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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१४८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जानेवाले नियम, आहार-विहार, सोने-जागने का संयम तथा कर्म पर कैसी
चेष्टा हो?- इत्यादि बिन्दुओं पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अगले पाँच श्लोकों में
प्रकाश डाला है, जिससे आप भी उस यज्ञ को सम्पन्न कर सकें।
अध्याय तीन में उन्होंने यज्ञ का नाम लिया और बताया कि यज्ञ की
प्रक्रिया ही वह नियत कर्म है। अध्याय चार में उन्होंने यज्ञ का स्वरूप विस्तार
से बताया, जिसमें प्राण में अपान का हवन, अपान में प्राण का हवन, प्राण-
अपान की गति रोककर मन का निरोध इत्यादि किया जाता है। सब मिलाकर
यज्ञ का शुद्ध अर्थ है आराधना तथा उस आराध्य देव तक की दूरी तय
करानेवाली प्रक्रिया, जिस पर पाँचवें अध्याय में भी कहा। किन्तु उसके लिये
आसन, भूमि, करने की विधि इत्यादि का चित्रण शेष था, उसी पर योगेश्वर
श्रीकृष्ण यहाँ प्रकाश डालते हैं-
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१०॥
चित्त को जीतने में लगा हुआ योगी मन, इन्द्रियों और शरीर को वश में
रखकर, वासना और संग्रहरहित होकर एकान्त स्थान में अकेला ही चित्त को
(आत्मोपलब्धि करानेवाली) योग-क्रिया में लगावे। उसके लिये स्थान कैसा
हो? आसन कैसा रहे?-
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११॥
शुद्ध भूमि में कुश, मृगछाल अथवा इससे भी उत्तरोत्तर (रेशमी, ऊनी
वस्त्र, तख्त इत्यादि कुछ भी) बिछाकर अपने आसन को न अति ऊँचा, न
नीचा, स्थिर स्थापित करे। शुद्ध भूमि का तात्पर्य उसे झाड़ने-बुहारने, सफाई
करने से है। जमीन पर कुछ बिछा लेना चाहिये- चाहे मृगछाल हो या चटाई
अथवा कोई भी वस्त्र, तख्त जो भी उपलब्ध हो। आसन हिलने-डुलनेवाला न
हो। न जमीन से बहुत ऊँचा हो और न एकदम नीचा। 'पूज्य महाराज जी'
लगभग पाँच इञ्च ऊँचे आसन पर बैठते थे। एक बार भाविकों ने लगभग एक
फीट ऊँचा संगमरमर का एक तख्त मँगा दिया। महाराज जी एक दिन तो बैठे,