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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 60 of 421

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Page 60

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
हे अग्नि! आप सत्य स्वरूप हैं. हम भी आप के उस सत्य स्वरूप को पाएं.
अर्थात् आप इसे हमारे शरीर में भी उपजाइए. हम आप का यह अनुशासन (यंत्र)
पा सकें. आप के लिए आहुति प्रदान करते हैं. आप चमकीले, चंद्र, अमृत व सब
के देव हैं. (१८)
चिदसि मनासि धीरसि दक्षिणासि क्षत्रियासि यज्ञियास्यदितिरस्युभयतः शीर्ष्णी.
सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधि मित्रस्त्वा पदि बध्नीतां पूषाध्वनस्पात्विन्द्रायेन्द्राध्यक्षाय.. (१९)
हे मंत्रवाणी! आप चित्त, मन, धीर, दक्षिण, क्षत्रिय व यज्ञ करने योग्य हैं. आप
अदिति, दोनों ओर से सिर वाली पूर्व व पश्चिम दिशा वाली एवं मित्र हैं. आप के
पैरों में (प्रेम भाव का) बंधन (बेड़ी) डालना चाहते हैं. इंद्र यज्ञ के अध्यक्ष हैं. हम
उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं. हम पूषा देव से अनुरोध करते हैं कि वे यज्ञ के मार्ग
की रक्षा करने की कृपा करें. (१९)
अनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्यः.
सा देवि देवमच्छेहीन्द्राय सोम ँ रुद्रस्त्वा वर्तयतु स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि.. (२०)
हे वाग् देवी! आप को इंद्र के लिए सोम लेने जाना है. इस के लिए आप को
माता, पिता, भाई, बहन, मित्रगण और पड़ोसी अनुमति प्रदान करने की कृपा करें.
सोम लेने के बाद रुद्र देव आप को हमारी ओर लाने व हमारा कल्याण करने की
कृपा करें. आप सोमसखा को ले कर पुनः यहां आने की कृपा करें. (२०)
वस्यस्यदितिरस्यादित्यासि रुद्रासि चन्द्रासि.
बृहस्पतिष्ट्वा सुम्ने रम्णातु रुद्रो वसुभिरा चके.. (२१)
हे वाग् देवी! आप वसु, अदिति, रुद्र तथा चंद्र हैं. बृहस्पति रुद्र और वसुगण
के साथ आप की रक्षा करने की कृपा करें. बृहस्पति आप के श्रेष्ठ मन में रमण
करने की कृपा करें. (२१)
अदित्यास्त्वा मूर्द्धन्नाजिघर्मि देवयजने पृथिव्या ऽ इडायास्पदमसि घृतवत् स्वाहा.
अस्मे रमस्वास्मे ते बन्धुस्त्वे रायो मे रायो मा वय ँ रायस्पोषेण वियौष्म तोतो
रायः.. (२२)
हे वाग् देवी! आप मूर्धन्य हैं. हम आप को देवताओं के यज्ञ में घी से भरी हुई
हवि प्रदान करते हैं. आप पृथ्वी की श्रेष्ठ देवियों में स्थान रखती हैं. आप यह घी
वाली आहुति स्वीकार कीजिए. आप धनवान हैं. आप अपने धन से हमें पोसिए. आप
अपने धन से हमें वंचित मत कीजिए. हम आप के बंधु हैं. (२२)
समख्ये देव्या धिया सं दक्षिणयोरुचक्षसा.
मा म ऽ आयुः प्रमोषीर्मो ऽ अहं तव वीरं विदेय तव देवि सन्दृशि.. (२३)
६० - यजुर्वेद