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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 70 of 421

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Page 70

पूर्वार्ध पांचवां अध्याय
सविता देव सभी देवताओं को उत्पन्न करने वाले हैं. उन को अश्विनी देवताओं
की बाहु से धारण करते हैं. उन को पूषा देवता के हाथों से धारण करते हैं. वे हमारे
मन के अनुकूल होने की कृपा करें. हम राक्षसों की गर्दन काट कर अलग करते हैं.
उन का नाश करते हैं. आप यव हैं. हमें शत्रुओं से अलग करने की कृपा कीजिए. हम
स्वर्गलोक, अंतरिक्ष व पृथ्वी हेतु आप का प्रेक्षण करते हैं. हम पृथ्वी के लिए स्थान
को शुद्ध करते हैं. यह पितरों का सदन है. यह पितरों का निवास स्थान है. ( २६ )
उद्विव ꣳ स्तभानान्तरिक्षं पृण दृ ꣳ हस्व पृथिव्यां द्युतानस्तवा मारुतो मिनोतु
मित्रावरुणौ ध्रुवेण धर्मणा.
ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्य्यूहामि ब्रह्म दृ ꣳ ह क्षत्रं दृ ꣳ ह्यायुर्दृ ꣳ ह
प्रजां दृ ꣳ ह.. ( २७)
हे उदुंबर शाखे ( गूलर की लकड़ी )! स्वर्गलोक को ऊंचा उठाने, अंतरिक्षलोक
को पूर्ण करने व पृथ्वीलोक को दृढ़ करने की कृपा कीजिए. मरुद्गण स्वर्गलोक
का विस्तार करते हैं. ( २७ )
ध्रुवासि ध्रुवोयं यजमानोस्मिन्नायतने प्रजया पशुभिर्भूयात्.
घृतेन द्यावापृथिवी पूर्येथामिन्द्रस्य छदिरसि विश्वजनस्य छाया.. ( २८)
हे शाखा! आप ऊंचे आकाश तक जाइए. आप ध्रुव ( स्थिर ) होइए. यजमान
इस घर में प्रजावान और पशु वाला हो. हम घी से स्वर्गलोक व पृथ्वी को पूरित कर
दें. छप्पर से अनुरोध है कि वे हमें भी छत्रच्छाया प्रदान करने की कृपा करें. ( २८ )
परि त्वा गिर्वणो गिर ऽ इमा भवन्तु विश्वतः.
वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः.. ( २९)
हे इंद्र! वाणीमय स्तुतियां आप को सब ओर से प्राप्त हों. वाणीमय स्तुतियां
सब ओर से सब के लिए कल्याणमयी हों. हम आयु में बढ़ोतरी पाएं. आप की
आयु का अनुकरण करें. आप हमारे यज्ञ से संतुष्ट एवं प्रसन्न होने की कृपा
कीजिए. ( २९ )
इन्द्रस्य स्यूरसीन्द्रस्य ध्रुवोसि. ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि.. ( ३०)
हे रज्जु! आप इंद्र के लिए हो. उन के लिए स्थिर होने की कृपा कीजिए. आप
उन से संबंधित हैं. आप सभी देवों से संबद्ध होने की कृपा कीजिए. ( ३० )
विभूरसि प्रवाहणो वह्निरसि हव्यवाहनः. श्वात्रोसि प्रचेतास्तुथोसि विश्ववेदाः.. ( ३१)
हे अग्नि! आप व्यापक, प्रवाहक, विविध स्वरूप, हवि वाहक व रक्षक हैं.
अत्यंत चेतना संपन्न हैं. आप स्तुत्य और सर्वज्ञाता हैं. ( ३१ )
७० - यजुर्वेद