१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रपाठक ४ मन्त्र ३ ३९१
जैसे अग्नि में लकड़ी के जलकर समाप्त होने पर अग्नि स्वयं ही अपने स्थान में शान्त हो जाती है,
वैसे ही वृत्तियों का क्षय होने पर चित्त स्वयं ही अपने उत्पत्ति स्थल में शान्त हो जाता है ॥ क ॥
स्वयोनावुपशान्तस्य मनसः सत्यगामिनः ।
इन्द्रियार्था विमूढस्यानृताः कर्मवशानुगाः ॥ ख ॥
अपने उद्गम स्थल में शान्त मन जब सत्य की ओर गमन करता है, तब कर्म के वशीभूत इन्द्रियों
के प्रति आसक्ति आदि भोग विषय उसे असत्य प्रतीत होते हैं ॥ ख ॥
चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् ।
यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम् ॥ ग ॥
चित्त ही संसार है, इस कारण प्रयत्नपूर्वक चित्त का शोधन करना चाहिए। जिस प्रकार (व्यक्ति) का
चित्त होता है, उसी प्रकार ही उसे गति (दशा) प्राप्त होती है। यही सनातन नियम है ॥ ग ॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमव्ययमश्नुते ॥ घ ॥
चित्त के शान्त होने पर शुभ और अशुभ कर्म विनष्ट हो जाते हैं। चित्त के द्वारा शान्त हुआ व्यक्ति जब
(चिन्तन के माध्यम से) आत्मा में स्थित होता है, तभी उसे अक्षय आनन्द की अनुभूति होती है ॥ घ ॥
समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरे ।
यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥ ङ ॥
मनुष्य का चित्त जितना अधिक विषय-वासनाओं (भोगों) में आसक्त होता है, यदि उतना ही कहीं
(उसका चित्त) 'ब्रह्म' के प्रति आसक्त हो जाए, तो फिर उसे वासनादि विषयों के बन्धन से मुक्ति क्यों
न मिल जाए ? ॥ ङ ॥
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च ।
अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम् ॥ च ॥
शुद्ध और अशुद्ध यह दो स्थितियाँ मन की कही गयी हैं। कामनाओं के संकल्प से युक्त (मन)
अशुद्ध है तथा कामनाओं का परित्याग कर देने वाला मन ही शुद्ध है ॥ च ॥
लयविक्षेपरहितं मनः कृत्वा सुनिश्चलम्।
यदा यात्यमनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ छ ॥
लय और विक्षेपरहित 'मन' पूर्णरूपेण निश्चल (स्थिर) हो जाता है और जब मनोभावों (कामनाओं)
का समापन हो जाता है, तभी वह परम-पद रूप को प्राप्त होता है ॥ छ ॥
तावदेव निरोद्धव्यं हृदि यावत्क्षयं गतम्।
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रन्थविस्तराः ॥ ज ॥
जब तक मन का क्षय (विनाश) न हो, तब तक ही उसका हृदय में निरोध करना चाहिए। मात्र
यही ज्ञान एवं मोक्ष का सार है, अन्य शेष का तो ग्रन्थों में विस्तार किया गया है ॥ ज ॥
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं लभेत् ।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते ॥ झ ॥