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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 505 में से

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पृष्ठ 258

२५८ बृहदारण्यकोपनिषद्
होवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति तस्मात् कुमारं जातं घृतं वै वाग्रे प्रतिलेहयन्ति स्तनं
वानुधापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरतृणाद इति। तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च
नेति पयसि हीदं सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा
जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपज-
यत्येवंविद्वान्सर्वं हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति । कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदेति
पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते यो वै -तामक्षितिं वेदेति पुरुषो वा अक्षितिः
स हीदमन्नं धिया धिया जनयते । कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति
मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत्स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशंसा ॥ २ ॥
पिता-प्रजापति ने अपने तप और ज्ञान से जिन सात अन्नों को उत्पन्न किया, उनमें से एक अन्न ( धरती
से उत्पन्न खाद्य) सामान्य है। उसमें सभी की साझेदारी है, अतः सभी को समान रूप से उसका उपभोग
करना चाहिए। सबके लिए निर्धारित इस अन्न का अकेले ही उपभोग करने वाला कभी पाप से विमुक्त नहीं
होता। पूर्व वर्णित जिन दो अन्नों को देवताओं के निमित्त बताया गया, उनमें एक हुत अर्थात् (हवन द्वारा
दिया जाने वाला) और दूसरा प्रहुत (प्रत्यक्ष में अर्पित किया जाने वाला) है। कुछ विद्वान् इसे दर्श और
पूर्णमास भी कहते हैं। (क्योंकि यज्ञ देवों के लिए निर्धारित है, इसलिए) यज्ञों को काम्य (लौकिक
कामनाओं की पूर्ति के लिए) न करें। पशुओं के निमित्त दिया गया अन्न, दूध (पय-पान करने योग्य) है।
मनुष्य और पशु दोनों ही उस अन्न का सेवन करते हैं। शीघ्र उत्पन्न हुए शिशु को घृत चटाते हैं अथवा
स्तनपान कराते हैं। बछड़ा भी जन्म लेने के तुरन्त बाद घास ग्रहण नहीं करता, वरन् दुग्ध पान ही करता है।
श्वास लेने और न लेने वाले सभी जीव दूध में ही प्रतिष्ठित हैं। अस्तु, जिनका यह कथन है कि एक वर्ष तक
(दूध से) निरन्तर अग्निहोत्र करने वाला मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है (उनका यह कथन समीचीन
नहीं); वरन् यह मानना चाहिए कि जिस दिन वह यज्ञ सम्पन्न करता है, उसी दिन मृत्यु पर विजय प्राप्त
कर लेता है। ऐसा जानने वाला देवताओं को उनके सेवन योग्य अन्न प्रदान करता है। बारम्बार भक्षित होने
पर भी वह अन्न क्षीण क्यों नहीं होता ? वह इसलिए क्षीण नहीं होता; क्योंकि वह पुरुष क्षयरहित है और
पुनः-पुनः अन्नोत्पादन करने में समर्थ है। वह अविनाशी पुरुष कर्म और बुद्धि के संयोग से अन्नोत्पादन
करता है। यदि वह पुरुष कर्म और बुद्धि से हीन हो जाए, तो अन्न और अन्नोत्पादन भी समाप्तप्राय हो
जाए। उस अन्न का सेवन मुख के माध्यम से किया जाता है, इसी कारण देवताओं को भी वह प्राप्त हो जाता
है और अमृतत्व प्रदायक होता है। यह इसकी (फलश्रुति) प्रशंसा है ॥ २ ॥
['श्वास लेने वाले और न लेने वाले सभी 'पय' पर निर्भर हैं', इस कथन में 'पय' का अर्थ स्थूल दूध नहीं
लिया जा सकता, यहाँ तो 'पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः'- आदि कहकर जिस कारण
रूप पान करने योग्य पोषक प्रवाह की ओर संकेत किया जाता है, उसे ही 'पय' मानना चाहिए। इसी प्रकार प्रकृति
के पाश में बँधे हुए चेतन को ही पशु मानना चाहिए।]
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं