१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 269, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ब्राह्मण २ मन्त्र १ २६१
जब यह जीवात्मा स्वप्नवृत्ति में होता है अथवा स्वप्नावस्था में होता है, तब उसके लोक अर्थात् कृत
कर्मों के प्रतिफल उदित होते हैं। उस समय वह विभिन्न प्रकार की स्थितियों को प्राप्त करता हुआ कभी
महाराजा, कभी महाब्राह्मण, कभी उच्चावस्था और कभी निम्नावस्था को प्राप्त होता है। वह प्रजा के साथ
भ्रमण करने के समान ही प्राणेन्द्रियों को लेकर शरीर में यथेच्छ स्थलों पर भ्रमण करता रहता है॥ १८ ॥
अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद हिता नाम नाड्यो द्वासप्ततिसहस्त्राणि
हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो
वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥ १९ ॥
इसके बाद जब वह जीवात्मा सुषुप्तावस्था में होता है, तब उसे बाह्य जगत् का कुछ भी भान
नहीं रहता। उस समय हिता नामक (अथवा हितकारिणी) बहत्तर हजार नाड़ियाँ जो हृदय प्रदेश से
सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त हैं, उन्हीं के माध्यम से वह (जीवात्मा) बुद्धि के साथ सम्पूर्ण शरीर में
संव्याप्त होकर सो जाता है। जिस प्रकार कोई बालक, महाब्राह्मण या महाराजा अतिशय आनन्द की
स्थिति प्राप्त करके सो जाता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी सो जाता है (अर्थात् सुप्तावस्था में
बालक, विद्वान् एवं राजा सभी एक जैसी विश्राम की स्थिति में होते हैं) ॥ १९ ॥
स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येवमेवास्मादात्मनः
सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य
सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ २०॥
जिस प्रकार मकड़ी (अपने द्वारा निर्मित) तन्तुओं पर चलकर ऊर्ध्वगमन करती है और जिस प्रकार
अग्नि में अनेक छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, ठीक उसी तरह इस आत्मा से सभी प्राण, सभी
लोक, सभी देवता और समस्त भूत उत्पन्न होते हैं। इसका उपनिषदीय नाम 'सत्य का सत्य' है। निश्चित रूप
से प्राण ही सत्य है और यह आत्मा उस (प्राण का) सत्य है॥ २०॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
यो ह वै शिशुं साधानं सप्रत्याधानं सस्थूणं सदामं वेद सप्त ह द्विषतो
भ्रातृव्यानवरुणद्ध्वयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदं प्रत्याधानं प्राणः
स्थूणान्नं दाम ॥ १॥
जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा (खूँटे) और दाम (बाँधने की रस्सी) के साथ इस प्राण
तत्त्व रूप शिशु को जानने वाला है, वह द्वेष करने वाले सात भ्रातृव्यों (सात विरोधियों-पाँच
ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि) को अवरुद्ध करने में समर्थ होता है। मध्य स्थित या मध्यम प्राण ही
शिशु रूप है, उसी का यह शरीर (अधिष्ठान) है। उस शिशु का सिर ही प्रत्याधान (आश्रय स्थल),
प्राण तत्त्व स्थूणा (खूँटा) एवं अन्न ही इसकी रज्जु है ॥ १॥