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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 77 of 421

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Page 77

पूर्वार्ध छठा अध्याय
प्राण को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के नेत्रों को शुद्ध करते हैं. हम यजमान
आप के कानों को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की नाभि को शुद्ध करते हैं. हम
यजमान आप की जननेंद्रिय को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की गुदा को शुद्ध
करते हैं. हम यजमान आप के चरित्र को शुद्ध करते हैं. (१४)
मनस्त ऽ आप्यायतां वाक्त ऽ आप्यायतां प्राणस्त ऽ आप्यायतां चक्षुस्त ऽ आप्यायता १४
श्रोत्रं त ऽ आप्यायताम्.
यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्त ऽ आप्यायतां निष्प्यायतां तत्ते शुध्यतु शमहोभ्यः.
ओषधे त्रायस्व स्वधिते मैन १४ हि १४ सी:... (१५)
हे याजक! आप का मन प्रसन्न हो. आप की वाणी प्रसन्न हो. आप के प्राण
प्रसन्न हों. आप के नेत्र प्रसन्न हों. आप के कान प्रसन्न हों. हे यजमान! आप की
क्रूरता समाप्त हो. आप का स्वभाव स्थिर हो. हे याजक! आप का स्वभाव दृढ़ हो.
आप का आचरण शुद्ध हो, हमें भी शुद्ध करे. ओषधियां रक्षा करें. आप इन्हें नष्ट
होने से बचाइए. (१५)
रक्षासां भागोसि निरस्त १४ रक्ष ऽ इदमह १४ रक्षोभि तिष्ठामीदमह १४ रक्षोव बाध इदमह
१४ रक्षोधमं तमो नयामि.
घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथां वायो वे स्तोकानाम्नग्निरराज्यस्य वेतु स्वाहा स्वाहाकृते
ऊर्ध्वनभसं मारुतं गच्छतम्.. (१६)
यज्ञ में त्यागा हुआ तिनका राक्षसों का भाग है. इसलिए हे परित्यक्त तृण! हम
आप को दूर करते हैं. आप राक्षसी वृत्ति (स्वभाव) वाले हैं. आप पतन के गड्ढे में
ही बैठे रहिए. आप बाधक व अधम हैं. हम आप को अंधकार में ले जाते हैं. यजमान
द्वारा दी गई हवि से स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक परिपूर्ण हों. यजमान द्वारा दी गई हवि
अग्निग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि के लिए स्वाहा. नभ देव के लिए स्वाहा. वह
हवि ऊंचे नभलोक तक पहुंचे. हवा के रूप में पूरे आकाशलोक में चली जाए. (१६)
इदमपः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्.
यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्.
आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु.. (१७)
हे जल देव! आप जिस तरह हमारे मल आदि को दूर करते हैं, उसी तरह
यजमान के ईर्ष्या, झूठ, दोष आदि को दूर करें. जल तथा वायु हम को इन पापों से
मुक्त करें. जल हम को पवित्र बनाने की कृपा करे. (१७)
सन्ते मनो मनसा सं प्राणः प्राणेन गच्छताम्.
रेडस्यग्निष्ट्वा श्रीणात्वापस्त्वा समरिणन्वातस्य त्वा ध्राज्यै पूष्णो र १४ ह्मा ऊष्मणो
व्यथिषत् प्रयुतं द्वेषः... (१८)
यजुर्वेद - ७७