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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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षष्ठम अध्याय १४९
फिर बोले- "नहीं हो! बहुत ऊँचा हो गया। ऊँचे नहीं बैठे के चाही साधू को,
अभिमान होइ जावा करत है। नीचेहू न बैठे के चाही, हीनता आवत है, अपने
से घृणा आवत है।" बस, उसको उठवाया और जंगल में एक बगीचा था, वहाँ
रखवा दिया। वहाँ न कभी महाराज जाते थे और न अब ही कोई जाता है। यह
था उन महापुरुष का क्रियात्मक शिक्षण। इसी प्रकार साधक के लिये भी बहुत
ऊँचा आसन नहीं होना चाहिये, नहीं तो भजनपूर्ति बाद में होगी, अहंकार
पहले चढ़ बैठेगा। इसके पश्चात्-
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।१२।।
उस आसन पर बैठकर (बैठकर ही ध्यान करने का विधान है) मन को
एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए अन्तःकरण
की शुद्धि के लिये योगाभ्यास करे। अब बैठने का तरीका बताते हैं-
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।१३।।
शरीर, गर्दन और सिर को सीधा, अचल-स्थिर करके (जैसे कोई पटरी
खड़ी कर दी गयी हो, इस प्रकार सीधा) दृढ़ होकर बैठ जाय और अपनी
नासिका के अग्रभाग को देखकर (नासिका की नोंक देखते रहने का निर्देश
नहीं है बल्कि सीधे बैठने पर नाक के सामने जहाँ दृष्टि पड़ती है, वहाँ दृष्टि रहे।
दाहिने-बायें देखते रहने की चंचलता न रहे) अन्य दिशाओं को न देखता हुआ
स्थिर होकर बैठे और-
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।१४।।
ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर (प्रायः लोग कहते हैं कि जननेन्द्रिय का
संयम ब्रह्मचर्य है; किन्तु महापुरुषों की अनुभूति है कि मन से विषयों का
स्मरण करके, आँखों से वैसे दृश्य देखकर, त्वचा से स्पर्श कर, कानों से
विषयोत्तेजक शब्द सुनकर जननेन्द्रिय-संयम सम्भव नहीं है। ब्रह्मचारी का
वास्तविक अर्थ है- 'ब्रह्म आचरति स ब्रह्मचारी'। ब्रह्म का आचरण है