१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमन्त्रानुक्रमणिका ५०२
मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण
निःशब्दं तत्परम् | नाबि० ४८ | पुरस्ताद् ब्रह्मणस्तस्य | प्रण० १
निष्कलं निष्क्रियं | श्वेता० ६.१९ | पुरा तृतीय सवनस्य | छान्दो० २.२४.११
नीलः पतङ्गो हरितो | श्वेता० ४.४ | पुरा प्रातरनुवाकस्योपा. | छान्दो० २.२४.३
नीहार धूमार्कानिलानलानाम् | श्वेता० २.११ | पुरा माध्यन्दिनस्य | छान्दो० २.२४.७
नैनमूर्ध्वम् | श्वेता० ४.१९ | पुरुष एवेदं विश्वं | मुण्ड० २.१.१०
नैव वाचा न | कठ० २.३.१२ | पुरुष एवेदꣳ सर्वम् | श्वेता० ३.१५
नैव स्त्री न पुमानेष | श्वेता० ५.१० | पुरुषसूक्तार्थनिर्णयम् | मुद्ग० १.१
नैवेह किंचनाग्र आसीत् | बृह० १.२.१ | पुरुषः सोम्योत | छान्दो० ६.१६.१
नैवैतेन सुरभि | छान्दो० १.२.९ | पुरुषःसोम्योतोपतापिन्म् | छान्दो० ६.१५.१
नैषा तर्केण | कठ० १.२.९ | पुरुषे ह वा अयमादितो | ऐत० २.१.१
नो इतराणि ये के | तैत्ति० १.११.३ | पुरुषो नारायणो भूतम् | मुद्ग० २.३
नोच्छ्वसेन्न | अमृ० १४ | पुरुषो वा अग्निर्गौतम- | बृह० ६.२.१२
न्यग्रोधफलमत आहरेतीदम् | छान्दो० ६.१२.१ | पुरुषो वाव गौतमाग्निः | छान्दो० ५.७.१
पञ्च पादं पितरं | प्रश्न० १.११ | पुरुषो वाव यज्ञः | छान्दो० ३.१६.१
पञ्च मा राजन्य बन्धुः | छान्दो० ५.३.५ | पूर्णमदः पूर्णमिदम् | बृह० ५.१.१
पञ्चमी नामधेया | ना०बि० १० | पूषन्नेकर्षे यम | ईश० १६
पञ्चम्यामथ मात्रायां | ना०बि० १४ | पृथिवी च पृथिवीमात्रा | प्रश्न० ४.८
पञ्चस्रोतोऽम्बुम् | श्वेता० १.५ | पृथिवी वाव गौतमाग्निः | छान्दो० ५.६.१
पद्मकं स्वस्तिकम् | अपृ० १९ | पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षम् | छान्दो० २.१७.१
पद्मसूत्रनिभा | प्रण० १० | पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौः | तैत्ति० १.७.१
परब्रह्मपयोराशौ | शु०२० ५० | पृथिव्यर्चं समदधात् | गाय० ४.३
परमं पदमिति... पदम् | निरा० ३६ | पृथिव्येव यस्यायतन | बृह० ३.९.१०
परमात्मेति च ...स सूर्यः | निरा० ७ | पृथिव्यै चैनमग्नेश्च | बृह० १.५.१८
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते | प्रश्न० ४.१० | पृथ्व्याप्यतेजोऽनिलखे | श्वेता० २.१२
पराचः कामाननुयन्ति | कठ० २.१.२ | प्रकृतिरिति च.....प्रकृतिः | निरा० ६
पराञ्चि खानि | कठ० २.१.१ | प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् | छान्दो० २.२३.२
परिपूर्णः परात्मास्मिन्देहे | शु०२० ३३ | प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेषाम् | छान्दो० ४.१७.१
परीक्ष्य लोकान् | मुण्ड० १.२.१२ | प्रजापतिर्वा एषोऽग्रे | मैत्रा० २.६
परोवरीयो हास्य भवति | छान्दो० २.७.२ | प्रजापतिर्विराट् | मन्त्रि० १३
पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम | बृह० ६.२.१० | प्रजापतिश्वरसि | प्रश्न० २.७
पर्जन्यो वाव गौतमाग्नि० | छान्दो० ५.५.१ | प्रणवो धनुः शरो | मुण्ड० २.२.४
पशुषु पञ्चविधं | छान्दो० २.६.१ | प्रतिबोधविदितं | केन० २.४
पश्चाद्व्याययीत | अमृ० २२ | प्रते ब्रवीमि | कठ० १.१.१४
पश्यन्त्यस्यां | मन्त्रि० ८ | प्रत्याहारस्तथा ध्यानम् | अमृ० ६
पादादिकं गुणास्तस्य | ना०बि० २ | प्रथमायां तु मात्रायाम् | ना०बि० १२
पायूपस्थेऽपानं चक्षुः | प्रश्न० ३.५ | प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो | छान्दो० ५.१३.२
पार्थिवः पञ्चमात्रस्तु | अमृ० ३१ | प्रस्तोतर्या देवता | छान्दो० १.१०.९
पिता माता प्रजाैत | बृह० १.५.७ | प्लवा होते अदृढा | मुण्ड० १.२.७
पितृमातृसहोदर...बन्ध | निरा० १९ | प्राचीनशाल औपमन्यवः | छान्दो० ५.११.१
पिबन्त्येनाम | मन्त्रि० ६ | प्राण आद्यो हृदि | अमृ० ३५
पीतोदका जग्धतृणा | कठ० १.१.३ | प्राण इति होवाच | छान्दो० १.११.५
पुरमेकादशद्वारम् | कठ० २.२.१ | प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः | छान्दो० ३.१८.४