यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 331 of 421
Read in contextउत्तरार्ध सत्ताईसवां अध्याय
जना, जो देवों के एकमात्र अधिदेव हैं, उन के अलावा अब हम किस देवता के
लिए हवि का विधान करें ? ( २६ )
प्र याभिर्यासि दाश्वा १७ समच्छा नियुद्भिर्वायविष्टये दुरोणे.
नि नो रयि १७ सुभोजसं युवस्व नि वीरं गव्यमश्व्यं च राधः.. ( २७)
हे वायु! आप जिन यजमान के पास घोड़े की गति से जाते हैं, उसी युवा गति
से हमारे पास आइए. आप हमें वीर संतान, गोधन व अश्वधन दीजिए. आप हमें धन
प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २७ )
आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वर १७ सहस्रिणीभिरुप याहि यज्ञम्.
वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२८)
हे वायु! आप अपने सैकड़ों और हजारों घोड़ों को रथ में जोत कर इस यज्ञ में
जल्दी से पधारिए. हे वायु! इस यज्ञ में आप भी आनंदित होइए और अपने
कल्याणकारी साधनों से हमारी भी रक्षा करने की कृपा कीजिए. ( २८ )
नियुत्वान्वायवा गह्यय १७ शुक्लो अयामि ते. गन्तासि सुन्वतो गृहम्.. (२९)
हे वायु! शुक्र ग्रह आप को धारण करना चाहते हैं. आप अपने घोड़े रथ
में जोतिए. आप हमारी सुनिए. शीघ्र गंतव्य ( यजमान के घर ) की ओर
पधारिए. ( २९ )
वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु.
आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (३०)
हे वायु! आप को शुक्र ग्रह धारण करना चाहते हैं. हे देव! आप अग्रगण्य हैं.
आप स्वर्गलोक से पधारिए. आप मधुर सोमरस का पान करने के लिए तेजी से
पधारिए. ( ३० )
वायुरग्रेगा यज्ञप्रीः साकं गन्मनसा यज्ञम्. शिवो नियुद्भिः शिवाभिः.. (३१)
हे वायु! आप अग्रगामी, यज्ञ से प्रीति रखने वाले व कल्याणकारी हैं. आप
अपने कल्याणकारी घोड़ों को रथ में जोतिए. आप अपने मन के साथ इस यज्ञ में
पधारने की कृपा कीजिए. ( ३१ )
वायो ये ते सहस्रिणो रथासस्तेभिरा गहि. नियुत्वान्त्सोमपीतये.. (३२)
हे वायु! आप के जो हजारों रथ हैं, आप उन में घोड़े जोतिए. आप सोमरस पीने
के लिए पधारिए. ( ३२ )
एकया च दशभिश्च स्वभूते द्वाभ्यामिष्टये वि १७ शती च.
तिसृभिश्च वहसे त्रि १७ शताच नियुद्भिर्वायविह ता विमुञ्च.. (३३)
यजुर्वेद - ३३१