१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ५ ८५
(पाठ या स्तुति) करता है और उद्गाता सामगान आरम्भ करता है। इसी ॐकार अक्षर रूप ब्रह्म की
महिमा और रस(हव्य) से सभी यज्ञादि कर्म उसी अक्षर (ब्रह्म) की अर्चना के लिए सम्पन्न किये जाते हैं ॥
तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद। नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति
श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥ १० ॥
जो उस (अक्षर ब्रह्म) को जानता है और जो नहीं जानता, वे दोनों ही उसी के माध्यम से कर्म करते
हैं। विद्या और अविद्या (युक्तकर्म) के भिन्न-भिन्न फल हैं। जो कर्म विद्या , श्रद्धा और उपासना से युक्त
होकर किया जाता है, वही अधिक शक्तिशाली होता है। यह उस अक्षर ब्रह्म की ही व्याख्या है ॥ १० ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैना-
नभिभविष्याम इति ॥ १ ॥
प्रजापति की दोनों सन्तानें-देवगण और असुरगण परस्पर युद्ध करने लगे, तो देवों ने विचार किया
कि हम उद्गीथ की उपासना करके असुरों का पराभव करेंगे ॥ १ ॥
[ परमात्मा को प्रजा-सृष्टि का जनक तथा स्वामी-पति कहा गया है। उसी से देव-असुर, पदार्थ-प्रति पदार्थ
(मैटर-एन्टी मैटर) सर्जक और मारक प्रवाह सत्प्रवृत्ति-दुष्प्रवृत्ति आदि की उत्पत्ति हुई, वही उसका स्वामी है।
यदि ये एक हो जायें, तो पुनः वह निश्चेष्ट सृष्टि के पूर्व की स्थिति बन जाये। इसीलिए वे दोनों पक्ष अपने - अपने
निर्धारित पुरुषार्थ में प्रवृत्त रहते हैं। मनुष्य अपने संकल्प से किसी भी प्रवाह को फलित कर सकता है। आसुरी
प्रभाव से बचने के लिए उद्गीथ साधना का विधान बतलाया गया है।]
ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तंहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं
जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥
उन्होंने (देवों ने) नासिका स्थित प्राण के रूप में उद्गीथ की उपासना की, किन्तु असुरों ने उस प्राण को अपने
पाप से भ्रष्ट कर दिया। पाप से बींधने के कारण ही वह (घ्राण) सुगन्ध एवं दुर्गन्ध दोनों को ग्रहण करता है ॥ २ ॥
अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तांहासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति
सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥
फिर देवों ने वाणी के रूप में उद्गीथ (ॐकार) की उपासना की; किन्तु असुरों ने अपने पाप से
वाणी को भ्रष्ट कर दिया। पाप से बींधे जाने के कारण वाणी सत्य और झूठ दोनों बोलने लगी ॥ ३ ॥
अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति
दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ४ ॥
फिर देवों ने चक्षु रूप ॐकार की उपासना की; किन्तु असुरों ने अपने पाप से उसे भी भ्रष्ट कर दिया।
पाप से बींधे जाने के कारण नेत्र देखने योग्य और न देखने योग्य दोनों को देखता है ॥ ४ ॥
अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे। तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयꣳ
शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ५ ॥
फिर देवों ने श्रोत्ररूप ॐकार की उपासना की, तब असुरों ने अपने पाप से उसे भ्रष्ट कर दिया, पाप
से बींधे जाने के कारण श्रोत्र सुनने योग्य और न सुनने योग्य सभी बातों को सुनता है ॥ ५ ॥