्र प्रवाहण। उन्होंने एक दिन परस्पर कहा- हम लोग उद्गीथ विद्या
में पारङ्गत हैं, अतः क्यों न इस विषय पर वार्तालाप करें ॥ १ ॥
तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां
ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति ॥ २ ॥
'हाँ, ऐसा ही करें, कहकर तीनों उत्तम स्थान पर बैठ गये। तब प्रवाहण जैवलि ऋषि ने कहा-पहले
आप दोनों चर्चा करें, मैं आप ब्राह्मणों की कही बातों का श्रवण करूँगा ॥ २ ॥
स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति
पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥
तब शिलक शालावत्य ने दाल्भ्य चैकितायन से कहा-यदि आज्ञा हो, तो मैं प्रश्न करूँ। दाल्भ्य ने कहा- करो॥
का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच
प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥ ४ ॥
'साम की गति (आश्रय) क्या है?' शिलक ने पूछा। दाल्भ्य ने उत्तर दिया 'स्वर'। फिर प्रश्न पूछा-
स्वर की गति क्या है? दाल्भ्य ने कहा 'प्राण'। फिर प्रश्न पूछा- प्राण की गति क्या है? उन्होंने उत्तर दिया-
'अन्न'। फिर प्रश्न पूछा- अन्न की गति क्या है? उन्होंने उत्तर दिया -जल ॥ ४ ॥
अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं
लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकं सामांभिसंस्थापयामः स्वर्गसंस्तावं हि
सामेति ॥ ५ ॥
जल की गति क्या है? ऐसा प्रश्न पूछने पर उत्तर दिया- वह लोक (स्वर्ग)। इस पर शिलक ने पूछा-
उस लोक की गति क्या है? इस पर दाल्भ्य ने कहा- स्वर्ग लोक का अतिक्रमण करके साम को दूसरे
आश्रय में नहीं रख सकते। हम साम को पूर्णतया स्वर्ग में स्थित मानते हैं और उसकी स्वर्ग रूप में ही
स्तुति की गयी है ॥ ५ ॥
तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य
साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥ ६ ॥
तब दाल्भ्य चैकितायन से शिलंक शालावत्य ने कहा- यह साम निश्चय ही अप्रतिष्ठित है; परन्तु यदि कोई
उद्गाता यह कह दे कि तुम्हारा मस्तक पृथ्वी पर गिर जाये, तो निश्चय ही मस्तक पृथ्वी पर गिर जायेगा ॥ ६ ॥
हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक
इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां
वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ॥ ७ ॥
दाल्भ्य ने कहा- श्रीमन्! मैं साम की स्थिति आपसे जानना चाहता हूँ। शिलक ने कहा- अच्छा,
जानो। दाल्भ्य ने प्रश्न पूछा- स्वर्ग लोक का आश्रय क्या है? उनने कहा-यह लोक। फिर प्रश्न पूछा- इस
लोक की गति क्या है? शिलक ने कहा- सबके आश्रयभूत इस लोक का अतिक्रमण करके साम को अन्य
आश्रय में नहीं ले जाना चाहिए। हम इस लोक में साम को प्रतिष्ठित करके ही उसकी स्तुति करते हैं ॥ ७ ॥