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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 63 of 421

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Page 63

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
उस्रावेतं धूर्षाहौ युज्येथामनश्रू अवीरहणौ ब्रह्मचोदनौ.
स्वस्ति यजमानस्य गृहान् गच्छतम्.. ( ३३)
हे देवताओ! आप यजमान का कल्याण करने के लिए उन के घरों की ओर
जाने की कृपा कीजिए. आप भार वहन करने में समर्थ हैं. आप वीरों को सुख देते
हैं. ब्रह्मज्ञान हेतु प्रेरक हैं. आप रथ में जुड़ने की कृपा कीजिए. ( ३३ )
भद्रो मेसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभि धामानि.
मा त्वा परिपरिणो विदन् मा त्वा परिपन्थिनो विदन् मा त्वा वृका अघायवो विदन्.
श्येनो भूत्वा परापत यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ स ष्कृतम्.. ( ३४)
हे सोम! आप मेरा कल्याण कीजिए. आप भुवनपति हैं. आप विश्व के सभी
धामों की ओर तेजी से प्रयाण ( यात्रा ) करते हैं. आप चोरों के ज्ञान का विषय मत
होइए. यज्ञ के विरोधी लोग आप को न जान पाएं. सब ओर भ्रमण करने वाले आप
को न जान पाएं. पापी भेड़िए आप को न जान सकें. आप बाज के समान जल्दी
जाइए. आप यजमान के घरों की ओर प्रस्थान कीजिए. वहां भलीभांति सज्जित
यज्ञशालाओं का प्रबंध है. ( ३४ )
नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत ष् सपर्यत.
दूरेदृशे देवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय श ष् सत.. ( ३५)
मित्र देवता और वरुण देवता की आंखों से देखने वाले सूर्य को नमस्कार है.
सूर्य प्रकाशमान, दूर दृष्टि वाले, देवता से उत्पन्न व स्वर्गलोक के पुत्र हैं. सूर्य के
लिए नमन! यजमान को सूर्य के लिए यज्ञ करना चाहिए. यजमान को सूर्य के लिए
स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. ( ३५ )
वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्यऋतसदन्यसि वरुणस्यऋ-
तसदनमसि वरुणस्यऋतसदनमासीद.. ( ३६)
हे शमी देव ( यज्ञ में काम आने वाली लकड़ी )! आप वरुण का उत्थान करने
वाले हैं. आप वरुण की गति के सर्जक ( रचनाकार ) हैं. आप उन्हें स्थिर करने वाले
हैं. आप वरुण के यज्ञ का सदन, यज्ञ का बैठने का स्थान हैं. आप वरुण के यज्ञ
के सदन में सुख से विराजने की कृपा कीजिए. ( ३६ )
या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्.
गयस्फानः प्रतरणः सुवीरो ऽ वीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्.. ( ३७)
हे सोम! जो यजमान यज्ञ में आप के धाम का भजन करते हैं. वे सभी यज्ञ
स्थान आप को प्राप्त हों. आप घरों को स्फारित ( विस्तृत ) करते हैं. आप पार लगाने
वाले श्रेष्ठ वीर व कायरों के विनाशक हैं. आप हमारे यज्ञों में पहुंचने की कृपा
कीजिए. ( ३७ )
यजुर्वेद - ६३