यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 59 of 421
Read in contextपूर्वार्ध चौथा अध्याय
इयं ते यज्ञिया तनूरपो मुञ्चामि न प्रजाम्.
अ १४ होमुचः स्वाहाकृताः पृथिवीमाविशत पृथिव्या सम्भव.. (१३)
हे यज्ञ देव! पृथ्वी का शरीर यज्ञ करने योग्य है. हम इस में जल छोड़ते हैं. प्रजा
( जनता ) के लिए लाभदायी जल नहीं छोड़ते हैं. आप हमें इस पाप से मुक्त
कीजिए. स्वाहा के रूप में छोड़ा गया जल पृथ्वी में प्रवेश कर के पृथ्वी की मिट्टी
में मिल कर एकमेक हो जाए, आप ऐसी कृपा कीजिए. ( १३ )
अग्ने त्व १४ सु जागृहि वय १४ सु मन्दिषीमहि.
रक्षा णो ऽ अप्रयुच्छन् प्रबुधे नः पुनस्कृधि.. (१४)
हे अग्नि! आप अच्छी तरह ( भलीभांति ) जागिए ( प्रज्वलित होइए ). हम
यजमान भलीभांति नींद का आनंद लेते हैं. आप हमारी रक्षा व हमें प्रबुद्ध कीजिए.
आप हमें विविध कामों में लगाइए. ( १४ )
पुनर्मनः पुनरायुर्म ऽ आगन् पुनः प्राणः पुनरात्मा म ऽ आगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं
म ऽ आगन्.
वैश्वानरो अदब्धस्तनूपा ऽ अग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात्.. (१५)
मन फिर से आ गया. आयु पुनः आ गई. पुनः प्राण प्राप्त हो गए. पुनः आत्मा
प्राप्त हो गई. पुनः नेत्र मिल गए. पुनः कान मिल गए. हे अग्नि! आप सब का
कल्याण चाहते हैं. आप शरीर के रक्षक हैं. आप का दमन नहीं किया जा सकता.
हे अग्नि! आप हमें पापों व बुरे कामों से बचाएं. ( १५ )
त्वमग्ने व्रतपा ऽ असि देव ऽ आ मर्त्येष्वा त्वं यज्ञेष्वीड्यः.
रास्वेयत्सोमा भूयो भर देवो नः वसोर्दाता वस्वदात्.. (१६)
हे अग्नि! आप व्रतपालक देवताओं, मनुष्यों में पूजनीय एवं यज्ञ में आराधनीय
( आराधना योग्य ) हैं. हे सोम! आप हमें भरपूर धन दीजिए. आप हमें इतना धन
दीजिए कि अपने साथसाथ हम लोगों का भी भला कर सकें. सविता देव धनदाता
हैं. उन्होंने भी हमें बहुत धन देने की कृपा की है. ( १६ )
एषा ते शुक्र तनूरेतद्द्वर्चस्तया सम्भव भ्राजं गच्छ.
जूरसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे.. (१७)
हे अग्नि! आप चमकीले हैं. यह घी आप के शरीर को बढ़ा रहा है. चमकती और
ऊपर उठती हुई आप की लपटें और ऊपर आकाश तक जाएं. हम ने मन से वाणी धारण
की है. यह वाणी और अधिक वेगवान व विष्णु को संतुष्ट करने वाली हो. ( १७ )
तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवे तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहा.
शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्वदेवमसि.. (१८)
यजुर्वेद – ५१