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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 505 में से

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पृष्ठ 29

मन्त्र १५ २९
दोष तथा ध्यान के द्वारा अनीश्वरीय गुणों का नाश होता है। इस प्रकार संचित पापों एवं उन इन्द्रियों के
कुसंस्कारों का शमन करते हुए अपने इष्ट के मनोहारी रूप का चिन्तन करना चाहिए ॥ ८-९ ॥
[प्राणायाम के साथ इष्ट के मनमोहक रूप के स्मरण से मन सहज ही उस ओर लग जाता है, अतः प्राण-
प्रक्रिया तेजस्वी हो जाती है।]
रुचिरं रेचकं चैव वायोराकर्षणं तथा।
प्राणायामास्त्रयः प्रोक्ता रेचपूरककुम्भकाः ॥ १० ॥
इस प्रकार अपने इष्ट के सुन्दर रूप का ध्यान करते हुए वायु को अन्तःकरण में स्थिर रखना (अर्थात्
कुम्भक करना), रेचक (अर्थात् श्वास को निःसृत करना) और पूरक (अर्थात् वायु को अन्दर खींचना)।
इस प्रकार रेचक, पूरक एवं अन्तः-बाह्य कुम्भक के रूप में तीन तरह के प्राणायाम कहे गये हैं॥ १०॥
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ ११ ॥
प्राण शक्ति की वृद्धि करने वाला साधक व्याहृतियों एवं प्रणव सहित सम्पूर्ण गायत्री महामन्त्र का
उसके शीर्ष भाग सहित तीन बार मानस-पाठ करते हुए पूरक, कुम्भक तथा रेचक करे। इस प्रकार की
प्रक्रिया को एक 'प्राणायाम' कहा गया है ॥ ११ ॥
उत्क्षिप्य वायुमाकाशे शून्यं कृत्वा निरात्मकम्।
शून्यभावे नियुञ्जीयाद्रेचकस्येति लक्षणम् ॥ १२ ॥
(नासिका द्वारा) प्राणवायु को आकाश में निकालकर हृदय को वायु से रहित एवं चिन्तन
से रिक्त करते हुए शून्यभाव में मन को स्थिर करने की प्रक्रिया ही 'रेचक' है। यही 'रेचक
प्राणायाम' का लक्षण है ॥ १२ ॥
वक्त्रेणोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः।
एवं वायुर्गृहीतव्यः पूरकस्येति लक्षणम् ॥ १३ ॥
जिस प्रकार पुरुष मुख के माध्यम से कमल-नाल द्वारा शनैः-शनैः जल को ग्रहण करता है, उसी
प्रकार मन्द गति से प्राण वायु को अपने अन्तःकरण में धारण करना चाहिए। यही प्राणायाम के अन्तर्गत
'पूरक' का लक्षण है ॥ १३ ॥
नोच्छ्वसेन्न च निःश्वसेन्नैव गात्राणि चालयेत्।
एवं भावं नियुञ्जीबात्कुम्भकस्येति लक्षणम् ॥ १४ ॥
श्वास को न तो अन्तःकरण में आकृष्ट करे और न ही बहिर्गमन करे तथा शरीर में कोई हलचल भी
न करे। इस तरह से प्राण वायु को रोकने की प्रक्रिया को 'कुम्भक' प्राणायाम का लक्षण कहा गया है ॥ १४॥
अन्धवत्पश्य रूपाणि शब्दं बधिरवच्छृणु।
काष्ठवत्पश्य वै देहं प्रशान्तस्येति लक्षणम् ॥ १५ ॥
जिस भाँति अन्धे को कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी भाँति साधक नाम रूपात्मक
अन्य कुछ भी न देखे। शब्द को बधिर की भाँति श्रवण करे और शरीर को काष्ठ की तरह जाने।
यही प्रशान्त का लक्षण है ॥ १५ ॥