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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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२६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
नहीं ! दोष हमारे भ्रमदाताओं का है। धर्म के नाम पर हम कुरीति के शिकार हैं,
इसलिये दोष हमारा है।
महात्मा बुद्ध के समय में केश-कम्बल एक सम्प्रदाय था, जिसमें केश
को बढ़ाकर कम्बल की तरह प्रयोग करने को पूर्णता का मानदण्ड माना जाता
था। कोई गोव्रतिक (गाय की भाँति रहनेवाला) था, तो कोई कुक्कुरव्रतिक
(कुत्ते की तरह खाने-पीने, रहनेवाला) था। ब्रह्मविद्या का इनसे कोई सम्बन्ध
नहीं है। सम्प्रदाय और कुरीतियाँ पहले भी थीं, आज भी हैं। ठीक इसी प्रकार
कृष्णकाल में भी सम्प्रदाय थे, कुरीतियाँ थीं। उनमें से एकाध कुरीति का
शिकार अर्जुन भी था। उसने चार तर्क प्रस्तुत किये- १. ऐसे युद्ध से सनातन-
धर्म नष्ट हो जायेगा, २. वर्णसंकर पैदा होगा, ३. पिण्डोदक क्रिया लुप्त होगी,
और ४. हमलोग कुलक्षय द्वारा महान् पाप करने को उद्यत हुए हैं।
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।१।।
संजय ने कहा- करुणा से व्याप्त, अश्रुपूर्ण व्याकुल नेत्रोंवाले उस
अर्जुन के प्रति 'मधुसूदन'- मद का विनाश करनेवाले भगवान ने यह वचन
कहा-
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।२।।
अर्जुन ! इस विषम स्थल में तुझे यह अज्ञान कहाँ से हो गया? विषम
स्थल अर्थात् जिसकी समता का सृष्टि में कोई स्थल है ही नहीं, पारलौकिक है
लक्ष्य जिसका, ऐसे निर्विवाद स्थल पर तुझे अज्ञान कहाँ से हुआ? अज्ञान
क्यों, अर्जुन तो सनातन-धर्म की रक्षा के लिये कटिबद्ध है। क्या सनातन-धर्म
की रक्षा के लिये प्राण-पण से तत्पर होना अज्ञान है? श्रीकृष्ण कहते हैं- हाँ,
यह अज्ञान है। न तो सम्भावित पुरुषों द्वारा इसका आचरण किया गया है, न