यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदूसरा अध्याय
कृष्णोस्याखरेष्ठोग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि वेदिरसि बर्हिषे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि बर्हिरसि
स्रुग्भ्यस्त्वा जुष्टं प्रोक्षामि.. (१)
हे समिधा! हम यज्ञ में इष्ट होने के कारण आप को पवित्र करते हैं. हे वेदिका!
यज्ञ के लिए आप भी आवश्यक हैं. आप को भी ( प्रक्षालित कर के ) पवित्र करते
हैं. हे कुशा ( यज्ञ में प्रयोग आने वाली घास )! आप को भी हम ( प्रक्षालित कर
के ) पवित्र करते हैं. ( १ )
अदित्यै व्युन्दनमसि विष्णोः स्तूपोस्यूर्णम्म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थां देवेभ्यो
भुवपतये स्वाहा भुवनपतये स्वाहा भूतानां पतये स्वाहा.. (२)
हे यज्ञजल! आप अदिति ( पृथ्वी ) को सींचते हैं. आप ओषधियों को सींचते हैं.
हे स्तूप के आकार वाले कुशो! देवताओं के लिए नरम ( कोमल ) आसन के रूप में
आप को फैलाया जाता है. हे यजमानो! आप देवताओं, पृथ्वीपति, पृथ्वीपालक और
प्राणियों आदि के लिए आहुति अर्पित कीजिए. ( २ )
गन्धर्वस्त्वा विश्वावसुः परिदधातु विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड
ऽ ईडितः.
इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणो विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः.
मित्रावरुणौ त्वोत्तरतः परिधत्तां ध्रुवेण धर्मणा विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य
परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः.. (३)
विश्वावसु गंधर्व यज्ञ की परिधियों ( घेरों ) की रक्षा करने की कृपा करें.
यजमान के सभी प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) के निवारण के लिए अग्नि और यज्ञ
की परिधियों की उपासना करते हैं. यज्ञपरिधि इंद्र की दाईं भुजा है. यजमान को
संरक्षण देने वाली है. यजमान के सब प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) निवारण के
लिए अग्नि और यज्ञ की परिधि की उपासना करते हैं. मित्र और वरुण उत्तर से धर्म
के साथ यज्ञ की परिधि को धारण करने की कृपा करें. हम यजमान के सभी प्रकार
के अनिष्ट ( अमंगल ) का निवारण करने के लिए अग्नि और यज्ञ की परिधि की
उपासना करते हैं. ( ३ )
यजुर्वेद - ३९