१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्य परिशिष्ट ४६९
तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः (कठ० १.१.१६)। महात्माजन दैवी प्रकृति के आश्रित
होकर उस परमात्मा की भजते हैं- महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः (गी० ९.१३)।
१६८. महावाक्य — वेदान्त शास्त्र में जीव और ब्रह्म में ऐक्य प्रतिपादित करने वाले वाक्य महावाक्य कहलाते हैं। प्रमुख
रूप से चार महावाक्य शुक्तरहस्योपनिषद् में वर्णित हुए हैं- ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ १ ॥ ॐ अहं ब्रह्मास्मि ॥ २ ॥ ॐ
तत्त्वमसि ॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म ॥ ४ ॥ इसमें भगवान् शिव ने शुकदेव मुनि को षडङ्गन्यास पूर्वक महावाक्यों
का उपदेश किया है। इसमें नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट्, फट्- इन छः बीजाक्षरों के साथ षट् करन्यास तथा षट्
अङ्गन्यास सहित महावाक्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन दृष्टिगोचर होता है। तत्त्वमसि- यह महावाक्य अभेदवाचक है,
जो इसका जप करते हैं, वे भगवान् शिव को सायुज्य मुक्ति के भाजक होते हैं- तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये
जपन्ति ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति (शु०२०)। महावाक्य पदों का उपदेश- आत्मस्वरूप सूर्य प्रकाश के
सदृश निरूपित हुआ है। उपनिषद् का कथन है कि अनात्म पदार्थों में आत्मबुद्धि के कारण मैं अज्ञान के अन्धेरे में
पड़कर 'मैं' 'मेरे' की मोहात्मक स्थिति में पहुँच गया हूँ। गुरुदेव द्वारा महावाक्य पदों का उपदेश प्राप्त कर
आत्मस्वरूप सूर्य के प्राकट्य से मेरी निद्रा भंग हो गई है-अनात्मदृष्टेरविवेकनिद्रामहं मम स्वप्नगतिं गतोऽहम्।
स्वरूपसूर्येऽभ्युदिते स्फुटोक्तेर्गुरोर्महावाक्यपदैः प्रबुद्धः (शु०२०)।
१६९. मातरिश्वा — अन्तरिक्ष में प्रवहमान वायु का एक नाम मातरिश्वा है। कहीं-कहीं अग्नि को भी मातरिश्वा संज्ञा प्रदान
की गई है। इसे प्राणदाता पितारूप में स्वीकार किया गया है- व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः।
वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्वनः (प्रश्न० २.११)। मातरिश्वा अप् (सृष्टि का मूल घटक) को धारण किये
रहता है- तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति (ईश०४)। केनोपनिषद् में यक्ष को वायुदेव कहते हैं- मैं ही वायु हूँ और
मैं ही मातरिश्वा के नाम से प्रसिद्ध हूँ-वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति (केन० ३.८)।
१७०. माया — द्र०-अविद्या।
१७१. मीमांसा — षड्दर्शनों में अन्तिम युग्म "मीमांसा" के दो भाग हैं- पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा। मीमांसा का
शाब्दिक अर्थ है- किसी तत्त्व का विचार, निर्णय या विवेचन। पूर्व मीमांसा में यज्ञपरक वेद वचनों को व्याख्या है,
इससे इसे 'यज्ञविद्या' भी कहते हैं। उत्तर मीमांसा उपनिषद् भाग से सम्बन्धित है, अतः इसे वेदान्त कहते हैं। पूर्व
मीमांसा सूत्र के प्रणेता जैमिनि ऋषि हैं। इसकी व्याख्या के रूप में कुमारिल भट्ट ने तन्त्र वार्तिक और श्लोकवार्तिक
की रचना की है। माधवाचार्य ने जैमिनीय न्यायमाला विस्तार नामक एक भाष्य की रचना की है। प्रभाकर भी इसी
मत के प्रमुख प्रतिपादक थे। बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया रूप में इन वेदज्ञों ने अपने धर्म की सुव्यवस्थित किया। पूर्व
मीमांसा को कर्म प्रधान और उत्तर मीमांसा को ज्ञान प्रधान माना गया है।
१७२. मुक्ति-मोक्ष — मुक्ति शब्द की निष्पत्ति मुच् (मोचनार्थक) धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाने से होती है, जिसका अर्थ
है-छुटकारा पाना। संसार के जन्म-मरण-बन्धन से छुटकारा मिलने की अवस्था मुक्ति कहलाती है। वासना, तृष्णा
और अहंता या लोभ, मोह, अहंकार के बन्धनों से छुटकारा पाने की अवस्था भी मुक्ति कहलाती है। इसका दूसरा
अर्थ ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति या मोक्ष है। ज्ञान और विद्या से ही साधक को मुक्ति मिलती है। मीमांसक कर्म को और
भक्तिमार्गीय उपासना को मुक्ति का कारण मानते हैं। श्रवण,मनन, निदिध्यासन और समाधि-ये चार मुक्ति के साधन
के रूप में प्रतिपादित हुए हैं। उपनिषद् में वर्णन है कि ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है- ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्
(तै०३०२.१)। साधक उस ब्रह्म को जानकर ही मृत्यु का अतिक्रमण कर सकता है, दूसरा कोई मार्ग नहीं है- तमेव
विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वेता०३.८)। कर्म को बन्धन का कारण और ज्ञान को मोक्ष
का संसाधक माना गया है। गीता में कहा गया है कि ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों को भस्मसात् कर देती है-
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा (गी०४.३७)। वस्तुतः मनुष्य के बन्धन और दुःख का कारण
अविद्या है, उसी की निवृत्ति को मुक्ति कहा गया है। जीव ब्रह्म है-अयमात्मा ब्रह्म; परन्तु अविद्या के कारण जीव
ब्रह्म के साथ अपने तादात्म्य की भुला देना है। उपनिषद् के अनुसार नित्य और अनित्य वस्तुओं के विचार द्वारा
अनित्य संसार के दुःख-सुख देने वाले सम्पूर्ण विषयों पर से ममता रूप बन्धन को नष्ट कर देना मोक्ष है- मोक्ष इति
च नित्यानित्यवस्तु विचारादनित्यसंसारसुखदुःखविषयसमस्त क्षेत्रममताबन्धक्षयो मोक्षः (निरा०२८-२९)।