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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

१८ [भूमिका]

शोध ग्रन्थ 'वैदिक साहित्य- परिशीलन' में इसी
गणना के आधार पर संहिताओं का रचनाकाल
लगभग ४५३३ वर्ष ईसापूर्व निकाला है। अनेक
अन्य विद्वानों की गणनाएँ भी इसी के आस-पास
हैं। इस आधार पर संहिताओं से निकाले गये
उपनिषदों (ईशावास्य, शिवसंकल्प उपनिषद् आदि)
तथा शतपथ ब्राह्मण से लिए गये उपनिषद्
(बृहदारण्यक, गायत्री आदि) का रचनाकाल भी
उक्तानुसार ही माना जा सकता है।
मैत्रेय्युपनिषद् (६.१४) में प्राप्त ऋतु परिवर्तन
काल का जो उल्लेख मिलता है, उसके आधार पर
लोकमान्य तिलक ने उक्त उपनिषद् का रचनाकाल
ई०पू० १८८०-१६८० के बीच माना है। अन्य विद्वानों
के गणितीय निष्कर्ष भी इसी के आसपास हैं।
लेकिन यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य
है। सम्पात बिन्दुओं को आकाश में एक चक्र ३६०
अंश (डिग्री) पार करने में ३६० x ७२ = २५९२० वर्ष
अर्थात् लगभग २६००० वर्ष का समय लगता है।
इस हिसाब से संहिताओं के रचनाकाल में जो अयन
स्थिति थी, वह २६००० वर्ष पूर्व भी रही होगी;
किन्तु यह सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता
कि उस काल से अब तक २६००० वर्ष के कितने
चक्र पूरे किये जा चुके हैं ?
ईसाई मतावलम्बी लोग सृष्टि की उत्पत्ति
का समय ईसा से मात्र ५००० या ७००० वर्ष पूर्व
ही मानते रहे हैं। इस मान्यता के आधार पर उपनिषदों
का रचनाकाल ४००० वर्ष ईसा पूर्व तक मैक्समूलर
आदि पाश्चात्य विद्वानों ने माना है; किन्तु अब तो
वैज्ञानिक ऐसे प्रमाण देने लगे हैं, जिनके आधार पर
सृष्टि का उद्भव लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ माना
जाने लगा है। भारतीय वैदिक धर्म वाले तो सृष्टि
की उत्पत्ति करोड़ों वर्ष पूर्व की मानते हैं। इसलिए
यह नहीं कहा जा सकता कि संपात बिन्दुओं की
किसी भी स्थिति के लिए निर्धारित समय के साथ
२६००० वर्ष के कितने चक्र और जोड़े जाएँ ?
इसलिए उपनिषदों के रचनाकाल के बारे में
तमाम अनुमानों और गणितीय प्रयोगों के बाद भी
कोई साधिकार निर्णय दिया जाना संभव नहीं दिखता।

उपनिषदों के वर्ण्य विषय

उपनिषदों का मूल विषय 'ब्रह्मविद्या' को
माना गया है। 'ब्रह्मविद्या' का क्षेत्र बड़ा व्यापक है।
विद्वानों ने विभिन्न उपनिषदों में वर्णित विषयों के
आधार पर 'ब्रह्मविद्या' के अन्तर्गत ३२ विद्याओं
को समाविष्ट माना है। जो इस प्रकार हैं -
(१) सद्विद्या (छान्दो०), (२) आनन्दविद्या (तैत्ति०),
(३) अन्तरादित्यविद्या (छान्दो०), (४) आकाश विद्या
(छान्दो०), (५) प्राण विद्या (छान्दो०), (६) गायत्री-
ज्योतिर्विद्या (छान्दो०), (७) इन्द्रप्राणविद्या (छान्दो०,
कौ०ब्रा०), (८) शाण्डिल्यविद्या (छान्दो०), (९)
नाचिकेतसविद्या (कठ०), (१०) उपकोसलविद्या
(छान्दो०), (११) अन्तर्यामिविद्या (बृह०), (१२)
अक्षरविद्या (मुण्ड०), (१३) वैश्वानरविद्या (छान्दो०),
(१४) भूमाविद्या (छान्दो०), (१५) गार्ग्यक्षरविद्या
(बृह०), (१६) प्रणवोपास्य परमपुरुष विद्या (प्रश्न०),
(१७) दहर विद्या (छान्दो०, बृह०, तैत्ति०), (१८)
अंगुष्ठ प्रमितविद्या (कठ०, श्वेता०), (१९)
देवोपास्यज्योतिर्विद्या (बृह०), (२०) मधुविद्या
(छान्दो०), (२१) संवर्गविद्या (छान्दो०), (२२)
अजाशरीरकविद्या (श्वेता०, तैत्ति०), (२३)
बालाकिविद्या (कौ०ब्रा०, बृह०), (२४) मैत्रेयी
विद्या (बृह०), (२५) द्रुहिणरुद्रादिशरीरक विद्या,
(२६) पञ्चाग्निविद्या (छान्दो०, बृह०), (२७)
आदित्यस्थानार्थक विद्या (बृह०), (२८)
अक्षिस्थान्नामक विद्या (बृह०), (२९) पुरुषविद्या
(छान्दो०, तैत्ति०), (३०) ईशावास्यविद्या (ईश०),
(३१) उपस्ति कहोल विद्या (बृह०) और (३२)
व्याहृति-शरीरक विद्या।