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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१५८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अथवा वहाँ जन्म न मिलने पर भी स्थिरबुद्धि योगियों के कुल में वह
प्रवेश पा जाता है। श्रीमानों के घर में पवित्र संस्कार बचपन से ही मिलने लगते
हैं; किन्तु वहाँ जन्म न हो पाने पर वह योगियों के कुल में (घर में नहीं)
शिष्य-परम्परा में प्रवेश पा जाता है। कबीर, तुलसी, रैदास, बाल्मीकि इत्यादि
को शुद्ध आचरण और श्रीमानों का घर नहीं, योगियों के कुल में प्रवेश मिला।
सद्गुरु के कुल में संस्कारों का परिवर्तन भी एक जन्म है और ऐसा जन्म
संसार में निःसन्देह अतिदुर्लभ है। योगियों के यहाँ जन्म का अर्थ उनके शरीर
से पुत्ररूप में उत्पन्न होना नहीं है। गृहत्याग से पूर्व पैदा होनेवाले लड़के
मोहवश महापुरुष को भी भले ही पिता मानते रहे; किन्तु महापुरुष के लिये
घरवालों के नाम पर कोई नहीं होता। जो शिष्य उनकी मर्यादाओं का अनुष्ठान
करते हैं, उनका महत्त्व लड़कों से कई गुना अधिक मानते हैं। वही उनके सच्चे
पुत्र हैं।
जो योग के संस्कारों से युक्त नहीं हैं, उन्हें महापुरुष नहीं अपनाते।
‘पूज्य महाराज जी’ यदि साधु बनाते तो हजारों विरक्त उनके शिष्य होते। किन्तु
उन्होंने किसी को किराया-भाड़ा देकर, किसी के घर सूचना भेजकर, पत्र
भेजकर, समझा-बुझाकर सबको उनके घर लौटा दिया। बहुत लोग हठ करने
लगे तो उन्हें अपशकुन हो। भीतर से मना हो कि इसमें साधु बनने का एक भी
लक्षण नहीं है। इसे रखने में भलाई नहीं है, यह पार नहीं होगा। निराश होकर
दो-एक ने पहाड़ से गिरकर अपनी जान भी दे दी; किन्तु महाराज जी ने उन्हें
अपने यहाँ नहीं रखा। बाद में पता चलने पर बोले- “जानत रहेउँ कि बड़ा
विकल है लेकिन ई सोचते कि सचहूँ के मरि जाई तो रखी लेते। एक ठो पतितै
रहत, अउर का होत।” ममत्व उनमें भी विकट था, फिर भी नहीं रखा। छः-
सात को, जिनके लिये आदेश हुआ कि- “आज एक योगभ्रष्ट आ रहा है,
जन्म-जन्म से भटका हुआ चला आ रहा है, इस नाम और इस रूप का कोई
आनेवाला है, उसे रखो, ब्रह्मविद्या का उपदेश करो, उसे आगे बढ़ाओ।”
केवल उन्हीं को रखा।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।।४३।।