१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ें३७६ मुद्गलोपनिषद
तीन मन्त्रों के इस समूह में भगवान् के चतुर्व्यूह से सम्बन्धित स्वरूप का उल्लेख है। ‘त्रिपाद्०’ इस
चतुर्थ मंत्र में चतुर्व्यूह के अनिरुद्ध स्वरूप का विस्तृत वैभव वर्णित किया गया है॥ ४॥
तस्माद्विराडित्यनया पादनारायणाद्धरेः ।
प्रकृतेः पुरुषस्यापि समुत्पत्तिः प्रदर्शिता ॥ ५॥
‘पुरुष सूक्त’ के इस पञ्चम मंत्र ‘तस्माद्विराड्०’ में पाद विभूति रूप भगवान् नारायण द्वारा श्री हरि
की आश्रयभूता प्रकृति (माया) और पुरुष (जीव) का प्राकट्य दर्शाया गया है ॥ ५ ॥
यत्पुरुषेणेत्यनया सृष्टियज्ञः समीरितः ।
सप्तास्यासन्परिधयः समिधश्च समीरिताः ॥ ६॥
इसी सूक्त के ‘यत्पुरुषेण०’ मन्त्र के द्वारा सृष्टि स्वरूप यज्ञ का प्रतिपादन किया गया है एवं
‘सप्तास्यासन् परिधयः०’ द्वारा उस सृष्टि रूप यज्ञ कार्य में प्रयुक्त समिधा का विवेचन किया गया है ॥ ६॥
तं यज्ञमिति मन्त्रेण सृष्टियज्ञः समीरितः ।
अनेनैव च मन्त्रेण मोक्षश्च समुदीरितः ॥ ७॥
यही सृष्टियज्ञ इसी सूक्त के अगले मन्त्र ‘तं यज्ञम्०’ के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। साथ ही
मोक्ष का वर्णन भी इसी मन्त्र के द्वारा किया गया है ॥ ७॥
तस्मादिति च मन्त्रेण जगत्सृष्टिः समीरिता ।
वेदाहमिति मन्त्राभ्यां वैभवं कथितं हरेः ॥ ८॥
‘पुरुष सूक्त’ के ‘तस्माद्०’ आदि सात मन्त्रों द्वारा इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का उल्लेख किया
गया है। ‘वेदाहम्०’ इत्यादि दो मन्त्रों के द्वारा भगवान् श्री हरि के वैभव (कीर्ति) का विशेष वर्णन प्राप्त
होता है॥ ८॥
यज्ञेनेत्युपसंहारः सृष्टेर्मोक्षस्य चेरितः ।
य एवमेतज्जानाति स हि मुक्तो भवेदिति ॥ ९॥
‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त०’ मन्त्र के द्वारा सृष्टि एवं मोक्ष का उपसंहारात्मक वर्णन किया गया है।
इस भाँति जो भी ‘पुरुष सूक्त’ को ज्ञान के द्वारा आत्मसात् करता है, वह अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त
कर लेता है॥ ९॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
अथ तथा मुद्गलोपनिषदि पुरुषसूक्तस्य वैभवं विस्तरेण प्रतिपादितम् । वासुदेव
इन्द्राय भगवज्ज्ञानमुपदिश्य पुनरपि सूक्ष्मश्रवणाय प्रणतायेन्द्राय परमरहस्यभूतं
पुरुषसूक्ताभ्यां खण्डद्वयाभ्यामुपादिशत् ॥ १॥
इस प्रकार मुद्गलोपनिषद् (के प्रथम खण्ड के) द्वारा ‘पुरुषसूक्त’ के जिस विशिष्ट वैभव का
प्रतिपादन हुआ है, उस विशेष भगवद्ज्ञान का उपदेश भगवान् श्री वासुदेव ने इन्द्र को प्रदान किया था। उस
सूक्ष्म तत्त्वज्ञान को पुनः श्रवण करने के लिए इन्द्रदेव नतमस्तक होकर भगवान् वासुदेव की शरण में