१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यष्टि-समष्टि [परिशिष्ट] ४७७
है, जो चतुर्विध शरीरधारी (जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज) प्राणियों का समष्टिगत अधिष्ठाता है। वहाँ इसके
लिए सुन्दर उदाहरण दिया गया है-जलाशय तथा वन का। जलाशय 'जलबिन्दुओं' का तथा 'वन' वृक्षों का
समष्टिगत रूप है। इस तरह चतुर्विध स्थूल शरीरों का समष्टि उपहित चैतन्य- सर्वनराभिमानित्वात्-वैश्वानर
कहलाता है। विविध रूपों में विराजमान होने के कारण-विविधं राजमानत्वात्- यह 'विराट्' भी कहलाता है।
'वैश्वानर' के रूप में स्थूल शरीर की इस समष्टि को 'अन्नमयकोश' तथा जाग्रत् भी कहा जाता है। स्थूल शरीरों के
इस समष्टि रूप के विपरीत जो व्यष्टि उपहित चैतन्य है, उसे 'वेदान्त' के अनुसार 'विश्व' संज्ञा प्रदान की गई है।
जैसे जलाशय का व्यष्टि रूप जल विन्दु और वन का व्यष्टि रूप वृक्ष होता है, उसी तरह वैश्वानर का व्यष्टि रूप विश्व
है। रामतीर्थ ने इसका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है-सर्वथा विश्वशरीरवर्तित्वाद् विश्व इत्युक्तं भवति (वे०सा०
टीका खण्ड १७) 'यह समस्त शरीरों में प्रवेश करने में समर्थ है'। यह सूक्ष्म शरीर (५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५
प्राण, मन और बुद्धि) का परित्याग किए बिना ही अर्थात् सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। यही
अन्नमय कोश कहलाता है और कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि उपाधि से युक्त होने के कारण इसे जाग्रत् भी कहा जाता है।
२०९. व्यष्टि-समष्टि - समूह या समाज में से अलग किया हुआ प्रत्येक पदार्थ या मनुष्य व्यष्टि कहा जाता है। समूह
से छिन्न व्यक्ति या जिसमें सामूहिकता का अभाव हो, वह व्यष्टि रूप में मान्य है। वह सिद्धान्त जिसमें व्यक्ति की
स्वतंत्र सत्ता तथा उसके अधिकार को प्रमुखतया मान्यता मिलती है, व्यष्टिवाद कहलाता है। इसका विपरीतार्थक
शब्द समष्टि है। सबके समूह को समष्टि कहते हैं। इसका अन्य पर्याय 'संयुक्त अधिकार' भी है। उपनिषद् में कहीं-
कहीं व्यष्टि का अर्थ सर्वव्यापकता भी लिया गया है- तां (ब्रह्मणः) व्यष्टिं व्यश्नुते य एवं वेद (कौ० ब्रा० १.७)
अर्थात् वह उस ब्रह्म की सर्वव्यापकता को प्राप्त कर लेता है, जो इस प्रकार जानता है। वायु को व्यष्टि और समष्टि
रूप दोनों माना गया है, चूँकि वायु शब्द एक का बोधक भी है और कई गैसों का समूह भी है- तस्माद् वायुरेव
व्यष्टिर्वायुः समष्टिः (बृह०३.३.२)। वृक्ष-व्यष्टि है, वन-समष्टि है। जल बिन्दु-व्यष्टि है, जलाशय-समष्टि है।
२१०. व्याहृति - व्याहृति का अर्थ है- कथन, उक्ति, वचन या उच्चारण। इनकी संख्या सात मानी गई है- भूः, भुवः,
स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्। इनमें प्रारंभिक तीन महाव्याहृति कही गयी हैं। पौराणिक स्तर पर ये सविता
और पृश्रि की कन्या मानी जाती हैं। उपनिषद् ग्रन्थों में व्याहृतियों का उल्लेख इस प्रकार हुआ है- भूर्भुवः सुवरिति
वा एतास्तिस्त्रो व्याहृतयः (तैत्ति० १.५.१), ता एता व्याहृतयः । प्रेत्येति वाग् इति भूर्भुवःस्वरिति (उदिति)
(जैमि० २.९.३)। त्रयी विद्या (तीनों वेदों) के निचोड़ से सारभूत रस अभिस्रवित हुआ। यही सार तीन व्याहृतियाँ
भूः, भुवः, स्वः हुईं-स त्रयीं विद्यामभ्यपीड़यत्। तस्या अभिपीडितायै रसः प्राणेदत्। ता एवैता व्याहृतयोऽभवन्
भूर्भुवः स्वरिति (जैमि० १.२३.६)। तीनों व्याहृतियों के निचोड़ से ॐ अक्षर अभिस्रवित हुआ।
२११. व्योम - व्योम आकाश, अन्तरिक्ष या आसमान का सूचक है। मेघ या जल के पर्याय में भी व्योम शब्द प्रयुक्त
हुआ है। भगवान् विष्णु को भी व्योम कहा गया है। भगवान् शिव का एक नाम व्योमकेश है। व्योम को लोक भी
कहा गया है- इमे वै लोकाः परमं व्योम (शत० ब्रा० ७.५.२.१८)। ब्राह्मण ग्रन्थ में अन्न को भी व्योम कहा गया
है-अन्नं वै व्योम (तैत्ति०सं० ५.३.३.२)। ब्रह्मविद् की तुलना ब्रह्म से उसी प्रकार की गयी है, जैसे घट के नष्ट होने
पर घटाकाश ही महाकाश बन जाता है-घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्वयम्। तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव
ब्रह्मवित् स्वयम् (आत्मो० २२-२३)।
२१२. व्रात्य - व्रात्य का साधारण अर्थ 'व्रत सम्बन्धी' है। व्रात्य शब्द परमेश्वर का भी बोधक है। अथर्ववेद में व्रात्य की
महिमा बहुत अधिक गायी गयी है। परवर्ती काल में यह शब्द व्रतों से च्युत, संस्कारभ्रष्ट, पतित और निकृष्ट व्यक्ति
का बोधक हो गया है। जिसके दस संस्कार या उपनयन संस्कार न हुआ हो, उसे भी व्रात्य माना जाने लगा। जैमिनीय
ब्राह्मण में व्रात्य शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो सम्भवतः व्रात्य के पर्याय तथा व्रतों के नियम, उपनियम अर्थ में प्रयुक्त
हुआ है- मुह्यन्तीव वा एते ये व्रात्यां धावयन्ति (जै०ब्रा० २.२२१)। ब्रह्मणो वा एते व्यृद्धयन्ते ये व्रात्यां
धावयन्ति (जै०ब्रा० २.२२३)। प्रश्नोपनिषद् में 'व्रात्य' शब्द प्राण के लिए प्रयुक्त हुआ है। यहाँ व्रात्य शब्द 'शुद्ध
या पवित्र' भाव से प्रयुक्त हुआ है। प्राण ही व्रात्य है, का तात्पर्य प्राण में संस्कार का प्रयोग नहीं है, वह स्वभावगत
शुद्ध और पवित्र है। सबसे पहले शुद्ध रूप में उत्पन्न हुआ है।