यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextद्वितीय अध्याय २७
यह स्वर्ग ही देनेवाला है और न यह कीर्ति को ही करनेवाला है। सन्मार्ग पर
जो दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है, उसे आर्य कहते हैं। गीता आर्यसंहिता है। परिवार के
लिये मरना-मिटना यदि अज्ञान न होता तो महापुरुष उस पर अवश्य चले
होते। यदि कुलधर्म ही सत्य होता तो स्वर्ग और कल्याण की निःश्रेणी अवश्य
बनती। यह कीर्तिदायक भी नहीं है। मीरा भजन करने लगी, तो ‘लोग कहें
मीरा भई बावरी, सास कहे कुलनाशी रे।’ जिस परिवार, कुल और मर्यादा
के लिये मीरा की सास बिलख रही थी, आज उस कुलवन्ती सास को कोई
नहीं जानता, मीरा को विश्व जानता है। ठीक इसी प्रकार परिवार के लिये जो
परेशान हैं, उनकी भी कीर्ति कब तक रहेगी? जिसमें कीर्ति नहीं, कल्याण नहीं,
श्रेष्ठ पुरुषों ने भूलकर भी जिसका आचरण नहीं किया तो सिद्ध है कि वह
अज्ञान है। अतः-
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३॥
अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो। क्या अर्जुन नपुंसक था? क्या
आप पुरुष हैं? नपुंसक वह है, जो पौरुष से हीन हो। सब अपनी समझ से
पुरुषार्थ ही तो करते हैं। किसान रात-दिन खून-पसीना एक करके खेत में
पुरुषार्थ ही तो करता है। कोई व्यापार में पुरुषार्थ समझता है, तो कोई पद का
दुरुपयोग करके पुरुषार्थी बनता है। जीवनभर पुरुषार्थ करने पर भी खाली हाथ
जाना पड़ता है। स्पष्ट है कि यह पुरुषार्थ नहीं है। शुद्ध पुरुषार्थ है ‘आत्मदर्शन’।
गार्गी ने याज्ञवल्क्य से कहा-
नपुंसकः पुमान् ज्ञेयो यो न वेत्ति हृदि स्थितम्।
पुरुषं स्वप्रकाशं तमानन्दात्मानमव्ययम्।। ( आत्मपुराण )
वह पुरुष होते हुए भी नपुंसक है, जो हृदयस्थ आत्मा को नहीं पहचानता।
वह आत्मा ही पुरुषस्वरूप, स्वयंप्रकाश, उत्तम, आनन्दयुक्त और अव्यक्त है।
उसे पाने का प्रयास ही पौरुष है।
अर्जुन ! तू नपुंसकता को न प्राप्त हो, यह तेरे योग्य नहीं है। हे परंतप !
हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो। आसक्ति का