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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 505 में से

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पृष्ठ 148

१४८ छान्दोग्योपनिषद्
अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिं
रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड्दक्षिणैति मासाँस्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥
इसके बाद जो यह सभी गृहस्थ लोग ग्राम में निवास करते हुए इष्ट, पूर्त और दत्त (अग्निहोत्रादि
वैदिक कर्म- इष्ट; वापी, कूप, तड़ाग एवं बगीचे आदि पूर्त के अन्तर्गत और वेदी आदि से बाहर सत्पात्र
व्यक्तियों को यथाशक्ति दान देना ही 'दत्त' कहलाता है।) ऐसी उपासना करते हैं। वे धूम को प्राप्त करते
हैं, धूम से रात को, रात से कृष्ण पक्ष को और कृष्ण पक्ष से दक्षिणायन के ( जिनमें सूर्य दक्षिण मार्ग से
गमन करता है) छः मासों को प्राप्त करते हैं। ये लोग संवत्सर को नहीं प्राप्त कर पाते हैं ॥ ३ ॥
मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं
तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥
दक्षिणायन के महीनों से पितर लोक को प्राप्त होते हैं। पितृलोक से आकाश को और आकाश
से चन्द्रमा को प्राप्त करते हैं। यह चन्द्रमा ही राजा सोम है। वह सभी देवों का अन्न है, समस्त देव
गण उसका भक्षण करते हैं ॥ ४ ॥
तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं
वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ॥ ५ ॥
वहाँ जब तक कर्मों का क्षय होता है, तब तक उस चन्द्र-मण्डल में निवास करने के बाद इस आगे
कहे गये मार्ग से ही पुनः वापस लौट आते हैं। वे पहले आकाश को प्राप्त होते हैं। आकाश से वायु को प्राप्त
करने के उपरान्त, वायुभूत होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर ही अभ्र (मेघरूप) हो जाते हैं ॥ ५ ॥
अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पत-
यस्तिलमाषा इति जायन्तेऽतो वै खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति
तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥
वह अभ्ररूप होकर मेघ होता है, मेघ होकर वृष्टि करता है, तब वे सभी प्राणी इस लोक में धान, यव
(जौ), ओषधि, वनस्पति, उड़द और तिल आदि होकर प्रादुर्भूत होते हैं। इस भाँति यह निष्क्रमण निश्चित
ही अत्यन्त कष्टप्रद है। उस अन्न को जो-जो भक्षण करता है और जो-जो उससे उत्पन्न वीर्य का सेवन
करता है, वह जीव तद्रूप ही हो जाता है ॥ ६ ॥
तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिं वा
क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्
श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥
उन सभी जीवों में जो श्रेष्ठ, सुन्दर आचरण वाले होते हैं, वे शीघ्र ही उत्कृष्ट योनि को प्राप्त होते हैं।
वे सभी जीव ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य आदि श्रेष्ठ योनि को प्राप्त करते हैं। जो अशुभ अपवित्र आचरण
वाले होते हैं, वे तत्क्षण ही अशुभ योनि को प्राप्त होते हैं। ऐसे जीव कुत्ते की योनि या सूकर योनि अथवा
चाण्डाल (क्रूर कर्मी) योनि को प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥
अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व
म्रियस्वेत्येतत्तृतीयः स्थानं तेनासौ लोको न संपूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेष श्लोकः ॥ ८ ॥