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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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षष्ठम अध्याय १५९
वहाँ वह पूर्वशरीर में साधन किये हुए बुद्धि के संयोग को अर्थात्
पूर्वजन्म के साधन-संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन !
उसके प्रभाव से वह फिर 'संसिद्धौ'- भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि के निमित्त
प्रयत्न करने लगता है।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४॥
श्रीमानों के घर विषयों के वश में रहने पर भी वह पूर्वजन्म के अभ्यास
से भगवत्पथ की ओर आकर्षित हो जाता है और योग में शिथिल प्रयत्नवाला
वह जिज्ञासु भी वाणी के विषय को पार करके निर्वाण पद को पा जाता है।
उसकी प्राप्ति का यही तरीका है। कोई एक जन्म में पाता भी नहीं।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५॥
अनेक जन्मों से प्रयत्न करनेवाला योगी परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता
है। प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी सभी पापों से अच्छी प्रकार शुद्ध
होकर परमगति को प्राप्त हो जाता है। प्राप्ति का यही क्रम है। पहले शिथिल
प्रयत्न से वह योग आरम्भ करता है, मन चलायमान होने पर जन्म लेता है,
सद्गुरु के कुल में प्रवेश पाता है और प्रत्येक जन्म में अभ्यास करते हुए वहीं
पहुँच जाता है, जिसका नाम परमगति परमधाम है। श्रीकृष्ण ने कहा कि
'स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य' ( २/४० )- इस धर्म का स्वल्प अभ्यास भी महान
जन्म-मृत्यु के भय से उद्धार करनेवाला होता है। धर्म बदलता नहीं है। इस
योग में बीज का नाश नहीं होता। आप दो कदम चल भर दें, उस साधन का
कभी नाश नहीं होता। हर परिस्थिति में रहते हुए पुरुष ऐसा कर सकता है।
कारण कि थोड़ा साधन तो परिस्थितियों से घिरनेवाला व्यक्ति ही कर पाता है;
क्योंकि उसके पास समय नहीं है। आप काले हों, गोरे हों अथवा कहीं के हों,
गीता सबके लिये है। आपके लिये भी है, बशर्ते आप मनुष्य हों। उत्कट
प्रयत्नवाला चाहे जो हो, किन्तु शिथिल प्रयत्नवाला गृहस्थ ही होता है। गीता
गृहस्थ-विरक्त, शिक्षित-अशिक्षित, सर्वसाधारण मनुष्य मात्र के लिये है।