१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें४७४ [परिशिष्ट] विद्वान्
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत (कठ० १.३.१४)। आत्मा को वर कहा गया है- आत्मा हि वरः (काठ० सं०
२८.५)। परमात्मा की सम्पूर्ण रचना श्रेष्ठतम है- सर्वं वै वरः (शत०ब्रा०२.२.१.४)। नचिकेता ने महात्मा यमराज
से तीन वरदान प्राप्त किये थे- तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व (कठ० १.१.९)।
वस्तुतः देवशक्तियाँ 'वरदान' (वर=श्रेष्ठ, दान) देती हैं, जबकि मनुष्य अपनी इच्छानुसार माँगता है।
इसलिए दोनों का क्रम ठीक न बैठने से बात बनती नहीं।
१९२. वषट्कार-हन्तकार- देवों के निमित्त किया हुआ यज्ञ विशेष वषट्कार कहलाता है। कहीं-कहीं यह
स्वाहाकार के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसे यज्ञ की प्रतिष्ठा कहकर निरूपित किया गया है-वषद्वारो वै यज्ञस्य
प्रतिष्ठा (तैत्ति० सं० ७.५.५.३)। इसे वैश्वानर (अग्नि) और सूर्य से भी सम्बद्ध किया गया है- वैश्वानरो वषट्कारः
(मै०ब्रा०४.६.७)। एष एव वषट्कारो य एष (सूर्यः) तपति (शत०ब्रा०१.७.२.११)। अतिथि या संन्यासी आदि
के लिए गृहस्थ भोजन का अल्प अंश निकाला करते थे, यह अंश पुष्कल का चौगुना या मोर के सोलह अण्डों के
बराबर होता था, इसे हन्तकार कहा जाता था। मनुष्यों (अतिथियों) के लिए जो भेंट निकाली जाती है, वह हन्तकार
है- निर्वीती हन्तकारेण मनुष्यांस्तर्पयेदथ।
१९३. वाजी - द्र०-अश्व ।
१९४. वानप्रस्थ - द्र०-चतुराश्रम।
१९५. विकार - किसी वस्तु, व्यक्ति या क्षेत्र की मूल वृत्तियों में बदलाव आ जाना विकार कहलाता है। विकृति,
खराबी, अवगुण या दोष को भी विकार कहते हैं। व्यक्ति में प्रायः काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, निराशा, चिन्ता,
ईर्ष्या, द्वेष आदि मानसिक विकार पाये जाते हैं। गीता में कहा गया है कि विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध)
का ध्यान-चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है,
कामना से क्रोध उत्पन्न होता है- ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः
कामात्क्रोधोऽभिजायते (गी०२.६२)। काम, क्रोध, लोभ इम तीन विकारों को नरक का द्वार कहा गया है, ये
आत्मा का नाश करने वाले हैं, इन तीनों का त्याग करना चाहिए- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः
क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् (गी०१६.२१)। धीर प्रकृति वाले पुरुषों का स्वभाव बताते हुए कहा गया
है कि विकार (काम, क्रोध आदि) की स्थिति आने पर भी जिनके चित्त में विकार नहीं उत्पन्न होता, वे वास्तव में
धीर (धैर्यवान्) हैं- विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः (कु०सं० १.५९)।
१९६. विद्या, ज्ञान - विद्यते अनया सा विद्या अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, वह विद्या है। नित्यानित्य
वस्तु का विवेक प्रदान करने वाली शक्तिधारा 'विद्या' कही जाती है। परमात्मसत्ता नित्य है। सदैव विद्यमान रहती
है, जबकि उससे भिन्न जो कुछ भी है, वह अनित्य है, नश्वर है, परिवर्तनशील है- इस तथ्य का बोध (स्वानुभूति)
होते ही व्यक्ति भवबन्धनों से मुक्त हो जाता है। जैसा कि आचार्य शंकर ने लिखा है- सा विद्या या विमुक्तये (जो
सांसारिक बन्धनों से जीवात्मा को मुक्त कर दे, वही विद्या है।) इसी को अमृतत्व की प्राप्ति कहा जाता है-
विद्ययाऽमृतमश्नुते (ईश०११; मैत्रा०७.९), विद्यया विन्दतेऽमृतम् (केन० २.४)। 'अविद्या' अन्धकार की स्थिति
है, चैतन्यस्वरूप आत्मा पर आवरण डाल देती है, जबकि विद्या प्रकाश की स्थिति है, चैतन्य स्वरूप पर पड़े
आवरण को दूर करके उसका बोध-साक्षात्कार करा देती है- विद्या दिवा प्रकाशत्वादविद्या रात्रिरुच्यते (१
संन्या०२.८३)। संन्यासोपनिषद् में इसीलिए कहा गया है कि जो विद्या के अभ्यास (साधना) में प्रमाद (आलस्य)
करता है, वह दिन में सोये रहने के समान है, अर्थात् दिन के बहुमूल्य समय को सोने में व्यर्थ गँवा देने के समान
है- विद्याभ्यासे प्रमादो यः स दिवा स्वाप उच्यते (१ संन्या० २.८४)। अतएव समय रहते 'विद्या' की प्राप्ति का
परमपुरुषार्थ करके आत्मकल्याण का पथ प्रशस्त कर लेना चाहिए- विद्यया साधयेत (संहि० ३.४)।
१९७. विद्वान् - विद्वान् का शाब्दिक अर्थ है- ज्ञाता, जानकार, बुद्धिमान्, विद्यायुक्त। यह शब्द वेद-उपनिषद् में अनेक
स्थानों पर प्रयुक्त हुआ है। अग्निदेव हमारे सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले हैं, अतः उन्हें विद्वान् कहा गया है- विश्वा॑नि
देव वयुनानि विद्वान् (ईश० १८)। उपनिषद् के अनुसार विद्वान् नाम-रूप से मुक्त होकर उत्तमोत्तम दिव्य पुरुष को