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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 505 में से

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पृष्ठ 287

अध्याय ३ ब्राह्मण ५ मन्त्र १ २८७
आत्मा सर्वान्तर है, जो अपान के द्वारा अपानन क्रिया करता है, वही तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है, जो व्यान
से व्यानन क्रिया करता है, वह तुम्हारा आत्मा ही सर्वान्तर है, जो उदान से उदानन क्रिया सम्पन्न करता
है, वही तुम्हारी आत्मा सर्वान्तर होकर विराजित है ॥ १ ॥
स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद्व्यपदिष्टं भवति
यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो
याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारँ शृणुयान्न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न
विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होषस्तश्चाक्रायण
उपरराम ॥ २ ॥
चाक्रायण उषस्त ने कहा- जिस प्रकार कोई यह कहता है कि यह गौ है, यह अश्व है, आपका यह
कथन उसी प्रकार का है। अतः आप हमें साक्षात्, प्रत्यक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा के विषय में स्पष्ट रूप
से बतलाएँ। याज्ञवल्क्य ने कहा- तुम्हारी आत्मा ही सर्वान्तर में प्रतिष्ठित है। दृष्टि के द्रष्टा को देख सकना,
श्रुति के श्रोता को सुन सकना, मति के मन्ता को मनन करना और विज्ञाति के विज्ञाता को जान सकना तुम्हारे
लिए असम्भव है। तुम्हारा यह आत्मा ही सर्वान्तर है, इसके अतिरिक्त सब नाशवान् (और दुःख का कारण)
है। यह सुनने के पश्चात् उषस्त मौन हो गए ॥ २ ॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
अथ हैन Kahोल: कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म
य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो
योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति। एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः
पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा
सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतस्तस्माद् ब्राह्मणः
पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद्बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च
निर्विद्याऽथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तं ततो ह कहोलः
कौषीतकेय उपरराम ॥ १ ॥
तत्पश्चात् कौषीतकेय कहोल ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! आप साक्षात्, अपरोक्ष ब्रह्म
और सर्वान्तर आत्मा का हमारे प्रति वर्णन कीजिए। तब याज्ञवल्क्य ने कहा- तुम्हारा आत्मा ही सर्वान्तर में
प्रतिष्ठित है। पुनः कहोल ने पूछा कि यह सर्वान्तर आत्मा कौन सा है ? तब याज्ञवल्क्य ने कहा- वह भूख,
प्यास, जरा, मृत्यु, शोक और मोह से परे है। इस आत्म तत्त्व को जानकर ही ब्रह्मवेत्ता पुत्रैषणा, वित्तैषणा
और लोकैषणा का परित्याग कर भिक्षाटन करते हुए विचरण करते हैं। पुत्रैषणा ही वित्तैषणा है और
वित्तैषणा ही लोकैषणा है। अतः ब्रह्मज्ञानी को चाहिए कि इन दोनों (काम्य और कामनाओं) को जानता
हुआ आत्मबल सम्पन्न होकर मनन करे। अमौन (बोलने की शक्ति) और मौन साधना युक्त होकर ब्राह्मण
(धन्य) होता है। ब्राह्मण होने के यही साधन हैं। इसके अतिरिक्त जो भी हैं, वह नाशवान् और दुःख के हेतु
हैं। यह सुनने के बाद कौषीतकेय कहोल मौन हो गए ॥ १ ॥