१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ खण्ड ५ मन्त्र १ १०१
अथावृत्तेषु द्यौर्हिंकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी
निधनम् ॥ २॥
इसी प्रकार अधोमुख लोकों में भी पाँच प्रकार से साम की उपासना की जाती है। स्वर्ग हिंकार है,
आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है और पृथिवी निधन है ॥ २ ॥
[ सामगान में 'हिंकार' प्रारंभ तथा 'निधन' समापन का द्योतक है। जब पृथ्वी से ऊर्ध्व लोकों को लक्ष्य
करके प्राण तरंगित किया जाता है, तो मंत्र क्र. १ की स्थिति बनती है तथा जब ऊर्ध्व लोकों से पृथ्वी को लक्ष्य
करके साम प्रयोग होता है, तो मंत्र क्र. २ की स्थिति बनती है।]
कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधँसामो-पास्ते ॥
इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पंचविध साम की उपासना करता है, उसके लिए ऊर्ध्व और अधो
लोकों के भोग सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं ॥ ३ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
वृष्टौ पञ्चविधँ सामोपासीत पुरो वातो हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स
उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥
अब वृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना का वर्णन करते हैं। पूर्वीय वायु हिंकार है, उत्पन्न होने
वाला मेघ प्रस्ताव है। बरसने वाला जल उद्गीथ है। जो चमकता और गर्जन करता है, वह प्रतिहार है ॥ १ ॥
उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥
जो जल को ग्रहण करता है, वह निधन है। इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पंचविध साम की
उपासना करता है, उसकी इच्छा के अनुरूप ही वर्षा होती है। उसे ही वर्षा कराने का श्रेय प्राप्त होता है ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
सर्वास्वप्सु पञ्चविधँसामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो
याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
सब प्रकार के जल में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए। घनीभूत होने वाले मेघ
हिंकार हैं, बरसने वाले मेघ प्रस्ताव हैं, पूर्व दिशा में प्रवहमान मेघ उद्गीथ हैं, पश्चिम दिशा में
प्रवहमान मेघ प्रतिहार हैं, समुद्र निधन हैं ॥ १ ॥
न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्सर्वास्वप्सु पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥
इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष सब प्रकार के जल में पञ्चविध साम की उपासना करता है,
उसकी कभी जल में मृत्यु नहीं होती और वह जल से सर्वदा सम्पन्न रहता है ॥ २ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
ऋतुषु पञ्चविधँसामोपासीत वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः
शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥
ऋतुओं में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए। वसन्त ऋतु हिंकार है। ग्रीष्म ऋतु
प्रस्ताव है, वर्षा ऋतु उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है और हेमन्त ऋतु निधन है ॥ १ ॥